भक्तिरसामृत सिन्धु में श्रील रूपगोस्वामी, भक्ति के क्रमिक विकास का वर्णन करते हुए कहते हैं कि:- आदौ श्रद्धा ततः साधुसंगोऽथ भजनक्रिया। ततोऽनर्थनिवृत्ति...