सन्तग्रन्थरागश्लोकस्तोत्रकविता
मुख्यपृष्ठसंतश्री नागरीदास
सभी संत

जीवन चरित

ब्रज परंपरा के वैष्णव संत।

श्री श्री नागरीदास वाणी संग्रह

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जद्यपि न्हात न ऊर्ध्व गति

यद्यपि चारों धामों तथा अन्य तीर्थों का जल अत्यंत श्रेष्ठ है और मुक्तिपद देने वाला है, फिर भी वे ब्रज-रज की समता कदापि नहीं कर सकते।

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कबै रसीली कुंज में

मैं कब उन वृंदावन की रसीली कुंजों में प्रवेश करूँगा, जहाँ लहलहाती हुई लताओं को देखकर मेरा हृदय युगल के प्रेम-रंग में डूबकर मूर्छित हो जाएगा?

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व्रज को स्वाद वैकुण्ठ में नाहीं

ब्रज का रस वैकुंठधाम में भी नहीं है। जब हरि की कथा अत्यंत मीठी लगती है तभी ब्रजरस मिलता है। [1] ब्रजरस के बिना ऐसा क्या है जो रसिकों ने गाया है अर्थात...

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जो सुख लेत सदा व्रजवासी

जिस भगवान को पूरा जगत अविनाशी कहता है वह यहाँ ब्रज के घर घर में खिलौना बना रहता है। श्री नागरीदास जी कहते हैं कि यह ब्रज विश्व से न्यारा है, श्री हरि ...

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कौनकूँख कीरति कीर्ति प्रकास देतो

श्री राधा के बिना, माता श्री कीर्ति की कोख कैसे इतनी कीर्ति को प्राप्त कर सकती थी, और श्रीकृष्ण की प्रिय नित्य दुलहिनि किसे कहा जाता? [1] श्री वृंदाव...

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जग्य दान संजम नियम

यदि कोई मनुष्य यज्ञ, दान, संयम, नियम, तीर्थ-भ्रमण और तप आदि सब कर ले, परंतु श्री राधा-कृष्ण के प्रेम में विभोर होकर निष्काम आँसू न बहाए, तो उसका सारा ...

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अब तो कृपा करो श्रीराधा

हे श्री राधारानी, अब तो कृपा कीजिये। दुनिया की सारी बाधाओं को दूर कर, श्री वृंदावन धाम में निवास दीजिये। [1] श्री वृन्दावन की प्रसिद्ध गाथाएँ तीनो लो...

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यमुना वृन्दाविपिन की, बरनी केलि अनूप

श्री यमुना के तट पर स्थित श्री वृन्दावन की केलि अनूप और अवर्णनीय है। जो साधक निरंतर इस लीला की भावना करता है, वह अंततः उसी भावना में तन्मय होकर लीला-र...

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अब तो यही बात मनमानी

अब यही बात मन को भाती है कि श्यामा श्याम की रजधानी श्री वृंदावन धाम का एक क्षण के लिए भी त्याग नहीं करना। [1] लघु धाम इत्यादि का अवलोकन कर भटकते भटकत...

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जाके लिये सिंधु मथ्यौ

जिनके लिए बड़ा भारी श्रम करके समुद्र मंथन किया गया, उन श्री लक्ष्मी जी की छटा समस्त जगत में प्रकाशमान हुई। [1] श्री लक्ष्मी जी की कृपा प्राप्त करने क...

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बहुरि परे वा दिश को पांव

अब ऐसा कब होगा जब मेरे चरण वृंदावन की ओर चलेंगें। जहां परम मनोहर यमुना का तट है, उसी दिशा में ही मेरा गाँव है। [1] जहां मोहन [श्री कृष्ण] हमारे स्वाम...

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मैं अपने मन मूढ़ते, डरत रहत हौं हाय

श्री नागरीदास जी कहते हैं कि मैं इस बात की कल्पना से सदा भयभीत रहता हूँ कि कहीं ऐसा न हो कि मेरी मूढ़ मति इस दिव्य धाम वृंदावन से फिर जाए (अर्थात् इस ...

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साँचे हितू सु यही दृढ़ावैं

जो अनन्य रसिक जन होते होता है वह प्रिया प्रियतम के नित्य विहार को ही निरखता है एवं दिव्य दंपति की उसी प्रेम लीला को ही नित्य सुनता और सुनाता है। [1] ...

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नव निकुंज मन कौं अगम

नव निकुंज वन मन-बुद्धि से अगम्य है, जहाँ असंख्य कामदेव भी सेवा में तत्पर रहते हैं। वही श्री श्यामा-श्याम की दिव्य केलि-स्थली है, जहाँ प्रेम-रस का अखंड...

