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वृंदावन की बात में जितै जितै मन जात
वृन्दावन की लीलाओं में मन जहाँ-जहाँ प्रविष्ट होता है, वहीं-वहीं वह और अधिक रस का अनुभव करता है। आश्चर्य यह है कि चित्त उस रस से कभी भी तृप्त नहीं होता...
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केलि माधुरी सिंधु के, कोऊ न पावत पार
वृन्दावन की इस अगाध केलि-माधुरी के सिंधु का कोई भी पार नहीं पा सकता, चाहे मन, वचन और कर्म से कोई निशि-दिन इसका निरंतर चिंतन करता रहे।