shri braj nidhi
Biography & History
shri braj nidhi Collected Verses
लाग गई तब लाज कहा री
श्री ब्रज निधि जी कहते हैं "जब मेरी आँखें श्री नन्दनन्दन से लड़ गयी हैं तो फिर लज्जा कैसी, मुझे अब औरों से कोई काम नहीं।" [1] मैंने श्री कृष्ण की रूप ...
प्यारी जू की चितवनि में कछु टोना
श्री प्रिया जी के नैंन चंचल एवं मद में ऐसे भरे हैं जिनको देखकर मृग, खंजन एवं मीन भी लजा रहे हैं। श्री ब्रजनिधि जी कहते हैं कि श्री कुंज बिहारी श्री प्...
आनंद अगाधा लहै साधा सुख सेवत ही
जिनकी सेवा करके अगाध अनन्द की प्राप्ति होती है; जिनकी आराधना करने से अशरणों को भी शरण मिलती है (अथवा जो श्री कृष्ण समस्त अशरणों को शरण देते हैं वे भी ...
या वृंदावन की बानिक याही पै बनि आवै
श्री वृंदावन धाम की समानता केवल वृंदावन धाम ही कर सकता है जहां यमुना का मनोहर पुलिन है, जहां सुंदर वंशीवट है जहां श्री कृष्ण ने मुरली बजाई थी। [1] जह...
लोक चतुर्दस ही सदा, हरि चरनन नित ध्यान
जिन श्री हरि की ऐसी महिमा है कि उनके चरणों का ध्यान चौदहों लोक नित्य करते हैं, वे श्री हरि, कृष्ण रूप में, वृंदावन की महारानी श्री राधारानी के चरणों म...
श्री राधा सुख चंद देखि
श्री राधा के मुख चन्द्र को देख कर कोटि चन्द्रमा को न्यौछवार कर दो। [1] उनकी दन्त पंक्तियों पर दामिनी, नासिका पर शुक (तोता), भौंह पर धनुष को न्यौछवार ...
कृपा करो वृन्दावन रानी
हे वृंदावन की महारानी, श्री राधा रानी, मुझ पर कृपा कीजिए। तुम्हारी महिमा अगाध एवं अपरंपार है जिसका पार वेद भी नहीं पा सकते अत: वे नेती नेती कह कर वर्ण...
लगैं मोहिं स्वामिनी नीकी
मुझे मेरी स्वामिनी श्री राधिका बहुत प्यारी लगती हैं। उनके मृग के समान नैन हैं, कोयल के समान वाणी है, एवं प्रियतम श्री श्यामसुन्दर को सुख दान करने वाली...
तीर्थ सबै देखे सुने
तीर्थ तो बहुत देखे एवं सुने हैं परंतु इस ब्रज भूमि के समान कोई नहीं है जहाँ की रज आज भी श्रीकृष्ण के श्रीचरणों के स्पर्श और उनके अलौकिक अनुराग से ओतप्...
स्वामिनी की कृपासों आधीन हुयी हैं ब्रजनिधि
इन ब्रज की महारानी, श्री राधारानी की कृपा से ही आप उनपर निर्भर हो गए हैं, और ब्रज निधि पा ली, यहां तक कि भगवान कृष्ण भी नित्य उनका अनुसरण करते हैं। इस...
काली कहै मो मैं है रु
जिनका पार माता काली, भगवान शिव एवं ब्रह्मा भी पाने में असमर्थ हैं। [1] जिनकी भक्ति इंद्र, वरुण एवं कुबेर आदि देवता करते रहते हैं। [2] यमराज, शेषनाग ...
कुँवरि किसोरी नवल पिय करत परस्पर हेत
कुंवरी किशोरी श्री राधा और नवल रसिक श्री कृष्ण परस्पर प्रेम के बंधन में बँधे हैं। केवल थोड़ी-सी मुस्कान से ही वे मेरे मन को हर लेते हैं।
हमारी बृंदावन रजधानी
श्री वृन्दावन समस्त तीर्थों का शिरोमणि, रसिकों की राजधानी है, जहाँ निधिवन के अधिपति, ब्रजराज लाड़िले श्रीकृष्ण नित्य विराजमान हैं, और श्री राधा रानी ...
मन मेरे मीत जोपै कह्यो माने मेरो तौं
- श्री हठी जी कहते हैं, हे प्रिय मन, मेरे प्रिय मित्र, अगर तुम मेरी बात मानो तो मैं तुमसे यही कहता हूँ कि श्री किशोरी जु के चरण कमल के मधुर रस पर भ...