सन्तग्रन्थरागश्लोकस्तोत्रकविता
मुख्यपृष्ठसंतश्री रूप माधुरी
सभी संत

जीवन चरित

ब्रज परंपरा के वैष्णव संत।

श्री श्री रूप माधुरी वाणी संग्रह

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रसिकन की रसना सदा जपै युगल को नाम

रसिकों की रसना सदैव युगल किशोर श्री राधा-कृष्ण का नाम जपती है एवं उनका हृदय आठों याम उनकी रूप-माधुरी में डूबा रहता है।

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श्रीराधा राधा नाम की रटना जिनके सार

जिनके जीवन का सार “श्री राधा-राधा” नाम का भजन है, ऐसे रसिक जनों पर मैं नित्य बलिहार जाता हूँ।

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श्रीराधा के नाम की रटना रखै जो नित्त

श्रीराधा के नाम की, रटना रखै जो नित्त। "रूप माधुरी" तासु को, सहजहि थिर हो चित्त॥ - श्री रूप माधुरी, श्री रूप माधुरी जी की वाणी, श्री राधा नाम अंक (20)...

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रसिक छके युग नेह में

रसिक प्रेमी सदा युगल के प्रेम से छके रहकर, समस्त विधि निषेध एवं अन्य किसी की परवाह न करते हुए बेपरवाही में रहते हैं। वे रूप माधुरी में मस्त होकर समस्त...

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बिना भजन युगलाल के तरै न तरिहैं जान

समस्त रसिकों के वाक्यों का यही परम सत्य और प्रामाणिक निष्कर्ष है कि श्रीयुगल सरकार के अनन्य एवं निष्काम भजन के बिना इस संसार-सागर से न तो कोई आज तक तर...

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भाव प्रेम अरु नेम है

भाव ही प्रेम और नियम है एवं भाव ही साधन का सार है। श्री रूपमधुरी जी कहते हैं कि भाव के बिना जीव संसार में ही बार बार भटकता रहता है।

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लाल लली के रस छके नशी वासना जक्त

रसिक भक्त युगल सरकार श्री राधा कृष्ण के रस में ऐसे छके रहते हैं जिससे वे सांसारिक वासनों को त्यागकर सहजता से ही विरक्त हो जाते हैं।

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गौर श्याम के प्रेम की

रसिकों के ह्रदय में क्षण-क्षण श्री राधा कृष्ण के प्रेम की लहर उठती रहती है जिससे दिन-प्रतिदिन उनकी दीनता भाव बढ़ता रहता है।

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रसिकन की रसना सदा, जपै युगल को नाम

रसिकों की रसना सदा युगल नाम जपती है एवं उनका मन दिन-रात, आठों पहर, युगल (श्री राधा कृष्ण) के रूप में लीन रहता है।

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हमता ममता मन भरी, व्यर्थ बजावत गाल

कुछ तथाकथित साधकों की अहंता और सांसारिक ममता मन में ज्यों की त्यों बनी रहती है और ऊपर से वे व्यर्थ में स्वयं को रसिक कहलाने में लगे रहते हैं। श्री रूप...

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विपिन वास दैनी प्रिया करुणा की भंडार

करुणा की भंडार श्री प्यारी जू (श्री राधा) ने कृपा कर मुझे श्री धाम वृंदावन का वास प्रदान किया है। जिन पर श्री राधा अपनी थोड़ी सी दृष्टि डाल देती हैं, ...

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रसिक रसिक सब कोऊ कहै

“रसिक रसिक” तो स्वयं को हर कोई कहलाना चाहता है परंतु रसिकता आनी अत्यंत कठिन होती है। साधक बाहर से तो दीनता का स्वाँग कर लेता है परंतु अंतर मन में दीनत...

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प्राणजीवन के नेह में तन मन से रहे चूर

जिसका तन-मन अपने प्राण-जीवन-धन (श्री श्यामा-श्याम) के प्रेम में सदा उन्मत्त रहता है, वही सच्चा (शूरवीर) रसिक है। चाहे वह घर में रहे या वन में, उसका मन...

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उर प्रकाश हो रूप को

यदि कोई “श्री राधा” नाम का सतत जप करने का नियम दृढ़ता से धारण कर ले, तो शीघ्र ही उसके हृदय में श्री राधा का दिव्य रूप प्रकाशित होने लगे और नेत्रों में...

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कुंजभवन सर्वेश्वरी साहिबनी सिरताज

कुंजभवन सर्वेश्वरी, साहिबनी सिरताज। आनन्दकन्दनी मृदुल चित्त, सदा गरीबनिवाज॥ - श्री रूप माधुरी, श्री रूप माधुरी जी की वाणी, श्री राधा नाम अंक (16) क...

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रसविलसनी रसमगन नित

श्री रूपमाधुरी जी प्रार्थना करते हैं कि जो सदैव रस-विलास में निमग्न रहती हैं और जिनकी अनुपम छवि प्रत्येक क्षण नवीन एवं अद्भुत प्रतीत होती है, ऐसी श्री...

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भाव अनोखी वस्तु है जो कर जाने कोय

‘भाव’ अर्थात आंतरिक भावना एक विलक्षण तत्व है, जिसका वास्तविक मर्म कोई विरला व्यक्ति ही अनुभूति द्वारा जान पाता है। श्री रूपमाधुरी जी कहते हैं कि संसार...