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अष्ट सिद्धि नव निद्धि जिहीं

श्री बरसाना धाम की जय हो जहाँ अष्ट सिद्धि एवं नवों निधि विचरण करते हैं, और जहाँ श्री लक्ष्मी जी दासी बनकर श्री राधारानी के महल की सेवा प्राप्ति हेतु द...

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हम तो बरसाने के बासी

हम श्री बरसाना धाम के वासी हैं कहाँ सुंदर गह्वर वन है, ब्रह्म पर्वत है, साँकरी खोर आदि हैं, जहां की ठौर सुंदर एवं रस बरसाने वाली है। [1] जहां के कुंड...

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करिये ब्रज बासिन सौं नेह

ब्रज वासियों से प्रेम बढ़ाइए क्योंकि ब्रजवासी नख से सिख तक (संपूर्ण रूप से) प्रेम के सागर से ओतप्रोत रहते हैं जिनमें कभी भी प्रेम का खंडन नहीं होता। [...

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गौर-साँवरे रसिक दोऊ, यह दीजे सुखरास

हे सुख सिंधु, गौर साँवरे रसिक दंपति श्री राधा कृष्ण! मुझपर ऐसी कृपा करो कि अब मैं कभी ब्रज का वास त्याग कर कहीं और न जाऊँ।

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हमारी बाँह गही वृन्दावन

वृंदावन ने मुझे मेरी बाँहों से पकड़ लिया है। मुझे अपनी शीतल छाया प्रदान कर, संसार के दुख-द्वंद्वों के तापों से सदा के लिए छुड़ा लिया है। [1] मेरे में...

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ये ब्रजबासी हरि के प्यारे

ये ब्रजवासी श्री हरि के प्यारे हैं। वे हरि में हैं, और हरि उनमें सदा रहते हैं, एक क्षण को भी नहीं बिछड़ते। [1] इंद्र आदि देव और अन्य असुरों के प्रकोप...

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ज्यौं ज्यौं इत देखियत

एक बार श्री नागरीदास जी को किसी विशेष कारण से मरुस्थल जाना पड़ा। वहाँ की निर्जन भूमि में निवास करते हुए उनके हृदय में ब्रज की गहन स्मृति जाग उठी — जैस...

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और जाकी वंशी सुनिबे कौं तरसत

जिस बांसुरी की ध्वनि को सारी सृष्टि सुनने को तरसती है, वे श्रीकृष्ण श्री राधा की बोली को सुनने के लिए व्याकुल रहते हैं। [1] जिनकी कृपा पाने को सभी ...

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नागिरि नागर भाव तैं मंगल रूप रसाल

दिव्य युगल श्री राधा-कृष्ण अद्भुत रस को बरसाने वाली परम मंगलकारी जोड़ी हैं। नित्य मंगलमयी भूमि श्रीधाम वृंदावन में, प्रेम और रस की दिव्य होली नित्य ही...

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ऐसौ बरसानों निरखि गहबर आयो प्रेम

ऐसे दिव्य बरसाने के दर्शन कर, गह्वर वन आदि को निहारकर, हृदय में प्रेम की तरंग उमड़ पड़ी। जैसे ही इस पावन भूमि को भावपूर्वक दण्डवत प्रणाम किया और इसकी ...

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रंगीली गलिन बिच हो हो होरी

बरसाना की रंगी गली में अपार उमंग के साथ होली खेली जा रही है। एक ओर नन्दनन्दन रसिक श्रीकृष्ण हैं और दूसरी ओर वृषभानुनंदिनी श्रीराधा अपनी सखियों सहित वि...

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जाकों कहिये मूढ जग

जो जीव श्री यमुना जी के पावन तट और दिव्य श्री वृन्दावन धाम की अलौकिक रस-संपदा को त्यागकर, सांसारिक सुख-सुविधाओं की खोज में बीकानेर या अन्य स्थलों की ओ...

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जग लक्ष्मी सेवत जु वह सेवत हरि के पाय

पूरा संसार लक्ष्मी जी की सेवा करता है, वही लक्ष्मी जी श्री हरि के चरणों की सेवा करती हैं, और वही श्री हरि नित्य श्री राधा के चरणों की सेवा कर उनके चरण...

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तेरे नैन सावन की कारी अंधियारी घटा

श्री राधा श्री कृष्ण से कहती हैं: तुम्हारी आँखें यदि श्रावण महीने की वर्षा वाले काले बादलों की तरह हैं, तो मेरे नैन उनके ऊपर भारी गरजने वाले घनघोर बाद...

