सन्तग्रन्थरागश्लोकस्तोत्रकविता
मुख्यपृष्ठसंतश्री ठाकुर
सभी संत

जीवन चरित

ब्रज परंपरा के वैष्णव संत।

श्री श्री ठाकुर वाणी संग्रह

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कानन दूसरो नाम सुनै नहिं, एकहि रंग रँगो यह डोरो

ठाकुर श्री बाँके बिहारी का एक अनन्य भक्त अपनी अनन्यता प्रकट करता हुआ कहता है— इन कानों को अब किसी दूसरे नाम का श्रवण पसंद नहीं; यह मन तो केवल एक ही रं...

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जब तें दरसे मनमोहन जू तब तें अँखियाँ ये लगीं सो लगीं

जब से श्रीकृष्ण की मोहिनी मूरत का दर्शन हुआ है, तब से उनकी वह छवि मेरी आँखों में बस गई है। [1] हे सखी! कुल की मर्यादा और बाहरी लाज सब चली गई, क्योंकि...

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अब का समुझावती को समुझै

एक सखी दूसरी से कहती है — अब तू क्या समझाएगी और कौन तुझे समझेगा? बदनामी का बीज तो तू पहले ही बो चुकी है। अब इतना सोच-विचार करने से क्या लाभ? जब स्वयं ...

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रोज न आइए जो मनमोहन

हे मनमोहन श्री बाँके बिहारी! यदि आप प्रतिदिन न आ सकें, तो कृपा करके हमारी विनती स्वीकार करें। [1] अब हमारे नेत्र आपके हो चुके हैं, आपको देखे बिना हम...

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वह कंज सो कोमल

एक सखी श्री राधा से परिहास अथवा मनुहार करते हुए कहती है— हे सखी! तुम यह भली-भांति जानती हो कि गोपाल (श्री कृष्ण) के अंग कमल के समान अत्यंत कोमल हैं। म...

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कोमलता कंज ते गुलाब ते सुगन्ध लैकें

कमल की कोमलता, गुलाब की सुगंध और चंद्रमा की शीतल आभा को लेकर, हे श्रीराधा, तुम्हारा अनुपम रूप साकार हुआ है। [1] तुम्हारा मुख रति के मुख की भाँति मन...