SaintsBooksRagasShlokasStrotrasPoems
HomeGranthasबिहारी सतसई
All Books
Sacred Scripture

बिहारी सतसई

Verses & Passages

19 items
general

जपमाला छापें तिलक

बिहारीलाल जी कहते हैं कि नाम-जप की माला फेरने या माथे पर तिलक लगाने से कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होता। यदि मन कच्चा है, तो वह व्यर्थ ही सांसारिक विषयों ...

general

चिरजीवौ जोरी जुरे

(राधा-कृष्ण की यह) जोड़ी चिरंजीवी हो। इन दोनों में गहरा प्रेम क्यों न बना रहे? इनमें कौन किससे घटकर है? एक ओर तो वे वृषभानु की लाड़ली बेटी हैं, और दूस...

general

सघन कुंज छाया सुखद

जहाँ की कुंजें घनी हैं, छाया सुख देने वाली है और पवन शीतल व सुगंधित है—उस वृन्दावन में यमुना के तट पर जाते ही आज भी मन उसी प्रकार श्री राधा-कृष्ण के प...

general

नाचि अचानक हीं उठे

बिना वर्षा-ऋतु के ही ब्रज के वन में मोर अचानक नाच उठे। जान पड़ता है कि इस दिशा को नन्द के लाड़ले (घनश्याम) ने आनन्दित किया है।

general

तजि तीरथ हरि-राधिका

अन्य समस्त तीर्थों का त्याग कर केवल श्री राधा-कृष्ण की दिव्य अंग-कान्ति से ही अनन्य अनुराग करो। जिस ब्रज के निकुञ्ज-मार्गों में प्रिया-प्रीतम नित्य क्...

general

या अनुरागी चित्त की

या अनुरागी चित्त की, गति नहिं जाने कोय। ज्यौं ज्यौं बूढ़ै श्याम रंग, त्यौं त्यौं उज्ज्वल होय॥ - श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई जिस हृदय में श्य...

general

सीस मुकुट कटि काछनी

हे बाँके बिहारी लाल! आप नित्य ही मेरे मन में उसी रूप में विराजमान रहें—जिसमें आपके शीश पर मुकुट हो, कमर में काछनी बँधी हो, हाथों में मुरली हो और उर प...

general

नित प्रति एकत ही रहत

दोनों सदा एक साथ ही रहते हैं। (क्यों न हों?) दोनों की अवस्था, रूप-रंग और मन भी तो एक-से हैं। इस युगलमूर्ति (राधा-कृष्ण) का दर्शन करने के लिए तो आँखों...

general

जहाँ जहाँ ठाढ़ौ लख्यौ

जहाँ-जहाँ मैंने उन परम सुंदर रसिक शिरोमणि श्री श्यामसुन्दर को खड़े हुए देखा था, उनके वहाँ न रहने पर भी आज वे स्थान आँखों को एक क्षण के लिए बरबस पकड़ ल...

general

कब कौ टेरतु दीन ह्वै होत न स्याम सहाइ

हे श्याम, मैं कब से दीन होकर तुम्हें पुकार रहा हूँ, किन्तु तुम सहाय (प्रसन्न) नहीं होते। हे जगत-गुरु, जगन्नायक! क्या आपको भी इस संसार की हवा लग गई है?

general

राधा हरि हरि राधिका बनि आए संकेत

गुप्त मिलन-स्थल पर श्री राधा और श्रीकृष्ण ने परस्पर रूप धारण किया—श्री राधा ने कृष्ण का रूप धारण किया और श्रीकृष्ण ने राधा का। इस प्रकार रूप-परिवर्तन ...

general

कोऊ कोरिक संग्रहौ

कोई हजारों, लाखों या करोड़ों की सम्पत्ति संग्रह करे; किन्तु मेरी सम्पत्ति तो सदा वही ‘विपत्तियों का नाश करने वाले’ यदुनाथ [श्रीकृष्ण] हैं।

general

अपनैं-अपनैं मत लगे

अपने-अपने मत के लिए व्यर्थ ही लोग हल्ला मचा रहे हैं। अंततः सभी को उस एक भगवान श्रीकृष्ण की ही उपासना करनी है, चाहे वे उन्हें किसी भी नाम से पुकारें।

general

तौ बलियै भलियै बनी नागर नन्दकिसोर

हे चतुर नन्दकिशोर, मैं बलैया लूँ, यदि तुम अच्छी प्रकार से मेरी करतूतों की ओर देखोगे अर्थात् मेरे अवगुणों पर विचारोगे, तब तो बस मेरी बिगड़ी खूब भली बनी...

general

निज करनी सकुचें हिं

हे गोपाल, मैं तो अपनी ही करनी से लजा गया हूँ, फिर तुम अपनी इस चाल से मुझे क्यों लजवा रहे हो कि मुझ-जैसे अत्यन्त विमुख के तुम सम्मुख रहते हो-(मैं तुम्ह...

general

मोर-चन्द्रिका स्याम-सिर

अरी मोर-चंद्रिका! श्री कृष्ण के सिर पर चढ़कर क्यों इतरा रही है? सुना है, श्री राधा मान करके बैठी हैं। अतैव शीघ्र ही तुझे उनके पाँवों पर लोटते हुए देखू...

general

किती न गोकुल कुल-बधू

गोकुल में न जाने कितनी कुलवधुएँ हैं, और ऐसी कोई नहीं जिसे किसी ने शिक्षा न दी हो; परन्तु कुलवधू होकर और उपदेश सुनकर भी ऐसी कोई न बची, जो श्रीकृष्ण की ...

general

गिरि तैं ऊँचे रसिक

पर्वत से भी ऊँचे रसिकों के मन जहाँ हजारों बार डूब चुके हैं, वही प्रेम का समुद्र संसारी और पशुवत बुद्धि वाले लोगों के लिए सदा उथला ही रहता है—इतना उथल...

general

मोहिं तुम्हैं बाढ़ी बहस को जीतै जदुराज

हे बाँके बिहारी! मेरे और तुम्हारे बीच मानो एक बहस छिड़ गई है—अब देखना है कि अंततः कौन जीतता है। तुम्हें अपने कृपालु स्वभाव की लाज रखनी है और मुझे अपने...