सनत्कुमार संहिता
जीवन चरित
श्री सनत्कुमार संहिता वाणी संग्रह
ललिते सखि वरे श्रष्ठे यदुक्त पूर्वमेव हि
श्रीराधा कहती हैं कि हे ललिते ! तेरे पूछने पर मैंने यही तो कहा था, जो हमारी ऐसी निर्गमन केलि का चिन्तन करेगा, वही वृन्दावन को प्राप्त कर सकेगा। इसमें...
वृन्दावनं महत्पुण्यं सर्व पावन पावनम्
वृन्दावन की बड़ी महिमा है यह सब पवित्रों को भी पवित्र करने वाला है। यह समस्त लोकों से बाहर निराधार स्थित है।
मथुरामण्डले रम्ये यमुनातीरनिर्मले
मथुरा मण्डल में यमुना तट पर स्थित यह भव्यधाम वृन्दावन लता पता, द्रुम-पल्लवों से अत्यन्त सुशोभित है। वहाँ के वृक्ष सदा फूले-फले हुए रहते हैं। सभी ऋतुये...
कृष्ण प्रिया सखी भाव
साधक को अंतस्चिंतित (मानसिक) देह से श्री कृष्ण प्रेयसी श्री राधिका की सखी भाव को यत्न पूर्वक आश्रय करके, आलस को त्याग कर, अहर्निश उन दोनों (राधा कृष्ण...
विहराम्य् अनया नित्यं
श्री कृष्ण श्री शिवजी से कहते हैं – श्री राधा के प्रेम से वशीभूत होकर मैं सदा नित्य ही उनके संग विहार करता हूँ। श्री राधिका को ही मेरी प्रिया जानना और...
राधिकानुचरीं नित्य
शिवजी नारद जी से बोले: श्री राधिका की अनुचरी बनकर श्री राधिका की नित्य सेवा परायण रहकर, श्री कृष्ण से भी अधिक प्रेम श्री राधिका में करना ही सर्वोत्तम ...
इदम् आनन्द-कन्दाख्यं विद्धि वृन्दावनं मम
श्री कृष्ण श्री शिवजी से कहते हैं – यह वृंदावन, आनंद कन्द नाम से प्रसिद्ध है जिसमें प्रवेश करने मात्र से ही पुनर्जन्म नहीं होता है।
व्रजराज सुतो वृन्दावने पूर्णतमो वसन्
व्रजराज नंदनंदन श्री कृष्णचन्द्र पूर्णतम स्वरूप से श्री वृंदावन धाम में सदा वास करते हैं जहां वे सोलह कलाओं से युक्त होकर नित्य विहार करते हैं।
यो मामेव प्रपन्नश्च मत्प्रियां न महेश्वर
श्रीकृष्ण कहते हैं, “हे महेश्वर! जो जन मेरा प्रपन्न (शरणागत) होकर मेरी प्रिया (राधा) का प्रपन्न नहीं होता है। वह मुझको कभी प्राप्त नहीं हो सकता। यह मै...
त्वमप्येतां समाश्रित्य
श्री कृष्ण श्री शिवजी से कहते हैं – हे शिव! तुम भी मेरी प्रिया वल्लभा श्री राधिका का आश्रय लेकर, मेरे युगल मंत्र का जप करते हुए, सदा मेरे आलय (घर) श्र...
मथुरां मथुरा-नाथो वासुदेवो
भगवान शिव नारदजी से कहते हैं—हे ऋषिवर, वे भगवान, जो वासुदेव के पुत्र और मथुरा के राजा हैं, वे श्रीकृष्ण ही मथुरा में प्रस्थान करते हैं। परंतु जो नंद ल...
तस्मात् सर्वात्मनारुद्र मत् प्रियांशरणं व्रजेत्
श्रीकृष्ण ने शिवजी से कहा — हे रुद्र! तुम मेरी प्रिया श्रीराधा की शरण में जाओ। जो श्री राधा की कृपा का पात्र बनता है, वह सहज ही मुझे अपने वश में कर ले...
कृष्णोत्कर्ष करे नित्यं राधिकेत्वं
श्री ललिता देवी कहती हैं: हे श्रीकृष्ण चन्द्र भगवान के उत्कर्ष करने वाली, नित्य भक्ति को प्रदान करने वाली दाता, सुख की निधि, अपने भक्तों को आनन्द देने...
वरं वृन्दावने रम्ये श्रृंगालत्वं वृणोम्यहम्
मुझे श्रीधाम वृन्दावन का एक तुच्छ सियार बनना भी स्वीकार है, परंतु ज्ञानियों की तथाकथित मुक्ति नहीं चाहिए — क्योंकि उस निर्लिप्त मोक्ष में वह रस-लवलेश ...
राधे राधे च कृष्णेशे
हे कृष्ण की स्वामिनी ! कृष्ण की प्राणभूता ! कृष्ण के मन को चुराने वाली ! भक्तों को अपना धाम देने वाली, हे श्री राधिके! तुम मुझपर प्रसन्न हो!
मद्वनं प्राप्य योमूढ़
श्री कृष्ण शिव जी से कहते हैं - मेरे वृन्दावन में आकर जो मूढ़ जन अन्यत्र गमन करता है, महादेव वह आत्मघाती होता है, इस में कोई संशय नहीं है।
भक्तानानन्दसंदोहवर्द्धिनि
भक्तों के आनंद का वर्धन करने वाली, ध्यान का परम विषय, करोड़ों सूर्य-चन्द्रों की कान्ति को हेय कर देने वाली, हे राधिका, मुझ पर कृपा करो!
वृन्दावनं परित्यज्य नैव गच्छामि अहं क्वचित्
श्री कृष्ण कहते हैं कि वृंदावन धाम को छोड़कर मैं कभी भी कहीं नहीं जाता हूँ, यहाँ ही श्री राधा के संग नित्य निवास करता हूँ।
तत्रस्थं युगलं ध्वात्वा पुनरागमनं नहि
श्री वृन्दावन विहारी-विहारिणी का ध्यान करने वाले साधक का फिर संसार में गमना गमन नही होता।
तत्रस्थं युगलं ध्वात्वा पुनरागमनं नहि
श्री वृन्दावन विहारी-विहारिणी का ध्यान करने वाले साधक का फिर संसार में गमना गमन नही होता।
संक्रीड़नार्थं कुन्जाश्च
श्रीकृष्ण के विहार के लिये विविध प्रकार की कुजें हैं। यद्यपि ये असंख्य हैं, तो भी स्थूल रूप से इनकी संख्या लगभग एक हजार है। ये कुञ्जे इतनी सुन्दर हैं ...