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हमारी निधि, श्री वृषभानु दुलार
हमारी निधि तो एकमात्र वृषभानुनन्दिनी श्री राधिका जी हैं। [1] जिनकी भृकुटि – विलास को ब्रह्म श्रीकृष्ण भी नित्य देखते रहते हैं ( जिनकी भौहों के इशारे ...
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राधे मोहिं, चरण कमल
हे रसिकन जीवनमूरि राधिके ! मुझे अपने चरण कमलों की धूलि बना दीजिए। तुम जब मान करोगी तथा श्यामसुन्दर तुम्हारे चरणों पर सिर रखकर रोते हुए मनाने जायेंगे,...
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किशोरी मोरी अब न लगाओ बार
किशोरी मोरी अब न लगाओ बार, रसिकन मुख सुनी दीन को, आदर यही दरबार। - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (33) हे मेरी किशोरी...