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भगवत रसिक की वाणी

ग्रन्थ के पद एवं श्लोक

75 items
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हमारी संपति दंपति केलि

श्री भगवत रसिक जी कहते हैं कि हमारी सम्पति श्री राधा कृष्ण [दम्पति] की केलि है। यह केलि लीला इतनी रसमयी है कि इसका रस दिन दिन बड़ता है एवं सुख के समुद्...

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गावै हम सोई करै

श्री भगवत रसिक जी कहते है हम रसिक जन जैसा कुछ गाते है, श्री श्यामाश्याम अनायास वैसा ही करते है और श्री श्यामा श्याम जैसा करते है हम तत्काल उसी की गाकर...

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मेरी अलक लडी अलबेली

श्री भगवतरसिकजी कहते हैं कि मेरी अलबेली (बॉकी शोभामयी) अलक लडी (परम दुलारी) श्रीश्यामा प्यारी प्रियतम के गले में बाँहें डालकर विपरीत रति अर्थात्‌ परत...

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मेरे प्रान धन स्वामिनि स्याम राधे

मेरे जीवन के प्राण धन एक मात्र दिव्य युगल श्री राधा कृष्ण हैं। (1) वे दोनों एक ही रस में लीन हैं, दोनों के रूप और आयु भी एक समान है, दोनों ही प्रेम रस...

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वन्दत प्रिया पाद जल जात

अपनी प्राणप्रिया श्री राधा के चरणकमलों की वन्दना करते हुए श्री श्यामसुन्दर कामरस के वशीभूत होकर इन चरणकमलों को अपने हृदय कमल पर धारण करते हैं। [1] श्...

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जावक जुत जुग चरण लली के

श्री किशोरी जी के महाबर से युक्त दोनों चरणारविंद अद्भुत निर्मल एवं अनुपम हैं। [1] ये प्रियतम की हृदय रूपी कमल कलिका को विकसित करने वाले सूर्य हैं। [2...

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जै जै रसिक रवनी रवन। रूप गुन लवन्य प्रभुता प्रेम पूरन भवन

हे रसिक शिरोमणि प्यारी जू , श्री किशोरीजी, आपकी जय हो जय हो! आप रूप, गुण, लावण्य प्रभुता और प्रेम की पूर्णता की धाम हो। आपके अतिरिक्त रसिक भक्त की विप...

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आचारज ललिता सखी, रसिक हमारी छाप

भावार्थ - (अपनी रसोपासना का परिचय देते हुए भगवत रसिकजी कहते हैं-) हमारी आचार्य ललिता सखी हैं। रसिक हमारी छाप है। हमारे यहाँ नित्य किशोर (सहज जोडी) की ...

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सब सुख सदन बदन तुव राधे

भावार्थ - हे श्यामा प्यारी ! तुम्हारा यह मुखारविंद सब सुखों का घर है- कमल और चंद्रमा इसकी बराबरी नहीं कर सकते। वे तो अपने को अपराधी मानकर सदा डरते रह...

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छके जुगल छवि वारूनी

प्रिया-प्रियतम की छवि-रूपी वारुणी का आस्वादन कर और प्रेम-रस के सर्प से डसे हुए सहचरियों के नयन ऐसे मतवाले हो गए हैं कि किसी गारुड़-मंत्र (जहर उतारने व...

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निहं हिंदू नहिं तुरक हम

भावार्थ - न तो हम हिन्दू हैं, न तुर्क (मुसलमान), न जैनी न अंग्रेज। प्रेम पथ का पथिक होने के बाद हमारी वे सब पहचानें और क्रियाएं मिट गई है, जिनमें सांस...

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बलि जैहौं श्रीरसिकचारज

भावार्थ - भगवतरसिकजी कहते हैं - रसिकाचार्य स्वामी श्री हरिदासजी! मैं आपकी बलिहारी जाता हूँ जिन्होंने अपने हृदय सिन्धु का मन्थन करके यह नित्य विहार रूप...

