shri madhuri dasa
Biography & History
shri madhuri dasa Collected Verses
नैनन सों नैना मिले, मुख सौं मुख लपटाय
वृन्दावन युगल-रस का परम-पावन स्थान है जहाँ युगल (श्री राधा कृष्ण) प्रेम के वशीभूत होकर नयन से नयन मिलाते, मुख से मुख लगाते और भुजाओं में परस्पर लिपटकर...
वृंदावन की बात में जितै जितै मन जात
वृन्दावन की लीलाओं में मन जहाँ-जहाँ प्रविष्ट होता है, वहीं-वहीं वह और अधिक रस का अनुभव करता है। आश्चर्य यह है कि चित्त उस रस से कभी भी तृप्त नहीं होता...
जो लालच कोटिक मिले, तौन चित्त ललचाय
श्री वृन्दावन धाम की ऐसी विलक्षण माधुरी है कि यदि हृदय एक बार इसका रस चख ले, तो चाहे करोड़ों प्रकार के प्रलोभन क्यों न मिलें, वह फिर कहीं ललचाता नहीं ...
वंशीवट की माधुरी जो कहिये कछु बैन
वंशीवट की उस अलौकिक मधुरता का वर्णन शब्दों में कैसे किया जाए? यदि उसका बखान करना हो, तो नेत्रों में रस भरकर उसको जिह्वा बनाना होगा (देखने के लिए) और ज...
गुणनि अगाधा राधिका, श्री राधा रस धाम
श्री राधिका जी अनंत गुणों की अगाध सागर हैं और साक्षात् रस का धाम हैं। संसार के समस्त सुखों की सिद्धि और पूर्णता केवल उनके नाम के 'आधे' भाग (अर्थात् के...
श्री वृंदावन स्वामिनी करि सुदृष्टि इहि ओर
हे वृंदावन की महारानी, श्री राधा! कृपा करके मेरी ओर सुदृष्टि डालिए और अपने कृपा-कटाक्ष की कोर से अनुराग-रस की वर्षा कर दीजिए।
केलि माधुरी सिंधु के, कोऊ न पावत पार
वृन्दावन की इस अगाध केलि-माधुरी के सिंधु का कोई भी पार नहीं पा सकता, चाहे मन, वचन और कर्म से कोई निशि-दिन इसका निरंतर चिंतन करता रहे।
वृंदावन की बात कछु, क़हत बने नहिं बैन
वृंदावन की बात कछु, क़हत बने नहिं बैन। नैंन समाने विपिन में, विपिन समाने नैंन॥ - श्री माधुरी दास, वृंदावन माधुरी (23) श्री वृन्दावन की महिमा के विषय...
अहो लड़ैती विन कहे जानि लेऊ जिय बात
हे लड़ैती [श्री राधा]! बिना कहे ही मेरे हृदय की बात जान लीजिए—आपके चरणों के संग बिन मुझे कुछ भी सुहाता नहीं।
सुरझाये सुरझे नहीं उरझ रहे यह रूप
दिव्य युगल श्रीराधा-कृष्ण एक-दूसरे की रूप-माधुरी में इस प्रकार गुंथे हुए हैं कि उन्हें पृथक करना असंभव है। उनके स्वरूप परस्पर ऐसे एकाकार हो गए हैं कि ...
प्रेम अटपटी बात कछु
विशुद्ध प्रेम की अनुभूति शब्दों की सीमा से परे है। उसे न तो वाणी पूर्णतः व्यक्त कर सकती है और न तर्क समझा सकता है। इस प्रेम की वास्तविक स्थिति या तो ...
कान कथा मन ध्यान
कानों का विश्राम श्री श्यामाश्याम की कथा में है, मन का ध्यान में, रसना का उनके नाम में एवं आँखों का विश्राम उनकी रूप माधुरी है।
माधुरी की रास सब शोभा को निवास जहां
रस से भरे श्री श्यामा श्याम, वंशीवट में स्थित रास मण्डल में मधुर रास नृत्य कर रहे हैं, जहाँ समस्त शोभा का निवास है। [1] उनके चरणों में नूपुर, हस्त कम...
बार बार रीझि रीझि कहत विहारीलाल
श्री कृष्ण, प्रेम में उन्मत्त होकर, बार बार श्री प्रियाजी जी [श्री राधा] से कहते हैं कि हे प्यारी जू! वंशीवट की अद्भुत शोभा को निहारिये! [1] यमुना के...
कौन सके गुन गाय तिहारे
हे श्री कुंजबिहारी और श्री कुंजबिहारिनी जू! ऐसा कौन है जो आपके अगाध गुणों का गान करने में समर्थ हो? आप दोनों तो रूप, विलास और प्रेम की सीमा हैं, जो सद...
वंशीवट तट निकट भूमि
यमुना तट के निकट वंशीवट की भूमि सदा वृक्षों और लताओं से आच्छादित हरिभरी रहती है जहां सर्वदा पिय प्यारी (राधा कृष्ण) नित्य विहार पारायण हैं।
दसन खँडित वीरी रुचिर दैहैं निकट बुलाय
मेरी यही अभिलाषा है कि कुंवरी श्री राधा अपने सुकोमल हाथों से उनके द्वारा चर्वित पान मुझे अपने निकट बुलाकर प्रदान करेंगी एवं अपने कंठ के हार को मेरे कं...
