shri rasanidhi
Biography & History
shri rasanidhi Collected Verses
रस ही में औ रसिक में, आपुहि कियौ उदोत
भगवान ने रस में और रसिक में अपने आप को ही प्रकाशित किया है। स्वाति-बूँद में वही है और उसी को ग्रहण करने वाला चातक भी वही है।
दंपति चरण सरोज पै, जो अलि मन मंडराई
श्री राधा-कृष्ण के चरण-कमलों पर जिनका मन-रूपी भ्रमर मँडराता रहता है, उनके दासों के भी दास की संगति मुझे बहुत सुहावनी लगती है।
गंग प्रगट जिहि चरण तैं
रसनिधि कहते हैं कि श्री कृष्ण के जिन चरणों से गंगा प्रकट हुई और उसने सारे संसार को पवित्र कर दिया, मैंने भगवान के उन्हीं चरणों का सहारा ले लिया है।
रोम रोम जो अघ भर्यो पतितन में सिरनाम
हे प्रभु! मेरे रोम-रोम में पाप भरे हुए हैं; मैं पापियों में शिरोमणि हूँ। रसनिधि कहते हैं, हे प्रभु! ऐसे मुझ पापी का निर्वाह करना तो आपका ही काम है।
नेत नेत कहि निगम पुनि जाहि सकै नहिं जान
जिस ब्रह्म का वेदादि शास्त्र ‘नेति नेति’—‘कहीं आदि-अंत नहीं है’ ऐसा कहकर कुछ भी जानने में असमर्थ हैं, वही पूर्ण परब्रह्म भगवान ब्रज में श्रीकृष्ण के म...
भूले तैं करतार के रागु न आवै रास
यदि मनुष्य भजन गाते हुए खड़ताल को भूल जाय तो राग की लय भंग हो जाती है। ठीक उसी प्रकार, यदि मन को उस करतार (भगवान) में न जोड़ा जाए और केवल इन्द्रियाँ ...