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युगल शतक

ग्रन्थ के पद एवं श्लोक

55 items
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राधिका आज आनन्द में डोलें

(पद) [राग केदारौ, ताल - यात्रा] राधिका आज आनन्द में डोलें॥ साँवरे चंद गोविन्द के रस भरी दूसरी कोकिला मधुर स्वर बोलें॥ [1] पहर तन नील पट कनक हारावली हा...

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राधामाधव अद्भुत जोरी

(पद) [तिताल, राग - केदारौ] राधामाधव अद्भुत जोरी। सदा सनातन इक रस बिहरत, अविचल नवल किसोर-किसोरी॥ [1] नष सिष सब सुषमा रतनागर भरत रसिकवर हृदय सरोरी। जै श...

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जमुना बंसीबट निकट

(पद) [इकताल, राग - मल्हार] हिंडोरैं झूलत हैं पिय प्यारी। श्री रंगदेवि सुदेवि बिसाषा, झोटा देत ललितारी॥ [1] श्री जमुना बंसीवट के तट, सुभग भूमि हरियारी...

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प्यारी जू के चरन पलोटत मोहन

(पद) [ इकताल, राग-बिहागरौ] प्यारी जू के चरन पलोटत मोहन। नील कमल के दलन लपेटे, अरुन कमल दल सोहन॥ [1] कबहुँक लै लै नैन लगावत, अलि धावत मनु गोहन। जै श्...

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अहु राधे वृषभानु की

(पद) [इकताल, राग-विहागरौ] जै जै श्री वृषभानु किसोरी। राजत रसिक अंक अंकित सी, लसी स्याम संग गोरी॥ [1] जै जै राधे रूप अगाधे, चितै चारु चित चोरी। श्रीभट ...

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अनायास सहजहि जु तिहिं

(दोहा) जो जीव संसार को विस्मृत कर मन और वाणी से अनन्य भावपूर्वक श्रीराधा-कृष्ण के भजन में लीन रहता है, वह बिना किसी कठोर प्रयास के अनायास ही समस्त प...

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मोहन ब्रज बन भूमि सब

ब्रजभूमि मोहिनी (चित्ताकर्षक) है और यहाँ के निवासी तथा समाज भी मनमोहक हैं। यमुना के कुंज भी अत्यंत मनमोहक हैं, जहाँ युवराज श्री राधा-कृष्ण नित्य विहा...

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प्रेम कला सुर सहित पिय

(पद) [इकताल, राग-गौरी] परस्पर निरषि थकित भये नैन। प्रेम कला भरि सुर राधे सौं, बोलत अमृत बैन॥ हार उदार निहार तिहारौ, राधे यह मन लैन। श्रीभट लटक जानि ...

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जाकौ मन वृन्दाविपिन हर्यौ

निकुंज वन की लता पताओं में, श्री राधा रानी की दिव्य छबि को नित्य निहारना एवं ह्रदय में "कृष्ण" नाम स्वाभाविक धारण हो जाना। श्री भट्ट देवाचार्य कहते है...

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वृन्दावन फुलवारि में, पहिरि फूल उरमाल

(पद) [तिताल, राग-विलावल] नंदनंदन गोपाललाल वृषभानु दुलारी। विहरत वृन्दाबिपिन में, अति प्रीतम प्यारी॥ [1] कर सपरस परसन्न होत, तैसिय फुलवारी। (जै) श्रीभ...

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प्रीति रीति रस बस भये

(पद) [ताल-चम्पक, राग - केदारौ] मोहन राधे राधे बैन बोलें। प्रीति रीति रस बस नागरि हरि लियौ प्रेम के मोलैं॥ [1] हास विलास रास राधे सँग, सील आपनौ तोलैं। ...

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सेव्य हमारे हैं सदा, बृन्दाबिपिन बिलास

श्री वृन्दावन में नित्य-विलास की लीलाएँ सम्पन्न करने वाले श्री प्रिया-प्रियतम ही हमारे सदा सेव्य हैं। नंदनंदन श्री कृष्ण और वृषभानु-नंदिनी श्री राधिका...

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मदनगुपाल सरन तेरी आयौ

(पद) [राग गौरी, इकताल] मदनगुपाल सरन तेरी आयौ। चरन कमल की सेवा दीजै, चेरौ करि राषौ घर जायौ॥ [1] धनि धनि मात-पिता सुत बंधू, धनि जननी जिन गोद खिलायौ। धनि...

