shri lalit viharini
Biography & History
shri lalit viharini Collected Verses
पुनि कब ह्वै है कृपा घनेरी
अब ऐसी कृपा की अद्बुत वर्षा कब होगी जब श्री वृंदावन का सुखदवास प्राप्त हो एवं श्री बाँके बिहारी की चितवन को निहारने का अवसर मिल जाए। [1] जब श्री हरि ...
वृन्दाविपिन बनाऊँगी घर तजि कै सब संसार
एक सखी कहती है कि मैं सब संसार का त्याग कर वृंदावन में ही घर बनाऊँगी। यह जीवन तभी सुखी होगा जब नंदकुमार श्याम सुंदर मिलेंगे। [1] मैं वृन्दावन की कुंज...
पलकन सौं रज झारूँ श्रीवन की
जिस निकुंज वन की सघन कुंजों में श्री श्यामाश्याम सुख पूर्वक विहार करते हैं, उस वृंदावन की रज को मैं अपने आँखों की पलकों से झाड़ूंगा। [1] उस वन में श्र...
एती कृपा स्वामिनि मन चाहै
हे स्वामिनी जी [श्री राधा]! मेरे ऊपर इतनी कृपा करो कि मेरे हृदय से यह दोष जैसे परनिंदा, अभिमान, ईर्ष्या, भेद भावना इत्यदी सब समाप्त हो जाएँ। [1] हे प...
जब जब वृन्दावन सुधि आवत
जब भी मेरा मन वृंदावन का स्मरण करता है तो मेरे हृदय के आकाश में वियोग की वेदना उत्पन्न हो जाती है और मेरी आंखों से अश्रुधार प्रवाहित होने लगते हैं। [1...
ऐसो कब करिहो प्रिया-प्रीतम
हे प्रिया-प्रियतम! आप मेरे मन को कब ऐसा बनाएंगे कि मैं आपके निज महल में प्रेमपूर्वक और निरंतर सेवा कर सकूं? [1] कब मेरे नेत्र आपकी अद्भुत रूप-माधुरी ...
देर करो जनि नैक उबारो
हे श्री श्यामा श्याम, अब देर न कीजिये, मुझे उबार लीजिये। बहिर्मुख होने के कारण मैं भवसागर में गोते खा रहा हूँ, केवल आपके ही सहारे से मैं इससे निकल पाउ...
श्याम दृगन की चोट सहे को
जो जीव श्यामसुंदर के नयनों के कटाक्षों से घायल होता है, उसका हाल केवल उसका ह्रदय ही जानता है। उसकी दशा ऐसी होती है कि वह जीव किसी अन्य से अपने ह्रदय क...
जब ते निरखी छबि तेरी लला
हे बाँके बिहारी! जब से तुम्हारी मनोहर छवि को निहारा है, तब से ऐसी दशा बनी है जिसका पार पाना अत्यंत कठिन हो गया है। [1] तुम्हारी बाँकी चितवन के तिरछे ...
कृष्ण कृपालु कृपाकण गेरो
हे कृपालु श्री कृष्ण, अपनी अकारण कृपा के कुछ कणों की मुझ पर भी वर्षा कीजिये! मेरा मन मुर्ख सदा मिथ्या सुख की चाह में ही नित्य भटकता रहता है। [1] मुझे...
मोहि किन दैव कियो ब्रजवासी
हे विधाता, तुम्हारी कृपा से मुझे ब्रजवासी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है जिसके परिणाम स्वरूप मुझे श्री राधा कृष्ण के चरणों की परम पावन रज को सदा स्पर्...
श्रीराधा रूप-लावण्य की वन्या
श्री राधा रूप एवं सौंदर्य की सदा प्रवाहित होने वाली नदी के समान हैं। वे सुंदर, सुकोमल, स्वर्ण के समान कांति वाली गोरी हैं जो श्री कृष्ण की प्रियतमा तथ...
रे घनश्याम बिना रस रीते
हे घनश्याम, तुम्हारे बिना मैं रसहीन हो गई हूँ। यह प्रिय सावन ऋतु का आगमन हुआ है, परंतु तुम्हारे बिना इसे बिताना कठिन हो रहा है। तुमसे प्रेम करके मैं ...
एती कृपा स्वामिनि मन चाहै
हे स्वामिनीजू (श्री राधा), मुझ पर इतनी कृपा कर दीजिए कि मेरे मन से समस्त विकार, जैसे परनिंदा, अभिमान, ईर्ष्या और भेद-भाव सदा के लिए समाप्त हो जाएं। [1...
प्रेम सदन की कठिन गली री
जिस गली में प्रेम सदन है, उस गली में चलना अत्यंत कठिन है। या तो इस मार्ग को ब्रज चंद्र साँवरे लाल श्री कृष्ण जानते हैं या फिर सर्वोपरि नित्य बिहारिनि ...
मम हिये आय बसहु प्रिय जोरी
श्री ललित विहरिणि जी युगल से प्रार्थना कर कहते हैं कि हे रसिक शिरोमणि श्री श्याम सुंदर एवं रास रासेश्वरी भानु नंदिनी श्री राधिका जी ऐसी कृपा करो कि आप...
श्रीराधाजी के चरण अति नीके
श्री राधारानी के चरण बड़े अच्छे लगते हैं, जो बड़े ही सुन्दर, सरस एवं कमल के समान हैं और श्री श्यामसुंदर के ह्रदय-सरोवर में नित्य विराजमान हैं। [1] श्री...