shri bhagavat rasik ki vani
Biography & History
shri bhagavat rasik ki vani Collected Verses
प्रथम महातम प्रकृति
आनंद के सात परिवेश है। उनमें श्रीप्रिया प्रियतम की केलि चरम परिवेश में है। वही सातवाँ परिवेश रसिकराय श्रीस्वामीहरिदासी का मंगल भवन है, इस बात को स्पष्...
सब ऐश्वर्य छिपाइ पाइँ परि
जो हरि, अन्यत्र षड ऎश्वर्य के अभिमानी है, वे यहाँ अपना सारा बड्डपन छिपाकर और श्री किशोरीजी के चरण कमलो में पड़े रहकर अत्यंत दीन बने रहते है। इन्होने मध...
कागा कोयल, हंस बग, गुबरीला मदपान
कौवा और कोयल, हंस और बगुला तथा गुबरीला और भ्रमर—इन युग्मों में दोनों का रंग एक-दूसरे के समान होता है; अर्थात् कौवे का कोयल से, हंस का बगुले से और गुबर...
तुष्ट पुष्ट तासौं रहैं
नित्य-विहार की इस दिव्य जोड़ी (श्री राधा-कृष्ण) को न तो बुढ़ापा स्पर्श करता है और न ही कोई रोग। ये दोनों कभी बाल्य या यौवनावस्था का भोग नहीं करते; ये ...
निहं हिंदू नहिं तुरक हम, नहिं जैनी अंग्रेज
हम न तो हिन्दू हैं, न ही मुसलमान (तुरक), न ही हम जैन हैं और न ही अंग्रेज। हमारी (सखियों) की तो बस एक ही पहचान और सेवा है—हम तो रसिक अनन्य भाव से नित्य...
गेरा मासे कौ गुरू, ताकौ सिष सब कोय
जो ग्यारह मासे भर (शुद्ध चाँदी) का बना है (अर्थात् रूपया, धन) वही सारे संसार का गुरु है, सब उसी धन के चेले चपाटे हैं। [1] जो कुछ भी आराधना उपासना संस...
परम पावन करुवा कौ पानी
भगवतरसिक जी कहते हैं कि ब्रज-रज से निर्मित करवे का जल परम पवित्र होता है। इस करवे का जल पीते ही श्री प्रियाप्रियतम सहज ही हृदय में आ विराजमान हो जाते...
वेषधारी हरि के उर सालै
श्रीहरि के भक्तों का वेश बनाकर भी जो व्यक्ति (खेल तमाशा दिखाने वाले) नट की तरह लोभ, पाखण्ड और कपट के सहारे इंद्रिय सुखों की प्राप्ति और उदर पूर्ति में...
जो कछु लिख्यौ ललाट में, दुख सुख देही संग
भाग्य में जो कुछ दुःख सुख लिखा है वह इस शरीर के साथ जुड़ा है। तुम जहाँ कहीं भी जाओगे, वहीं वह भोगना पड़ेगा। यह सिद्धांत अटल है। [1] इसलिए हे प्राणी, ...
जन्म मरन माया नहीं, जहँ निसि दिवस न होइ
जहाँ न जन्म है, न मृत्यु, न माया का प्रभाव और न दिन-रात का क्रम; उस दिव्य वृंदावन धाम में अनुपम रूप वाले लाड़िली लाल सदा अपने सच्चिदानंद स्वरूप में एक...
कामी कै प्रिय कामिनी लोभी कै प्रिय दाम
जैसे कामासक्त पुरुष को कामिनी अत्यंत प्रिय होती है और लोभी को धन अत्यंत प्रिय लगता है, उसी प्रकार रसिकों को श्री श्यामा-श्याम सहज भाव से प्रिय लगते है...
आँधे के सिर सम्प्रदा
आज कल जो संप्रदायवाद का नाटक चल रहा है उसके दृष्टांत को देखते हुए भगवत रसिक जी कहते हैं: एक समझदार एवं रसपरक भामिनी (पत्नी) अपने पति को प्रेमविहीन ए...
आसा जाकी जहँ बसी तहँ ताही कौ बास
गुहस्थ हो या विरक्त, स्वामी हो या सेवक, जिसका मन जहां आसक्त है बस वो उसके ही पास रहता है। [1] यदि कोई सांसारिक विषय में आसक्त है तो उस (संत, महात्मा,...
मैं बोले मारी गई, देखौ अजया आँत
भगवत रसिक जी कहते हैं कि बकरी के “मैं-मैं” करने का परिणाम तो देखिए, वह “मैं-मैं” बोलने के कारण मारी गई। फिर उसी बकरी की अँतड़ी जब ताँत के रूप में धुनक...
भगवत जन स्वाधीन नहिं
भले ही मनुष्य को लगे कि वह स्वतंत्र है परंतु वह कभी भी स्वतंत्र नहीं है, वह हर स्थिति में भगवान के सदा आधीन ही रहता है। जिस प्रकार डोर का विस्तार करने...