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गौर स्याम अति सोहनी, जोरी परम उदार

श्री प्रिया-प्रियतम की गौर-श्यामल जोड़ी अत्यंत शोभायमान है। सहचरियाँ उनकी छवि को निहार-निहार कर प्रेमपूर्वक आरती उतारती हैं।

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ज्यौं ज्यौं चुनरि सगवगै

(पद) [इकताल, राग मल्हार] ठाढ़े दोउ एकै षुहिया माँहीं। बंसीबट तट जमुना जल में, निरषत चंचल झांहीं॥ कारी कमरिया अंतर दंपति, स्यामा स्याम लपटाहीं। श्रीभ...

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स्यामा स्याम सरूप सर परि स्वार्थ बिसरयौ जु

जिस साधक के मन को श्री वृंदावन धाम रूपी आनंद-मेघ ने अपने वश में कर लिया है, वह सहज ही युगल किशोर श्री श्यामा-श्याम के रूप-रस-सागर में अपनी समस्त सुध-ब...

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ज्यौं ज्यौं चुनरि सगवगै

(पद) [तिताल, राग मल्हार] भीजत कुंजन ते दोउ आवत। ज्यौं ज्यौं बूँद परत चुनरि पर, त्यौं त्यौं हरि उर लावत॥ [1] अति गंभीर झीने मेघन की, द्रुम तर छिन विरमा...

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राधे बिनय करत मोहि मुरली दीजै

(पद) [राग केदारौ, इकताल] राधे बिनय करत मोहि मुरली दीजै। बिनु दामन मनु मोल लियो हौं, जो भावै सो कीजै॥ [1] शयन पान सब सुधि बिसराई, इतनी करुना लीजै। (जै)...

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श्री राधेजू सुंदर छता हमारौ

(पद) [इकताल, राग मल्हार] श्री राधेजू सुंदर छता हमारौ। मोहि सहित श्री स्यामा लायक, बन्यौ जु बनिक विचारौ॥ [1] भीजैंगे जु बसन-तन भामिनी, छिन इक मेह निवार...

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ठाढ़े गाढ़े कुंज तर बाढ़े मैन मरोर

वर्षा से बचने के लिए प्रिया-प्रियतम सघन कुंजों के नीचे खड़े हैं, जहाँ कामदेव भी आनंदवृद्धि की सेवा कर रहा है। ऐसे युगल किशोर (श्री राधा कृष्ण) को वर्ष...

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नवल बसंत नवल श्रीवृन्दावन

(पद) [इकताल, राग-वसंत] नवल बसंत नवल श्रीवृन्दावन, नवलहि फूले फूल। नवलहि कान्ह नवल सब गोपी, निरतत एकै तूल॥ [1] नवलहि साषि जवादि कुंकुमा, नवलहि बसन अमू...

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श्री वृन्दाविपिनेस्वरी रस सिन्धु बिहारी

(पद) [इकताल, राग-विहागरौ] श्री वृन्दाविपिनेस्वरी रस सिन्धु बिहारी। रच्यौ परस्पर प्रेम छेम, बाढ्यौ अति भारी॥ [1] अरप्यौ पिय हिय पाय कैं, निज अधर सुधार...

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वृन्दावन इक सुन्दर जोरी

(दोहा) श्रीवृन्दावन निजधाम में नित्य-विहार-परायण इस सुंदर जोड़ी के समक्ष चौदह भुवन का सौंदर्य भी गौण कोटि का लगता है। (पद) श्री वृंदावन धाम में एक अ...

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साँवर ससि सँग लसि प्रिया

जिस प्रकार चंद्रमा के संग ज्योत्सना शोभायमान लगती है, उसी प्रकार श्यामसुन्दर के संग श्री राधिका रस में भरी परम शोभायमान हैं। आज वे अति ही आनंद में भरक...

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रस बर्धन यह मान कुँवरि कौ

(पद) [इकताल, राग-केदारौ ] रस बर्धन यह मान कुँवरि कौ। कीरत कूंषि कुमोदनी जाकी, सकै बास को जानि कुँवर कौ॥ [1] मधुर बस्तु ज्यौं खात निरंतर, होत महा सुषद...

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नैक नैन की कोर मोर मोहन

हे राधे तुम्हारे नेत्रों की उपमा देना किसी रसिक कवि के वश की बात नहीं क्यूँकि जो मनमोहन सब के मन को वश में कर लेते हैं, ऐसे मोहन को भी तूने अपने नेत्र...

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लोचन स्याम सुधीर के मोचन विरह विसाल

श्रीरंगदेवीजी श्रीललिताजी से कहती हैं- हे श्रीललिते ! श्री राधा के नेत्रों की ओर तो देख ! उनके ये नेत्र खंजन (पक्षी) की भाँति शोभायमान लग रहे हैं। यद्...

