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सभी संत

जीवन चरित

ब्रज परंपरा के वैष्णव संत।

श्री ब्रज के कवित्त वाणी संग्रह

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कोटि तप साधि कृश कर ले शरीर किन्तु

कोटि-कोटि तप और साधना भी यदि इस शरीर से की जाएं, तब भी केवल शारीरिक प्रयासों से श्री कृष्ण को नहीं रिझाया जा सकता। [1] आप चाहे भोजन, वस्त्र, भूमि, ह...

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दास तो तिहारे जो उदास तो तिहारे

हे बाँके बिहारी, यदि हम दास हैं तो तुम्हारे हैं, और उदास हैं तो भी तुम्हारे ही लिए हैं। चाहे हम दूर हैं या पास हैं परंतु हैं तो तुम्हारे ही, यदि हम आम...

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प्यारी श्रृंगार निज करसों बनायौ लाल

श्री श्यामसुंदर अपने हाथों से श्रीराधारानी का श्रृंगार कर रहे हैं। वह उनके सिर पर लाल फूल सजा कर उनकी माँग में लाल सिंदूर भर रहे हैं। [1] श्री लाल जी...

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दया की निधान गुनवान रसखान राधे

हे दया की निधान, गुणों की खान, रस की खान श्री राधे! कृपा करके मुझ पर अपनी रस भरी दृष्टि डालिए। [1] मैं अधम, महापतित और कुटिल जीव हूँ, किसी भी तरह से ...

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कोटि कोटि कामधेनु कोटि कोटि कलपतरु

कोटि-कोटि कामधेनु, कोटि-कोटि कल्पतरु वृक्ष और कोटि-कोटि चिंतामणि भी श्री वृन्दावन की समानता नहीं कर सकते। [1] सृष्टि के पालनकर्ता श्री लक्ष्मी जी, श्...

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मैं तो हूँ पतित आप पावन पतित नाथ

हे श्यामसुंदर, मैं तो पतित हूँ, परंतु आप "पतित पावन" हैं। यदि आप सच में पतित पावन हैं, तो अवश्य ही मेरे पापों का हरण करेंगे। [1] मैं तो महादीन हूँ, औ...

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तारिहौ न स्याम तो किसोरी की अदालत में

हम यही दावा पेश करेंगे कि तुमने तो किशोरीजी (श्री राधा) की शरण में रहने वाले जीव को सदा तारने का वादा किया था, अब तुम इससे मुकर रहे हो। [2] यदि तुम इ...

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जाकौ मुख देखने कूँ त्यागि सर्व लोक सुख

जिनका मुख दर्शन करने के लिए नीलकंठ (भगवान शंकर) समस्त लोकों का सुख त्याग कर ब्रज में बौराए से घूम रहे हैं। [1] जिनका ध्यान करने के लिए सिद्ध, मुनि, य...

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करि भक्ति और औतारन की पाँच जन्म

(यह हरि लीलामृत तंत्र में भगवान शिव द्वारा पार्वती माता को कहे गए शब्दों का एक रसिक द्वारा काव्यात्मक अनुवाद है) पांच जन्मों में अन्य अवतारों की भक्ति...

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तीनों लोकन को तत्व

मैंने तीनों लोकों का तत्व श्री ब्रज धाम को देखा है एवं ब्रज धाम का भी तत्व श्री वृन्दावन धाम है। [1] श्री वृन्दावन धाम का भी तत्व साधुजनों का निवास स...

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ब्रह्मा हूँ के ध्यान में न आवै कभू एक क्षण

जो ब्रह्मा के ध्यान में एक क्षण के लिए भी नहीं आते, जिनका शंकर जी पूर्ण एकाग्रता से समाधि लगाकर ध्यान कर रहे हैं। [1] ऋषि और मुनि, जो दिन-रात उनका ध्...

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कीरत किशोरी ते कीरत बढ़त अति

“कीरति किशोरी” नाम लेने से कीर्ति बढ़ती है। “गोरी” नाम लेने से गुणवत्ता बढ़ती है। [1] “लाड़ली” नाम लेने से लाल श्री कृष्ण नाम जापक पर परम दयालु हो जाते...

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चम्पक वरन भूमि झूमि द्रुम फूले फले

जहां की भूमि स्वर्ण के समान है, जहां के वृक्ष, लताएँ प्रेम से झूम रही हैं, एवं फूल-फल खिले हैं। जहां साँचे रतन जटित हैं, वहीं सखियों की भीड़ है। [1] ...

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जाहि निज भक्तन सौ और कोई प्यारौ नाहि

एक बार श्री कृष्ण एक सखी का वेष धारण कर श्री राधा के पास पहुँचे और अपनी ही निंदा करने लगे। तब श्री राधा रानी कहती हैं - श्री कृष्ण को अपने भक्तों से ...

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जै जै जै नन्दजू के नन्दन

नन्दजी के नंदनंदन, नवललाल श्रीकृष्ण की जय हो, वृषभानु जी की दुलारी श्रीराधा की जय हो। [1] यशोदा मैया के प्रिय पुत्र, ब्रज के चंद्रमा, श्रीकृष्ण की जय...

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उत बनमाल इत भृकुटी विसाल भाल

उधर श्री कृष्ण ने फूलों की माला पहनी हुई, इधर श्री राधा के भाल पर विशाल भौंहें हैं। श्री कृष्ण के माथे पर मुकुट सुशोभित है, और श्री राधा के माथे पर बि...

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वृषभानु नन्दिनी दुरन्त की निकन्दिनी हैं

वृषभानु-दुलारी श्री राधा दुरन्त (अत्यन्त कठिन) दुःख-मोह को नष्ट करने वाली हैं। वे नन्द-नन्दन (श्रीकृष्ण) को सदा आनन्द प्रदान करने वाली हैं। [1] समस्त...

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बाटन में घाटन में बीथिन में बागन में

एक गोपी कहती है : गलियों में, घाटों पर, बीथियों में, बगीचों में, वृक्षों में, बेलों में, वाटिका में और वन में। [1] दरवाजों पर, दीवारों पर, देहरी पर...