SaintsBooksRagasShlokasStrotrasPoems
HomeGranthasअनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1
All Books
Sacred Scripture

अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1

Verses & Passages

7 items
general

काया कुंज निकुंज मन

भगवतरसिकजी कहते हैं कि रसिक की काया ही कुंज-वन है, उसका मन ही निकुंज-महल, उसके नयन ही इस निकुंज-महल के मनोरम झरोखे अथवा द्वार हैं, और उसका हृदय ही वह ...

general

दुःख दिखावत लाडिली

श्री किशोरी जी अपने को हस्त-पल्लवों से ढक लेती हैं। जब लालजी अत्यन्त अधीर होकर उनके सामने ‘हा-हा’ करते हुए मानो उनके हाथ का खिलौना बन जाते हैं—जैसे व...

general

सुरत सरोवर, समर जल, उठत कटाच्छ तरंग

इस नित्य-विहार के सरोवर में विशुद्ध प्रेममयी केलि का रस भरा है। इसमें कटाक्षों की तरंगें उठ रही हैं और अद्भुत रंग के अठारह कमल खिले हुए हैं। किशोरीजी ...

general

दोऊ कानन लगि कहैं चुंबन देहिं अँकोर

(नित्यविहार-रत श्यामाश्याम की परिचर्या में अवस्थित श्रीभगवतअलि जी कहती हैं कि नित्यविहार की स्थिति में अधीर हुए) प्रिया-प्रियतम मेरे कानों से लग-लगकर ...

shloka

रूप-सरोवर लाडिली फूले सहज सरोज

हमारी लाडिलीजी (श्री राधा) साक्षात् रूप-सौंदर्य का अथाह सरोवर हैं, जिसमें उनके विभिन्न अंग — दो हस्तकमल, दो चरण कमल, एक नाभि कमल, दो नयन कमल, एक मुख क...

general

जीव ईस मिली दोई

जब जीव और ईश्वर—दोनों अपने नाम, रूप और गुण-भेदों को त्यागकर जल और शक्कर के मिश्रण (शरबत) की भाँति एकरूप हो जाते हैं, तब वह रसिक कहलाने लगते हैं।

general

कुंज बिहारिनि लाडिली

श्री भगवत रसिक कहते हैं कि रसिकों की यह गौर-श्यामल वर्ण वाली जुगल जोड़ी अर्थात् श्री राधा–कृष्ण सदैव मेरे हृदय में विराजमान रहते हैं।