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दरपन में प्रतिबिंब ज्यौं

(पद) [तिताल, राग केदारौ] प्यारी तन स्याम स्यामा तन प्यारौ। प्रतिबिंबित तन अरस परस दोउ, एक पलक दिषियत नहिं न्यारौ॥ [1] ज्यों दरपन में नैन नैन में नैन स...

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राधे नन्द नन्दन सौं नेह

(पद) [राग सोरठा - एकताल] राधे नन्द नन्दन सौं नेह। [1] लखि रह्यौ श्याम नैंनन में तेरे, कहा करिहै दुरि गेह॥ [2] कुँवरी कुँवर तौ चरण लागि रहे निरखि रूप स...

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सेव्य हमारे हैं सदा

हमारा सेव्य तत्व सदा ही एकमात्र वृन्दावन धाम है, जहाँ श्री युगल वर श्री नंदनंदन और श्री वृषभानुनंदिनी नित्य वास करते हैं; उन युगल चरणों के ही हम अनन्...

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जहाँ जुगल मंगलमयी

जहाँ परम मंगलमय श्री युगल सरकार श्री राधा-कृष्ण नित्य निरंतर वास करते हैं, ऐसे श्री सुखस्वरूप श्री वृन्दावन धाम का मैं सेवन करता हूँ।

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ब्रज भूमि मोहनी मैं जानि

ब्रज भूमि मोहनी मैं जानि। मोहन कुंज मोहन वृन्दावन मोहनि जमुना पानी। - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (4) अब मैंने जाना है की ब्रज भूमि मोहिनी है क्य...

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बलि बलि श्री राधा नँदनंदना

बलि बलि श्री राधा नँदनंदना, जय श्री भट्ट श्यामा श्याम रूप पै, न्यौछावरी तन मना। - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (15) हे श्री राधा नंदनंदन, आप दोनों ...

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ब्रज भूमि मोहिनी मैं जानि

अब मैंने जाना है की ब्रज भूमि मोहिनी है ।कुञ्ज भी मोहिनी है, वृन्दावन भी मनमोहन और यमुना रस रानी भी मोहिनी है। समस्त नारी ब्रज की मोहिनी हैं, एवं वह म...

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भीजत कब देखौं इन नैना

(पद) [राग मल्हार - एकताल] भीजत कब देखौं इन नैना। श्यामा जू की सुरंग चुनरिया , मोहन को उपरैंना॥ जुगल किशोर कूंजतर ठाड़े , जतन कियो कछु मैं ना। उमड़ी घट...

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सेऊँ श्री वृंदाविपिन विलास

(राग सारंग) सेऊँ श्री वृंदाविपिन विलास, जहां जुगल मिली मंगल मूरति, करत निरंतर बास। प्रेम-प्रवाह रसिक जन प्यारे, कबहुँ न छाँडत पास। कहाँ भाग की जय श्र...

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जनम-जनम जिनके सदा

जन्म-जन्म से हम जिनके नित्य चाकर हैं—सवेरे से संध्या तक ही नहीं, अपितु प्रत्येक क्षण—वे ही त्रिभुवन का पोषण करने वाले युगल किशोर श्री श्यामा–श्याम हैं...

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जहाँ जुगल मंगलमयी

मैं नित्य उसी सुख-स्वरूप धाम—श्री वृन्दावन धाम—का ही सेवन करना चाहता हूँ, जहाँ मंगलमयी युगल-रूप श्री राधा–कृष्ण सदा नित्य वास करते हैं।

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प्यारीजू के प्यारौ रूप विमोहित

(पद) (राग-बिलावल झिंझोटी, ताल-तीनताल) प्यारीजू के प्यारौ रूप विमोहित। करत पलक पाँमड़े बिहारी, धरत चरन भाँमिनी जित॥ यहै प्रीति परतीति निरंतर, दियौ वारि...

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राधे तेरे प्रेम की कापै कहि आवे

(पद) (राग बिलावल, एकताल) राधे तेरे प्रेम की कापै कहि आवे। तेरीसी गोपाल सौं, तो पै बनि आवै॥ [1] मन बच क्रम दुर्गम किशोर, ताहि चरण छुड़ावै। 'श्री भट्ट' ...

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जुगुलकिसोर हमारे ठाकुर

भावार्थ: श्री भट्ट देवाचार्य जी कहती हैं कि हमारे ठाकुर श्री युगल किशोर (श्री वृंदावन चन्द्र जू) हैं। [1] हम उन श्यामा श्याम के ही हैं एवं सदा सर्वदा...

