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Sacred Scripture

विलाप कुसुमांजलि

ग्रन्थ के पद एवं श्लोक

12 items
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आशाभरैरमृतसिन्धुमयैः कथञ्चित्

हे श्रेष्ठभंगि स्वामिनि [श्री राधे] ! अमृत सिन्धु [आपके चरण कमल] की प्राप्ति की प्रत्याशा में अब तक मैं अति कष्ट पूर्वक समय बिता रही हूँ। अब भी यदि आप...

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हा नाथ गोकुलसुधाकर सुप्रसन्न

हे नाथ ! हे गोकुलचन्द्र ! हे प्रसन्नमुखकमल ! हे मधुर-मन्द मुसकानकारी ! हे कृपाभिषिक्त ! आप जहां अतिशय प्रेमपूर्ण होकर अपनी प्रिया श्रीराधा जी के साथ व...

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स्वमुखान्मन्मुखे देवि कदा

हे करुणामयि देवी श्री राधे ! चारों ओर देखते हुए अवसर पाकर कदा आप स्नेह पूर्वक अपने मुख का चर्वित पान मेरे मुख में ही प्रदान करोगी?

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देवि दुःखकुलसागरोदरे दूयमानमति दुर्गतं जनम्

हे देवि श्रीराधिके ! मैं दुःखसमूहरूप दुष्पार सागर में निराश्रय अवस्था में अति दुर्गति को प्राप्त कर रही हूँ। आप अपनी कृपारूप दृढ़ नौका में चढ़ाकर अपने...

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हे श्रीसरोवर सदा त्वयि

हे श्रीराधाकुण्ड मेरी स्वामिनी श्रीराधा जी अपने प्रियतम श्रीश्यामसुन्दर के साथ आपके तटवर्ती कुञ्ज में प्रेमोद्रेक में विविध क्रीड़ाएं करती रहती हैं। ह...

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स्वप्नेऽपि किं सुमुखि ते चरणाम्बुजात

हे सुमुखि ! अहो ! कभी स्वप्न में भी मैं आपके चरणकमलों के सुगन्धित परागचूर्ण रूप विभूषण से अपने मस्तक को परम सुशोभित करके मस्तक के उत्तमांग-नाम को सार्...

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तवैवास्मि तवैवास्मि

तवैवास्मि तवैवास्मि न जीवामि त्वया विना। इति विज्ञाय देवि त्वं नय मां चरण अन्तिकम्।।96॥ - श्री रघुनाथ दास, विलाप कुसुमांजलि (96) हे स्वामिनि ! मैं आ...

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लक्ष्मीर्यदङ्घ्रिकमलस्य नखाञ्चलस्य

हे स्वामिनी, लक्ष्मी देवी भी आपके चरणारविन्द के नखाग्र प्रान्त के सौन्दर्य का एक बिन्दु मात्र भी प्राप्त नहीं कर सकती है। यदि आप मुझे अपने रूप-लीलादि ...

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यदा तव सरोवरं सरस-भृंगसंघोल्लसत्

हे प्रफुल्लित - कमलनयने ! जब से मैंने मधुर गुञ्जनकारी मधुकरों से शोभित, कमलसमूह से मनोहर और मधुरजल से पूर्ण आपके सरोवर ( राधाकुण्ड ) का दर्शन किया है,...

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त्वदलोकन-कालाहि

हे क्रीड़ा परायण स्वामिनी श्री राधे!, आपके दर्शन के अभाव में मैं काले सर्प के डंक से क्षण क्षण मरी जा रही हूँ। कृपया अपने श्री चरण कमल में संलग्न अलत...

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जित्वा पाशकखेलायामाच्छिद्य

हे दिव्यलीलामयि ! पाशक-क्रीड़ा में श्रीश्यामसुन्दर को हराकर, उनकी वंशी छुड़ाकर कब मेरी ओर फेंकोगी और मैं उसे छिपाकर सुरक्षित रख लूंगी ?

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यत्प्रान्तदेश लवलेश विघूर्णितेन

हे करुणामयि राधे! आप जब अपने नेत्रप्रान्त को लेश मात्र भी घुमाती हैं-(चञ्चल दृष्टि से इधर-उधर देखती हैं) तो कृष्ण-गजेन्द्र उसी क्षण दृढ़ बन्धन में आ ज...