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अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध]

Verses & Passages

12 items
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प्रथम महातम प्रकृति

आनंद के सात परिवेश है। उनमें श्रीप्रिया प्रियतम की केलि चरम परिवेश में है। वही सातवाँ परिवेश रसिकराय श्रीस्वामीहरिदासी का मंगल भवन है, इस बात को स्पष्...

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कागा कोयल, हंस बग, गुबरीला मदपान

कौवा और कोयल, हंस और बगुला तथा गुबरीला और भ्रमर—इन युग्मों में दोनों का रंग एक-दूसरे के समान होता है; अर्थात् कौवे का कोयल से, हंस का बगुले से और गुबर...

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मैं बोले मारी गई, देखौ अजया आँत

भगवत रसिक जी कहते हैं कि बकरी के “मैं-मैं” करने का परिणाम तो देखिए, वह “मैं-मैं” बोलने के कारण मारी गई। फिर उसी बकरी की अँतड़ी जब ताँत के रूप में धुनक...

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भगवत जन स्वाधीन नहिं

भले ही मनुष्य को लगे कि वह स्वतंत्र है परंतु वह कभी भी स्वतंत्र नहीं है, वह हर स्थिति में भगवान के सदा आधीन ही रहता है। जिस प्रकार डोर का विस्तार करने...

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ग्राम-सिंह भूंस्यौ बिपिन

एक गाँव के पास एक जंगल था, जहाँ एक दिन एक कुत्ता जंगल में घुस गया और शेर को देखकर भौंकने लगा। उसकी देखा-देखी गाँव के अन्य बेवकूफ कुत्ते भी बिना कारण भ...

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जाके बल मैं सब सों तोरी

वृन्दावन निकुंज की अधीश्वरी श्री राधारानी ही मेरी एक मात्र स्वामिनी हैं इन्ही के बल पर मैंने लोक, वेद, और कुल की सभी मर्यादाओं को तोड़कर फेंक दिया ...

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वेदनि खोबै बैद सो

सच्चा वैद्य वही है जो रोग को जड़ से मिटा दे, वास्तविक गुरु वही है जो गोविन्द से मिला दे, सच्चा भोजन वही है जो भूख मिटा दे। भगवत रसिक जी कहते हैं कि ऐस...

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सुनी सुनी सब कोउ कहै देखी कहै ने कोइ

संसार में अधिकांश लोग वेदों, शास्त्रों या अनुभवी महापुरुषों की बातों को बिना स्वयं अनुभव किए ही दोहराते रहते हैं। ऐसे व्यक्तियों की बातें प्रायः मिथ्य...

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हमारो वृंदावन उर ओर

हमारे ह्रदय में नित्य वृंदावन है, जो माया तथा काल से परे है, जहां समस्त रसिकों के दिव्य चूड़ामणि युगल सरकार श्री राधा कृष्ण नित्य निवास करते हैं।

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भगवत जन चकरी कियो

भगवत्-रसिक जी कहते हैं कि श्री लाड़िलीजी अपने भक्त को चकरी—अपने कर-कौशल का खिलौना—बना लेती हैं और उसे अपने प्रेम की डोर में लपेटकर रखती हैं। वे दिन-रा...

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जो कछु करौ सो समुझि कै

तुम जो कुछ भी कर रहे हो, उसे खूब सोच-समझकर करो। भगवतरसिक जी कहते हैं कि जिन लोगों ने बिना सोचे-समझे कर्म किया है, वे सब घने अंधकार में विलीन हो चुके ह...

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जीभ जुगल नामहिं जपै

साधक को चाहिए कि वह कुत्ते और मृगराज-सिंह की वृत्ति को त्यागकर मधुकरी वृत्ति से उदर-पूर्ति करता हुआ, जीभ से श्री युगल का नाम-स्मरण और नेत्रों से उनके ...