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संतो, सेव्य हमारे श्रीपिय प्यारे

हमारा सेव्य तत्व सदा ही एक मात्र वृन्दावन धाम है, जहाँ श्री युगल वर श्री नंदनंदन और श्री वृषभानु नंदननि नित्य वास करते हैं, उन युगल चरणों के ही हम अनन...

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राधे तेरे रूप की पटतर कहिये काहि

(पद) [राग - रायसो, ताल - चम्पक] नैंक नैन की कोर मोरि मोहन बस कीनें। राधे तेरे रूप की पटतर को दीनें॥ [1] कमल कोस अलि ज्यौं चलैं तारे रँगभीनें। श्रीभट...

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जहाँ जुगल मंगलमयी

जहाँ परम मंगलमय श्री युगल सरकार श्री राधा-कृष्ण नित्य निरंतर वास करते हैं, ऐसे श्री सुखस्वरूप श्री वृन्दावन धाम का मैं सेवन करता हूँ।

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जाकौ नाम लेत षन देत युगल निज कूल

जिसका हृदय से नाम लेने मात्र से ही युगल सरकार श्री राधा-कृष्ण अपने निज धाम में वास दे देते हैं, वह "वृन्दावन" धाम महानन्द का मूल आधार है। उस वृन्दावन ...

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ब्रज भूमि मोहनी मैं जानि

अब मैंने जाना है की ब्रज भूमि मोहिनी है क्यूंकि कुञ्ज, वृन्दावन और यमुना सब मोहन श्री कृष्ण ही हैं |

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जय जय वृन्दावन आनंद मूल

जय जय वृन्दावन आनंद मूल | शरण आये पाए राधाधव, मिटी अनेक जनम की भूल || - श्री भट्ट देवाचार्य - युगल शतक (03) आनंद का मूल स्त्रोत (एवं रस की उत्पति का क...

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बलि बलि श्री राधा नँदनंदना

हे श्री राधा नंदनंदन, आप दोनों पर मैं बलिहारी जाता हूँ । श्री युगल सरकार के रूप पर, तन और मन न्यौछावर है।

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सेऊँ श्री वृंदाविपिन विलास

मैं नित्य ही श्री वृन्दावन धाम का सेवन करता रहूं। जहां मंगल मूर्ति श्री श्यामा श्याम नित्य निवास करते हैं और जहां प्रेम प्रवाह में रसिक जन कभी सपने मे...

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जै जै वृन्दावन आनंद मूल । नाम लेत पावत जु प्रणय रति

जै जै वृन्दावन आनंद मूल । नाम लेत पावत जु प्रणय रति, जुगल किसोर देत निज कूल ।। सरन आय पाये राधाधव, मिटी अनेक जनम की भूल । ऐसैं जानि वृंदावन श्रीभट, रज...

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राधामाधव अद्भुत जोरी

(पद) [तिताल, राग-केदारौ] राधामाधव अद्भुत जोरी। सदा सनातन इक रस बिहरत, अविचल नवल किसोर-किसोरी॥ [1] नष सिष सब सुषमा रतनागर, भरत रसिकवर हृदय सरोरी। जै श...

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सेव्य हमारे हैं सदा, वृन्दाविपिन बिलास

सेव्य हमारे हैं सदा, वृन्दाविपिन बिलास। नंदनंदन वृषभानुजा,चरन अनन्य उपास॥ - श्री भट्ट देवाचार्य - युगल शतक (3) हमारा सेव्य तत्व सदा ही एक मात्र वृन्दा...

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लड़ैती के खंजन लोचना

अद्भुत श्री लड़ैती राधा रानी के नेत्र इतने सुन्दर हैं कि बिना काजल के ही श्री श्यामसुंदर के ह्रदय में विरह उत्पन्न कर रहे हैं। [1] श्री राधा रानी के ने...

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बसौ मेरे नैननि में दोउ चंद

श्रीभट्ट देवाचार्य कह रहे हैं "मेरी आँखों में वृन्दावन के दोनों चंद्र श्री राधा कृष्ण ही बसे हैं, गौर वर्ण की श्री वृषभानु नंदिनी हैं और श्याम वर्ण के...

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दोऊ मिल करत भामती बतियाँ

आज दोनों (श्री प्यारी जू एवं श्री प्यारे जू) मिल कर बातें कर रहे हैं। [1] व्रजराज कुंवर श्री मदन गोपाल एवं वृषभानु कुंवरी श्री राधा एक संग एक दूसरे के...