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चेला काहू के नहीं

न तो हम किसी (देह मानी) के चेला है और नकिसी (देह मानी) के गुरु हम तो अपने प्रिया प्रियतम की भावमयी सखी है। [1] हम सदा उनके रंगमहल में निवास करते है और...

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मेरे प्रानधन स्वामिनी स्याम राधे

रसिक सखी भगवतअलि जी कहती है कि श्री लालजी एवं उनकी स्वामिनि ही मेरे प्राण धन हैं। कमल के सदृश मुखवाले ये लाडली लाल एक ही रस, एक ही रूप और एक ही समान व...

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मेरी महारानी श्री राधारानी

वृंदावन निकुंज की अधीश्वरी श्री राधारानी ही मेरी एकमात्र स्वामिनी हैं। इन्हीं के बल पर मैंने लोक, वेद और कुल की सभी मर्यादाओं का त्याग कर दिया है। [1]...

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चेला काहू के नहीं, गुरु काहू के नहीं

श्री भगवत रसिक जी के शब्दों में वह न किसी के चेला हैं, और न गुरु हैं वह केवल निज महल में श्री लाड़ली लाल को दिन रात लाड लड़ाती हैं ।

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पायन परि बिनती करे, से रस मुख्य सिंगार

लाल जी श्री प्रिया जी के चरणों में पड़ कर उनसे जो दैन्य पूर्वक विनय किया करते हैं वही मुख्य रस श्रृंगार रस है।

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भगवत रसिक सहायक सब दिन

भगवत रसिक जी कहते हैं कि जो रसिकों (प्रियतम एवं सहचरियों) की सदा सहायता करने वाली हैं और उनको निरंतर सर्वोपरि सुख देती हैं वो एक मात्र किशोरीजी श्री ...

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जमुना जल विमलत जुगल किशोर

युगलकिशोर श्रीश्यामा-कुंजविहारी (अपने केलि-विलास-द्वारा) श्रीयमुनाजी के जल को निर्मल बना रहे हैं। पहले इन प्रियालाल ने उबटन करके यमुना-जल में स्नान कि...

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हमारे वृन्दावन उर और

हमारे हृदय में श्रीवृन्दावन का स्वरूप विराजमान है अर्थात मानो हमारा हृदय प्रकट वृन्दावन स्वरूप ही है। जहाँ हमारे रसिक शिरोमणि श्रीश्यामा कुंजविहारी स...

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मोह-फाँस जग बँधि रह्यौ

भावार्थ - प्राणी इस संसार में न तो किसी के साथ आये हैं और न (इस संसार से) किसी के साथ गये हैं। (सब अकेले पैदा होते हैं और अकेले ही मरते हैं।) यह मिलाप...

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लखी जिन लाल की मुसक्यान

भगवत रसिकजी कहते हैं कि रसिक लालजी ने यही मुस्कान रूपी तलवार मुख रूपी म्यान से निकालकर हमारे नेत्रों में (ऐसी) मार दी है कि अब इस मुस्कान को देखते रहन...

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हम गावें सोई करें

श्री भगवत रसिक जी के शब्दों में सखी और लाड़ली लाल के परस्पर प्रेम का वर्णन है। जो सखी के मन में भाव आता है, तुरन्त लाड़ली लाल प्रेमवशीभूत होकर वह लील...

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लात हनी भृगु हृदय में

जब भृगुजी ने भगवान् के वक्षस्थल पर लात मारी तो भगवान् ने अपने ऊपर किये हुए पादाघात के अपराध पर रुष्ट न होकर भृगुजी का सम्मान किया। किन्तु जब भगवान् न...

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लखी जिन लाल की मुसक्यान | तिनहिं बिसरी बेद-बिधि

लखी जिन लाल की मुसक्यान । तिनहिं बिसरी बेद-बिधि, जप,जोग, संजम, ध्यान । । नैम, ब्रत, आचार, पूजा, पाठ, गीता-ज्ञान । रसिक भगवत दृग दई असि, ऐंचि कै मुख...

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हा हा करौ परौ पायन अब

तुम तो अपना वही एक उपाय करो—हमारी प्यारी श्री राधा के चरणों में जाओ और करुण क्रन्दन करो! स्वामिनी जी बड़ी उदार हैं, ऐसा करते ही तुम्हें वह अपना सर्वस...

