Verses & Passages
14 itemsअतर पुतायौ मढ्यौ महल सुगन्धन सौं
निकुंज महल को इत्र से सुवासित किया गया है, द्वार पर गजमोती के तोरण लगे हुए हैं। [1] निकुंज महल जहाँ श्री राधा विराजमान हैं, वहाँ चन्दन का लेप लगाया ग...
जब तैं विलोक्यौ तोहि सुन्दर कुँवर कान्ह
हे राधिका! जब से श्री श्यामसुंदर ने तुम्हें निहारा है, तब से उनका चित्त पतंग के समान आसमान में उड़ रहा है। [1] श्यामसुंदर मानो डोलते हुए फिरते हैं और...
चामीकर चौकी पर चंपक
स्वर्ण (सोने) के आसन पर चंपक वर्णा श्री किशोरी जी विराजमान हैं, जिनके अंगों की उज्जवल कांति से संपूर्ण निकुंज सुसज्जित है। [1] दिव्य प्रकाश तथा प्रेम...
जाके अंग अंग की बनक पै कनक वारै
जिनके प्रत्येक अंग की बनक पर कनक (सोना) भी फीका लगता है, जिनके मोतियों के हार की शोभा को देख कामदेव भी मोहित हो जाता है। [1] ऐसी वे मनभावनी हैं, जो म...
रम्भा रमासी उमासी हठी विमला नवला
रंभा, लक्ष्मी, पार्वती, विमला, नवला और रति जैसी रूपवती भी श्री राधा की रूप-माधुरी को निहारकर मानो ठगी-सी खड़ी रह जाती हैं। [1] उनकी कांति चंद्र-किरण ...
कर कंजन जावक दै रूचि सौं
प्रेम में पूर्णतया आसक्त होकर श्रीकृष्ण अपने हाथों से श्रीराधा के चरण-कमलों में जावक लगाते हैं। ब्रज की प्यारी ठकुरानी, श्रीराधा के कमल जैसे चरणों को ...
कीरति किसोरी वृषभान की दुलारी राधा
वृषभानु दुलारी श्री राधा अपनी सखियों के साथ सहज भाव से निकुंज के मार्ग की ओर चली जा रही हैं। [1] उनके चरण-चिह्नों की चौकी की आभा से अद्भुत चमक छा गई ...
जात रूप तखत पै बैठी रूप रासि राधे
रूप-सौंदर्य की अनंत राशि श्री राधा महारानी जब स्वर्ण-सिंहासन पर विराजती हैं, तो उनके अंगों की प्रभा स्वयं सूर्य के तेज को भी लज्जित कर देती है। [1] उ...
कोऊ छत्र लीनै कोऊ छाहगीर कीनै कोऊ
कोई छत्र लेकर खड़ी है, कोई दर्पण लेकर खड़ी है, कोई वीणा लेकर मधुर संगीत गा रही है। [1] कोई जरी का वस्त्र सजा रही है, कोई गुलाब और इत्र छिड़क रही है, ...
बैठी रंग भरी है रंगीली रंग रावटी में
प्रेम-रंग से सराबोर, रंगीली श्री राधा रंगमहल-रूपी दिव्य मंडप में अद्भुत शोभा के साथ विराजमान हैं। ऐसी परम सिरताज महारानी की अनुपम सुंदरता का वर्णन शब्...
जन दुःखहरनी धरैनी यति ध्यावें तोहि
हे जीवों के दुःख हरने वाली, सब संतगण आपका ही ध्यान करते हैं, आपकी लीलाओं एवं महिमा का वर्णन ब्रह्मा जी ने भी किया है। [1] मेरा मन चिंताओं से घिर कर ...
चंद की कलासी, नवलासी सखी संगबारी
चन्द्र के समान, नवल सखियों के संग सुसज्जित श्री राधिका की छवि अद्वितीय है। स्वर्ग की अप्सरा रम्भा, लक्ष्मी, पार्वती देवी एवं अन्य ऐसी कौन सी देवी है ज...
गिरि-पति लागी मेरु
पर्वतराज हिमालय स्वयं मेरु पर्वत के अधीन हैं। मेरु पर्वत पृथ्वी के अधीन है। पृथ्वी का आधार शेषनाग, वराह, कच्छप और जलमय स्वरूप हैं — अतः पृथ्वी इन आधार...
गिरि कीजै गोधन, मयूर कुंजन को मोहिं
हे श्री कृष्ण, यदि आप मुझे शिला बनाना चाहें तो गोवर्धन की शिला बनाना, मयूर बनाना हो तो आपके कुञ्ज का मयूर बनाना, और यदि पशु बनाना तो महाराज नन्द के मह...