जो वन वन डोलत रहों
यदि कोई जीव श्री श्यामाश्याम से मिलने की आशा बाँधकर वृन्दावन के कुंज वनों में डोलेगा, तो अनजाने में ही कहीं न कहीं उसकी उनसे अचानक भेंट अवश्य होगी।
करैं मनोरथ पिय के जो कछु उपजै जीय
प्रियतम श्यामसुन्दर के हृदय की समस्त अभिलाषें को श्री राधा पूर्ण करती हैं। श्री राधिका, श्रीकृष्ण के हृदय (अंक) में सदा विराजती हैं, और श्रीकृष्ण प्रे...
अहो लड़ैती लाड़ली, अलखि लड़ी सुकुमारु
हे लड़ैती लाड़ली श्री राधे! हे अति सुकुमार अलख लड़ी, मनोहारनी किशोरी जू! कृपा कर मुझे अपने सुंदर मुख की थोड़ी सी झलक दिखलाइये।
जो गावहिं सुमरहिं सदा मन बच विपिन विलास
जो व्यक्ति मन और वचनों से सदा वृंदावन की लीलाओं का यशोगान और सुमिरन करता है, वह सहज ही आनंद और श्री वृंदावन धाम में वास प्राप्त कर लेता है।
कहा करूँ कासों कहूँ को बूझे कित जाउँ
क्या करूँ, किससे कहूँ, कौन समझेगा, किसके पास जाऊँ? श्री प्रिया-प्रियतम के दर्शन की तीव्र लालसा लिए, श्री धाम वृंदावन के वनों में उनका नाम लेलेकर व्याक...
वा मुख देखन को कहौं
ऐसा कौन-सा उपाय करूँ कि मुझे श्री श्यामा-श्याम के मुख-कमल के दर्शन प्राप्त हो सकें? मैं क्या करूँ, किससे कहूँ? अब तो यह पीड़ा अत्यंत असहनीय हो गई है।
पिय प्यारी को विहरिवो
यद्यपि प्रिया-प्रियतम की विहार लीलाओं को हृदय में सदा छुपाकर रखना चाहिए, परंतु मैं जितना-जितना इसे हृदय में छुपाने का प्रयास करता हूँ, वे उतनी ही सहजत...
कमल से लोइन ललित अति शोभा देत
कमल समान नेत्रों वाली श्रीराधा जू, अत्यंत लावण्यमयी छवि से, श्रीकृष्ण के संग विराजमान हैं, और करोड़ों कामिनियाँ भी उनके सौंदर्य के आगे फीकी लगती हैं। ...
जो मोसों मोसी करौ नाहीं कछु मोहि ठौर
यदि आप मेरे साथ वैसा ही व्यवहार करें जैसा मेरे कर्मों के अनुसार होना चाहिए, तो हे प्रभु, मैं इतना बड़ा पापी हूँ कि मेरा उद्धार कभी संभव नहीं होगा। आपक...
आय कुँवर ठाड़े भये नवल कुंवरि के संग
कुँवर (श्यामसुन्दर) नवल कुँवरि (श्रीराधा) के संग यमुना-पुलिन में वंशीवट पर खड़े हैं जहाँ प्रेम-रस की अनंत तरंगें उमड़ रही हैं।
वामुख की आशा लगी
अब मुझे केवल उन (प्रिया-प्रियतम) के मुख-दर्शन की ही उत्कंठा लगी है। योग, साधना और अन्य सभी उपायों की आशा मैंने पूर्णतः त्याग दी है। अब यदि शीघ्र ही उन...
कहों कहां लों वरनि में वंशीवट की केलि
मैं प्रिया-प्रियतम की वंशीवट की उस अद्भुत दिव्य केली लीला को कैसे और कहाँ तक वर्णन करूँ क्योंकि उस रस को वही समझ सकता है जो स्वयं सहचरियों के संग उस ल...
श्यामा श्याम बैठे नव
श्री श्यामाश्याम नवीन फूलों की सेज पर विराजमान हैं, और एक-दूसरे की रूप माधुरी का दर्शन कर रहे हैं तथा एक-दूसरे का फूलों से श्रृंगार कर रहे हैं। [1] श...
वृंदावन की माधुरी, मन को मन हर लेत
श्री वृंदावन धाम की माधुरी मन के मन का भी हरण कर लेती है जिसका सहज स्वभाव है समस्त अंगों को सुख प्रदान करना।
कठिन मनोरथ मन उठे, को पुरनि करे आनि
मेरे मन में प्रेम भरे दुर्लभ मनोरथ उत्पन्न हो रहे हैं, उन्हें कैसे पूरा करूँ? कोई उपाय नहीं सुझता, केवल श्री लाड़लीजी ही अब कृपा करेंगी मुझे दीन-दुखिय...
शोभा नवल निकुंज की
शोभा नवल निकुंज की, क़हत बने नहिं बैन। कै जाने मन की दशा, कै माधुरि कै नैन॥ - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (27) वृन्दावन में वंशीवट के नवल-निकुंज ...
और कहाँ ते सुमरिये
श्री प्रिया-प्रियतम के इस रास-विलास की लीला इतनी अगाध है कि वे मेरी सामर्थ्य से परे है। उनका पूर्ण स्मरण तो दूर, यहाँ तो ऐसी दशा हो जाती है कि ‘राधा’ ...
वृन्दावन विहरहिं सदा गहे परस्पर बाँह
दिव्य दंपति श्री राधा-कृष्ण एक-दूसरे का आलिंगन कर सदा वृंदावन में नित्य विहार करते हैं। मेरे हृदय में उनसे मिलने की तीव्र उत्कंठा जाग उठी है।