निसबासर तिथि मास रितु
उत्सव त्यौहारों से संबंधित समस्त सांसारिक व्यवहारों को त्यागकर नित्य निकुंज मंदिर के दिन रात, तिथि मास ऋतु और समस्त उत्सवों को भाव में ही देखना चाहिए।
जगत में पैसन ही की माँड
इस संसार में धन-दौलत का ही एक मात्र महत्त्व और प्रभुत्व है। धन न रहने पर शिष्य गुरु को छोड़ देता है और स्त्री पति का परित्याग कर देती है। [1] जप, तप,...
रजधानी वृन्दाबिपिन, वय किसोर जुगराज
नित्य धाम श्री वृंदावन ही रसिकों एवं युगल किशोर (प्रिया प्रियतम) की राजधानी है, जहां लालितादिक सहचरियाँ रस विलास के नित्य नये साज सजाया करती हैं।
नहिं हिंदू नहिं तुरक हम
मैं न हिंदू हूँ, न तुर्क (मुसलमान), न जैनी और न ही अंग्रेज। मैं तो प्रेम में उन्मत्त होकर (सहचरी स्वरूप से) नित्य श्री प्रिया प्रियतम की सुमन सेज संव...
माया कौं सब जग भजै
समस्त संसार वास्तव में माया की ही भक्ति करता है — धन, स्त्री, गृह, आश्रम आदि में आसक्ति ही सबका साधन बन गई है। किंतु मायापति श्रीकृष्ण का अनन्य भजन तो...
परमेस्वर परतीति नहिं
जिन व्यक्तियों का भगवान् पर विश्वास नहीं है और जिनका भरोसा केवल धन-दौलत पर टिका है — वे चाहे गृहस्थ हों या गृहत्यागी, विरक्त कहलाते हों या संसार से व...
यह रस-रीति प्रिया-प्रियतम की
प्रिया प्रीतम की यह दिव्य रस रीतिः नित्यविहार रस स्वाति नक्षत्र की वर्षा के जल के समान दिव्य और फलदायी है। जैसे पात्र भेद गुण के कारण स्वाति जल कदली म...
बहु बिधि मर्दन करें
भगवतरसिक जी कहते हैं कि भले ही कोई कितनी ही दवाओं से और कितने ही प्रकार से मुर्दे की मालिश क्यों न करे, वह कभी जिन्दा नहीं हो सकता। इसी प्रकार रस का अ...
जात जात मैं सब
संसार के सभी लोग अपनी-अपनी जातियों और कुलों के अभिमान में बहते जा रहे हैं। कोई उत्तम जाति का होने का गर्व करता है, तो कोई किसी और कुल का। परंतु जो अनन...
प्रथम सुनें भागवत
दूसरे चरण में व्यास जी द्वारा बताई गई नवधा भक्ति (श्रवणम्, कीर्तनम्, स्मरणम्, वन्दनम्, अर्चनम्, पादसेवनम्, दास्यम्, सख्यम् एवं आत्मनिवेदनम् ) का अभ्या...
हम सिष स्यामा स्याम के
श्रीभगवतरसिकजी भावमयी सखी-भाव से कहते हैं कि हम श्रीश्यामा-श्याम के शिष्य भी हैं और गुरु भी हैं। प्रेम से ओत-प्रोत होकर हमने अपना सर्वस्व (मन, तन, धन,...
वेदनि खोबै बैद सो
सच्चा वैद्य वही है जो रोग को जड़ से मिटा दे, वास्तविक गुरु वही है जो गोविन्द से मिला दे, सच्चा भोजन वही है जो भूख मिटा दे। भगवत रसिक जी कहते हैं कि ऐस...
यह सुख निरखि सखी नित प्रमुदित
हे सखी, "नित्य विहार" के अमृत रस को देखो और अपने प्राण-जीवन को इस रस पर न्यौछावर कर दो। श्री भगवत रसिक कहते हैं कि "नित्य विहार" का रस प्राप्त कर अन्...
नाहीं द्वैताद्वैत हरि
श्री कृष्ण न तो द्वैताद्वैत सिद्धांत में बंधे हैं न विशिष्टाद्वैत में, वे तो परम स्वतंत्र हैं, अपनी इच्छा अनुसार ही कार्य करते हैं। [1] परम स्वतंत्र ...
भगवत जन चकरी कियो
भगवत्-रसिक जी कहते हैं कि श्री लाड़िलीजी अपने भक्त को चकरी—अपने कर-कौशल का खिलौना—बना लेती हैं और उसे अपने प्रेम की डोर में लपेटकर रखती हैं। वे दिन-रा...
नहीं तरे पाताल के
वह नित्य-विहार-रूपी तत्त्व न तो पाताल में है और न ही गोलोक में; अपितु वह इस विराट् ब्रह्माण्ड के हृदय-कमल—श्री वृन्दावन धाम—में अपना नित्य निवास बनाए ...
