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डैशबोर्डज्ञान कोषश्री हित चौरासी
ग्रंथ

श्री हित चौरासी जी

हित चौरासी श्री राधावल्लभ संप्रदाय का प्राण ग्रंथ है, जिसकी रचना श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने की थी। ब्रजभाषा के इस ग्रंथ में ८४ पदों (गीतों) का संग्रह है, जो निकुंज वन के भीतर श्री राधा कृष्ण के अखंड विलास और अष्टयाम सेवा पद्धति का सजीव वर्णन करते हैं।

मूल पद एवं प्रमाण (पद १)

ग्रंथ का शुभारंभ इस विख्यात मंगलाचरण पद से होता है:

जोई जोई प्यारो करे सोई मोहि भावे।

भावे मोहि जोई सोई सोई प्यारे भावे॥

जैसे कहुं रहिये जहां श्याम राखें।

तहां तहां रहिये सुख की रति चाखें॥

अर्थ: जो कुछ भी मेरे प्यारे (श्यामसुंदर) को प्रिय लगता है, वही मेरे मन को भाता है। और जो कुछ मेरे मन को भाता है, वही श्यामसुंदर को भी प्रिय लगता है। श्यामसुंदर हमें जिस स्थान पर और जिस परिस्थिति में रखते हैं, हम वहीं रहकर सुख पूर्वक उस दिव्य रस का आस्वादन करते हैं।

हस्तलिखित पांडुलिपि विवरण

हित चौरासी के पदों पर पूर्ववर्ती ४० से अधिक आचार्यों ने टीकाएँ लिखी हैं। संवत १७६२ की श्री चाचा वृंदावनदास जी कृत प्राचीनतम संस्कृत-ब्रजभाषा टीका की पांडुलिपि व्यास घेरा पुस्तकालय में सुरक्षित है। वर्तमान समय में गीता प्रेस द्वारा इसका प्रामाणिक मिलान संस्करण प्रकाशित है।

ग्रंथ की रस व्याख्या

हित चौरासी कोई सैद्धांतिक शुष्क पुस्तक नहीं है, बल्कि यह एक संगीतबद्ध ग्रंथ है। प्रत्येक पद एक निश्चित राग (जैसे राग बिलावल, राग केदारा) में निबद्ध है। इसके पदों में युगल सरकार के शृंगार, जल-क्रीड़ा, रास और शयन लीला का वर्णन है। यह साधक को सिखाता है कि कैसे सखी भाव में रहकर युगल की अंतरंग सेवा (जैसे चंवर ढोरना, पान बीड़ा अर्पित करना) की जाती है।