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Biography & History

Vaishnava saint of the Braj tradition.

shri vrindavan devacharya Collected Verses

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वृंदावन गिरी तैं चली रस की उठत तरंग

वृन्दावन हिमगिरि से प्रवाहित इस गीतामृत-गंगा की रस-धारा से रस की तरंगें उठती हैं, जिनमें रसिक भक्तों के मन नित्य स्नान करते रहते हैं।

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बक विषयीजन परस इहि वेऊ विमल ह्वै जाउ

जिस प्रकार पारसमणि के स्पर्श से लौह-धातु भी स्वर्ण-रूप में परिवर्तित होने लगती है, चाहे वह स्पर्श जान-बूझकर किया गया हो या अनजाने में, उसी प्रकार भक्त...

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नेह निगौड़े को पैडौ ही न्यारौ

प्रेम के मार्ग की गति ही न्यारी है। जो भी इस मार्ग का पथिक है उसे अंधा होकर ही चलना होता है (अर्थात् यहाँ आत्मसमर्पण कर चला जाता है और प्रेमास्पद के ब...

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कबहुँ न विछुरै जोरि यह, दम्पति जनमन चोर

जैसे सूर्य की किरणें सूर्य से कभी पृथक नहीं होतीं, वैसे ही श्रीहरि और श्री राधिका एक क्षण के लिए भी अलग नहीं होते—दोनों सदा अभिन्न हैं।

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कबहुँ न विछुरै जोरि यह, दम्पति जनमन चोर

यह दिव्य जोड़ी (श्री राधा-कृष्ण) एक क्षण के लिए भी बिछुड़ती नहीं है एवं सबके मन को हर लेने वाली है। यह सदा एकरस रहती है, और प्रेम में सराबोर होकर नित्...