ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
6 itemsहौं दासी बिन मोल की, तुम्हरी हौं सुकुँवारि
वंशी अलि जी के रास लीला से सम्बंधित काव्यों में गोपियों का श्री राधा के प्रति प्रियतम भाव है, उनकी उपासना में श्री कृष्ण का ना के बराबर स्थान है। श्री...
छकन छके जे राधिका, तिनहें न और सुहाय
जो उपासक श्रीराधिका के रस में छक गए हैं, उन्हें और कोई रस सुहाता नहीं। जैसे अंगूर का स्वाद चखने के बाद कोई नीम का फल नहीं खाता।
तुही एक राधा कुँवर दृग दरशत नहिं और
हे श्री राधा! केवल आप ही मेरे जीवन का सर्वस्व हैं। मेरे नेत्र आपके अतिरिक्त किसी अन्य के दर्शन की चाह नहीं रखते। हे रसिक शिरोमणि! इसी कारण मैं केवल आप...
मंडल रास रच्यौ बिमल निर्तति कुँवरि सुजान
जब श्री राधा ने रास मंडल में प्रत्येक गोपी के संग नृत्यमय रास रचाया, तब ब्रज-बालाओं को वास्तविक आनंद की परम अनुभूति हुई। उस दिव्य रासलीला के अद्भुत प्...
अति अलवेली भाँति सौं लई मुरलिका हाथ
जब श्री राधा ने अत्यंत अलबेली और मोहक रीति से अपने करकमलों से वंशी उठाकर अपने होठों से मधुर स्वर में वंशी वादन किया, तो उसकी स्वर-माधुरी से वृंदावन के...
इतनी कहि हिय विवस ह्वै रुदन कियौ ब्रजवाल
श्री राधा और सखियों के महारास-विलास में, जब श्री राधा रानी सहसा अंतर्धान हो गईं, तब समस्त ब्रजवालाएँ उनके विरह में पूर्णतः भाव-विह्वल हो उठीं। इतना कह...