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परमरसग्हस्य नन्दनिस्यन्दिवृन्दा
रे मन ! देह, गेह, शास्त्रयुक्ति, प्रभृति का पूर्णतः उपेक्षा करके परमरस रहस्य आनन्द के सागर रूप वृन्दावन के निकुंज में दिव्यातिदिव्य विलासों से निरन्तर...
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परमरसग्हस्य नन्दनिस्यन्दिवृन्दा
रे मन ! देह, गेह, शास्त्रयुक्ति, प्रभृति का पूर्णतः उपेक्षा करके परमरस रहस्य आनन्द के सागर रूप वृन्दावन के निकुंज में दिव्यातिदिव्य विलासों से निरन्तर...