ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
5 itemsहमारे महल कौ नातौ साँचौ
श्री ललित किशोरी देव कह रहे हैं "हे भाई, श्री वृंदावन नवनिकुंज महल का अनन्य नाता ही हमारा सच्चा नाता है। [1] क्योंकि महल के नाते बल पर ही हम सदा काल स...
श्री वृन्दाविपिन के वास की, यही रीति सो जानि
श्रीवृंदावन में वास करने की यही रीति है कि किसी पर दोषारोपण किए बिना, निष्काम भाव से (नित्य श्रीश्यामा-श्याम के चिंतन युक्त), रस की खान श्रीवृंदावन-धा...
हमारे महल कौ नातौ साँचौ
श्री ललित किशोरी देव कह रहे हैं "हे भाई, श्री वृंदावन नवनिकुंज महल का अनन्य नाता ही हमारा सच्चा नाता है। [1] क्योंकि महल के नाते बल पर ही हम सदा काल स...
श्री वृन्दाविपिन के वास की, यही रीति सो जानि
श्री वृन्दावन के वास करने की यही रीति है कि किसी पर बिना दोष किये निष्काम भाव से (नित्य श्यामा-श्याम का चिंतन युक्त) रस की खानी श्री वृन्दावन धाम का स...
बिछुरन रहित सुबस्तु है, सुनहि रसिक चित्त लाई
हे रस के अनुरागी रसिक जनों, चित्त लगाकर इस दुर्लभ नित्य विहार रस को सुनो, इस रस में श्री प्रिया प्रियतम एक क्षण को भी नहीं बिछड़ते हैं। इस दुर्लभ रस का...