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अब तो करिये कृपा विहारी

हे बिहारी जी, अब तो आप हमपर कृपा कीजिए। जग जंजाल से हमें निकल कर आप हमें वहाँ बसाइए जहां आपकी कुंज (वृंदावन) है। [1] वृंदावन धाम में हम जब बसेंगे तब ...

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ब्रज के परम सनेही लोग

ब्रजवासी अत्यंत स्नेही और सरल हृदय लोग हैं। वे प्रेमपूर्वक गाली देते हैं, और हँसते हुए मिलते हैं। उनका हृदय स्नेह से परिपूर्ण हैं। [1] दिव्य दंपति श्...

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कब श्री वृन्दावन धरनि

श्री वृन्दावन धाम की पवित्र भूमि पर चरण रखने का अवसर मुझे कब प्राप्त होगा? मैं उस रज में लोट जाऊँगा, कुछ अपने सिर पर धरूँगा और कुछ मुख में धारण करूँगा...

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कीरति महारानी, वृषभानु आदि गोपी गोप

यदि श्री राधा ब्रज में प्रकट नहीं होती तो महारानी कीर्ति एवं महाराज वृषभानु जी समेत समस्त गोप और गोपियां इस कलयुग में भी कैसे धन्य कहलाए जाते। [1] यद...

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धन्य-धन्य है जोई पुरान

धन्य हैं वे शास्त्र जिनमें श्री वृंदावन धाम की सुंदर और अमृतमयी कथाएँ हैं। [1] मेरे कान ऐसी कथा का श्रवण कभी ना करें जिसमे श्री वृन्दावन धाम की महिमा ...

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यह वृन्दावन यह समैं

इस समय श्री वृन्दावन धाम में दिव्य दम्पति श्री राधा–कृष्ण की प्रीति अत्यन्त अद्भुत है। श्री नागरीदास जी कहते हैं कि उनके हृदय में यह नित्य-विहार की रस...

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अब तो कृपा करो श्री राधा

हे श्रीराधा, अब तो कृपा कर दीजिए। संसार के बंधन को छुड़ाकर मुझे वृंदावन का वास प्रदान कर दीजिए। [1] तीनों लोक वृंदावन धाम की ललित लीलाओं का गान कर रहे...

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दोऊ कोक कलानि में, पंडित परम प्रवीन

श्री प्रिया-प्रियतम (राधा-कृष्ण) दोनों ही रति-कलाओं और दिव्य प्रेम-क्रीड़ाओं में परम चतुर और प्रवीण हैं। इस रस-विलास का जिह्वा द्वारा वर्णन करना असंभव...

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कबै झुकत मो ओर कौं

ऐसा कब होगा जब श्री प्रिया-लाल वृन्दावन में यमुना-तट पर लता-पत्तों के मध्य विहार करते हुए, एक-दूसरे को गलबहियाँ दिए, एक-दूसरे की ओर झुके हुए, अलमस्त ग...

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हमारी सब ही बात सुधारी

इस पद में नागरीदास कहते हैं कि अब तो श्री राधा कृष्ण ने कृपा करके हमारे जीवन की समस्त बिगड़ी बना दी। [1] उन्होंने वृंदावन में मुझे रखा जो रूप उजागर (र...

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हमारी सब ही बात सुधारी

इस पद में नागरीदास कहते हैं कि अब तो श्री राधा कृष्ण ने कृपा करके हमारे जीवन की समस्त बिगड़ी बना दी। [1] उन्होंने वृंदावन में मुझे रखा जो रूप उजागर (र...

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हरि राधा वृंदाविपिन

श्री राधा-कृष्ण वृन्दावन में नित्य ही विहार-रस बरसाते रहते हैं; अनन्त कल्प बीत चुके हैं, पर वे एक क्षण के लिए भी कभी बिछुड़ते नहीं।

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प्यारी के पाँइ लाल जावक दैन

प्राण-प्रियतम श्री श्यामसुन्दर अपनी स्वामिनी श्री राधा के सुकुमार चरण-कमलों में अत्यंत अनुरागपूर्वक लाल महावर (जावक) सजा रहे हैं। [1] वे प्रेममयी तूल...

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अब तो कृपा करो ललितादि अली

प्रस्तुत पद में श्री नागरीदास जी श्री राधारानी की सखियों से प्राथना कर रहे हैं: अब तो कृपा कर ही दीजिए ललिता इत्यादि सखियाँ। [1] मेरा तो एक मात्र साधन...