श्री नागरीदेव
जीवन चरित
श्री श्री नागरीदेव वाणी संग्रह
फूलन सौं सोहत अति स्यामा सुकुमारी
फूलों (प्रफुल्लताओं) की साड़ी-चोली और फूलों (प्रफुल्लताओं) के ही सारे आभूषण उन्होंने अपने श्री अंगों में धारण कर रखे हैं। रसिक शिरोमणि श्री बाँके बिहा...
कौन करै तप तर्पन तीरथ
एक नित्यविहार का अनन्य रसोपासक कहता है कि अब ऐसी अद्भुत रसोपासना के अतिरिक्त कौन तीन प्रकार के साधन—तप, तर्पण और तीर्थ-भ्रमण आदि में मन लगाए? [1] इसी...
फूलन के हार डोर, फूलनि की माला
नवल नागर रसिक शिरोमणि लाल ने बड़ी प्रफुल्लता से आज श्रीप्रियाजी का फूल श्रिंगार किया है। फूलों (प्रफुल्लता) की कलियों से ही उन्होंने हार की लड़ियों को...
श्रीनागरीदास अनन्य धन, धर्म सुदृढ उर धारि
श्री नागरीदास जी कहते हैं कि अनन्य भक्ति ही सच्चा धन है, इस धर्म को अपने हृदय में दृढ़ता से धारण कर लो। युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) के अनन्य प्रेम रू...
नित्य विहार सार सबको, अति दुर्लभ अगम अपार
हे भाई, समस्त परमार्थ-उपासनों का सार एवं अति दुर्लभ, अगम और अपार नित्य-विहार-रस ऐसा है कि उसमें अनन्य धर्म (प्रिया-प्रियतम के विहार) का अनुसरण करने वा...
हीरा कौं ललिचात लिवासी
ठौर-ठौर पर श्रद्धा रखने वाले जन सर्वोपरी नित्य-विहार-रस रूपी हीरे को ललचाते हैं, परंतु उन्हें इस वस्तु के स्वरूप का ठीक से ज्ञान नहीं है; अर्थात् वे अ...
आप कहावत रसिक कृपन मति
कुछ लोग संसार में स्वयं को रसिक कहलाते हैं, पर उनकी मति एवं सिद्धांत कृपणता से भरा होता है। वे कर्म, धर्म, विधि, निषेध के चक्करों में फँसे रहते हैं और...
मुसिक्यात जात सखी कहत बात
अरी सखी, आज प्रियालात परस्पर प्रेम-लपेटी अटपटी बातें करते हुए मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे हैं। प्रेमातिरेक से प्रमुदित यह दोनों आनंद की तरंगों में तैर रहे ...
अति निरपेक्ष संग संग्रह
सांसारिक आसक्तियों और संग्रह की प्रवृत्ति से सर्वथा विरक्त होकर, जब साधक स्वामी श्रीहरिदास जी द्वारा प्रवर्तित 'नित्य-विहार' रस को ही अपना परम लक्ष्य ...
नादी नृत्य निपुन बहु बांदी
शब्दों की चातुरी द्वारा वाद विवाद (बहस) करने वाले तो बहुत मिले, परंतु रस का वास्तविक स्वादी (रसिक) एक भी न मिल सका। हे नागरीदास! सहचरी भाव के दृढ़ अनन...
श्रीगुरु सन्धि सुभाव न पावत
सर्वोपरि नित्य विहार के दाता स्वामी श्री हरिदास जी महाराज के सिद्धांत एवं स्वभाव की संधि न प्राप्त होने के कारण, धूर्त लोग केवल संसार के यश को ही गाते...
बखानत प्रेम प्रताप महातम
श्री नागरीदेव जी कहते हैं — हे भाई! प्रेम को तुम प्रताप एवं माहात्म्य में मिलाकर वर्णन करते हो, इसलिए तुम्हारी रसिकता का स्वांग सच न होकर परखने पर कच्...
कुंज पुलिन कौतिक घनौं मिलि खेलत रस रासि
श्री धाम वृंदावन में, श्री यमुना के तट पर स्थित नवनिकुंजों में, श्री युगल (श्री राधा-कृष्ण) अगाध प्रेम से भरे नए-नए कौतुक खेल रहे हैं। हे नागरीदास! य...
रोग भोग सुख देह दुख
देह से संबंधित सुख-दुख, रोग-भोग, और सर्दी-गर्मी स्वाभाविक रूप से आते-जाते रहते हैं। अतः हे नागरीदास, इन सभी प्रपंचों को भलीभाँति त्याग कर, श्री युगल (...
कै खानों कै सोवनौं
हे भाई, तुम अपने समय को केवल खाने/पीने, सोने पुन: उठने में ही व्यतीत कर रहे हो, तुम यह बात स्पष्टता से समझ लो कि प्रभु का मन से अनन्य एवं नित्य भजन कि...
अब कोउ कहो कूर कुटिल यह
हे भाई! चाहे अब कोई हमें क्रूर, कुटिल, कृपण, कामी अथवा मौनी क्यों न कहे — इन बातों की ओर हमारा कोई ध्यान ही नहीं है। श्रीस्वामी हरिदास जी की कृपा से र...
राखि हृदै प्रिय प्रेम सुधा-रस
यह पद साधक के उस करुण भाव को प्रकट करता है, जहाँ वह श्री नित्यविहारिणी जू (श्री राधा) से विनम्र निवेदन करता है— हे स्वामिनी! आप तो प्रेमरस की अमृतधारा...
बिपुल बिहारिनिदासि तैं अब छिन छिन मन आनंद
श्री बीठलविपुलदेव जू एवं श्री बिहारिनदेव जू के संग से मेरा मन अब प्रतिक्षण आनंद में निमग्न रहता है। इन्हीं की कृपा-बल से नित्य दूल्हा-दुल्हन, श्री श्य...