जो कछु करौ सो समुझि कै
तुम जो कुछ भी कर रहे हो, उसे खूब सोच-समझकर करो। भगवतरसिक जी कहते हैं कि जिन लोगों ने बिना सोचे-समझे कर्म किया है, वे सब घने अंधकार में विलीन हो चुके ह...
जीभ जुगल नामहिं जपै
साधक को चाहिए कि वह कुत्ते और मृगराज-सिंह की वृत्ति को त्यागकर मधुकरी वृत्ति से उदर-पूर्ति करता हुआ, जीभ से श्री युगल का नाम-स्मरण और नेत्रों से उनके ...
गौर स्याम मंजुल मृदुल, अद्भुत की कांति
गौर-श्याम स्वरूप वाले प्रिया-प्रियतम के श्रीअंगों की कांति अत्यंत सुन्दर, कोमल और अद्भुत है। यह दिव्य जोड़ी परस्पर अधरामृत-रस का पान करते हुए सतत सुख ...
श्री भगवत उर धारी
जो व्यक्ति श्री हरि को हृदय-स्थल में विराजमान कर उनकी सच्ची भक्ति करता है और मन को वश में रखकर गुरु की आज्ञा के अनुसार चलता है, उसे संसार की कोई वेदन...
नाचत दोउ रहस में रँग-भीनैं
अनंग-रंग में सराबोर श्रीयुगलकिशोर एकान्त में नाच रहे हैं । काम-केलि की नयी-नयी कलाओं में लगे हुए मन वाले उन दोनों के अंग-अंग से अनगिनत हाव-भाव उत्पन्न...
कोउ सुकिया कोउ परकिया
किसी ने स्वकीया और परकीया (नायिका) के रूप में श्री प्रिया जी की कल्पना करके एक व्यर्थ का बखेड़ा सा खड़ा कर दिया है। भगवत रसिक जी कहते हैं कि हमारी प्र...
पिय प्यारी के संग रहै
श्री भगवत् रसिक अपनी रसोपासना में सखियों को प्रिया–प्रियतम के अंगों में निवास करने वाली बताते हैं—जैसे दिनकर और उसकी किरणें, जो एक-दूसरे से हर क्षण अभ...
जीव ईस मिली दोई
जब जीव और ईश्वर—दोनों अपने नाम, रूप और गुण-भेदों को त्यागकर जल और शक्कर के मिश्रण (शरबत) की भाँति एकरूप हो जाते हैं, तब वह रसिक कहलाने लगते हैं।
पाँयन परि बिनती करै
लालजी (श्रीकृष्ण) जब श्री प्रियाजी (श्रीराधा) के चरणों में पड़कर दैन्यपूर्वक विनय करते हैं, तो वही श्रृंगार रस का मुख्य स्वरूप है। प्रियतम की विनय-वाण...
नहिं निर्गुन सर्गुन नहीं
वह (नित्य-विहार-रूपी अद्भुत वस्तु) न निर्गुण है, न सगुण; बल्कि दोनों से विलक्षण है। न वह पास है, न दूर—प्रेमियों के लिए वह सर्वत्र है, किंतु प्रेम-विह...
प्रथम दरस गोविंद रूप के प्रानपियारे
भगवत रसिक जी साधकों से कहते हैं कि जिस वृन्दावन धाम में ये (निम्नलिखित) सात सिद्ध विग्रह विराजमान हैं, उसमें रसिक संतो की संगत करते हुए साधक को निवास ...
नव कुंज-सदन मैं आज रँगीली होरी
नव-निकुंज-महल में आज रंगों से सराबोर होली की अद्भुत छटा छाई हुई है। एक ओर श्रीकिशोरीजी हैं और दूसरी ओर श्रीश्यामसुन्दर दृढ़ता से उपस्थित हैं। दोनों अन...
भगवत नित्य बिहार नैन
श्री भगवत रसिक जी कहते हैं कि यह 'नित्य-विहार' भगवान शिव के तीसरे नेत्र के समान है, जो समस्त द्वैत और अज्ञान को भस्म कर देता है। इसके प्रकटीकरण के साथ...
रजधानी वृंदाविपिन
वृन्दावन धाम नित्य-दम्पति श्री राधा–कृष्ण की राजधानी है, जहाँ सहचारियाँ उनकी ‘केलि-लीलाओं’ से सम्बन्धित विविध सेवाओं का संपादन करती रहती हैं।
सुरतरु कामधेनु, चिंतामणि बारि दिये देव दानी
कल्पवृक्ष, कामधेनु तथा चिंतामणि को श्री किशोरीजी के ऊपर निछावर करके देवताओ को दान में दे दिया गया है , (क्योकि इन श्री किशोरीजी के सुख की तुलना पर उन ...