श्री राधा सुधा निधि
जीवन चरित
श्री श्री राधा सुधा निधि वाणी संग्रह
कामं तूलिकया करेण हरिणा यालक्तकैरकिंता
श्री कृष्ण ने अपने हाथ से भली भांति जिन्हें महावर से अंकित किया, जो नाना केलियों में चतुर गोपांगनाओं के यूथ में वंदित हैं तथा जो वेद शिरोरूप उपनिषदों ...
कालिन्दी – तट कुञ्ज-मंदिरगतो
योगीन्द्रों के समान जिनकी चरण-ज्योति के ध्यान-परायण होकर प्रेमाश्रु-पूर्ण नेत्र तथा गद्-गद् वाणी से कालिन्दी-तट के किसी निकुञ्ज मन्दिर में विराजमान् श...
यस्यास्तत्सुकुमार सुन्दर पदोन्मीलन्नखेन्दुच्छटा
जिनके उन सुकुमार एवं सुन्दर चरणों के प्रफुल्लित नखेन्दु की छटा के लावण्य का लव-मात्र ही समस्त श्यामा-रमणी मणियों के पूर्ण मण्डल का जीवन है। जो शुद्ध ...
यद् वृन्दावन मात्र गोचरमहो यन्न श्रुतीकं शिरो- श्री हित हरिवंश महाप्रभु
अहो जो केवल श्रीवृन्दावन में ही दृष्टिगोचर होता है, अन्यत्र कहीं नहीं। जिसका वर्णन करने में श्रुति-शिरोभाग उपनिषद् भी समर्थ नहीं हैं। जो शिव और शुक आ...
उन्मीलनमुकुटच्छटा परिल सच्छिकच्रकवालं स्फुरत- मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु
मेरे मन तू तो श्री ‘राधा’ नामक ज्योति का ही भजन कर जिनके देदीप्यमान मुकुट की छटा से दिशा-मण्डल विलसित हो रहा है। जो केयूर, अङ्गद, हार और कड्कणो की छटा...
यत्र-यत्र मम जन्म कर्मभिर्नारकेऽथ परमे पदेऽथवा
कर्मवशतः नरक में अथवा स्वर्ग में जहां जहाँ मेरा जन्म हो अथवा परम पद में ही क्यों न चला जाऊँ किन्तु वहाँ-वहाँ श्रीराधा केलि निकुञ्ज मण्डली [श्रीप्रिया,...
धर्माद्यर्थ चतुष्टयं विजयतं किं तदवृथा वार्त्तया
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये उत्तम चार फल यदि विश्व में उत्कृष्टता को प्राप्त हैं तो भले ही रहें, हमें इनकी व्यर्थ चर्चा से क्या और ईश्वर की उस एकान्त ...
देवानामथ भक्त मुक्त सुहृदामत्यन्त दूरं च यत्
जो देवताओं, भक्तों, मुक्तों और स्वयं श्रीलालजी के सुहृद-वर्गों से भी अत्यन्त दूर है, जो प्रेमानन्द-रस स्वरूप है, जो प्रेम-पूर्वक उच्चरित हो पर महा सुख...