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जप तप तीरथ दान ब्रत

जो मनुष्य श्रीहरि की अनन्य भक्ति का आश्रय ग्रहण नहीं करता और केवल विविध जप, तप, तीर्थाटन, दान, व्रत, योग, यज्ञ एवं कर्मकांडों के जाल में उलझा रहता है,...

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खावे नहीं पछिताइ सो

यह संसार भूत के लड्डू के समान है—जो इसे भोगता है, वह पछताता ही है; और जो नहीं भोगता, वह भी इसकी लालसा में पछताता है। दोनों ही स्थितियों में यह दुःखदाय...

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इष्ट धर्म मन मत मिलै

श्री भगवत रसिक जी कहते हैं—जिससे हमारे इष्टधर्म, मत-विचार, रहनी और स्वभाव मिलते हैं, उससे मिलने पर हमारा हृदय आनन्द से फूल उठता है।

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नित्य किशोर उपासना

एक रसिक भक्त के रूप में उसे पहचाना जा सकता है, जो राधा कृष्ण की नित्य किशोर अवस्था में उपासना करता है, जो युगल नाम का भजन करता है, जिसके लिए वेद रसिक...

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वृन्दावन विहरत फिरै

श्री भगवत रसिक जी वृन्दावन रस के उपासक को सलाह देते हुए कहते हैं कि वृन्दावन में युगल उपासना है इसलिए जहाँ जहाँ भी वृन्दावन में विहरण करो, उससे पहले ...

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नर्क स्वर्ग अपवर्ग आस नहिं त्रास है

न तो मुझे स्वर्ग और मुक्ति की तनिक भी आशा है, न ही नरक का ज़रा सा भी भय है, जहाँ आप रखोगे वहीँ मैं सुख की राशि का अनुभव करता रहूँगा। मुझ पर इतनी कृपा ...

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जयति नव नागरी, रूप गुन आगरी

हे नवनागरी किशोरी श्री राधे, आप रूप और गुणों की खान हैं, सब सुखों की निधि हैं, आपकी जय हो।

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सुरतरु, नागरी, नेह निधान

हे लाड़ली जी, आप ही केवल रसिकों के लिए कल्पलता हैं, चतुर शिरोमणि हैं, और प्रेम की निधि हैं। हे किशोरीजी, मैं आपकी शरण में हूँ। कृपा कर मेरे ऊपर स्नेह...

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भगवत रसिक संग जो चाहै, प्रथमहै लोभै त्यागै

श्री भगवतरसिकजी कहते हैं कि जो साधक परम रसिक श्रीयुगल की नित्य संगति के अभिलाशी हैं, उन्हें सर्वप्रथम लोभ का परित्याग कर देना चाहिये, फिर शरीर, घर, पु...

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हमारी दंपति संपति केलि

हमारी दंपति संपति केलि। - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 12 (5) श्री भगवत रसिक जी कहते हैं कि प्रिया प्रियतम की केलि लीला ही ...

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चस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि

भावार्थ - श्री लाडली जी ने स्वयं हमें यह नित्य बिहार की दृष्टि प्रदान की है। इससे हमारे मन में प्रेम के प्रति पक्का विश्वास उत्पन्न हो गया है और अब तो...

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तुब मुख नैन कमल अली मेरे

भावार्थ - (इस पद में भगवतरसिक जी ने प्रियतमा के प्रति प्रियतम के हृदय की आसक्ति को अभिव्यक्ति दी है। प्रियतम प्रियाजी से कह रहे हैं -) हे प्यारी, मेरे...

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मंगल मूरति लाडिली, मंगल मूरति लाल

इस रसोपासना में सबकुछ मंगलमय है,यह बताते हुए भगवत रसिक जी कहते हैं कि इस नित्यबिहार की किशोरीजी मंगल की मूर्ती है, लालजी भी मंगल की मूर्ती है और नित्य...

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नमो नमो श्री बृंदावनचंद

अद्भुत सौंदर्य की छटा बिखेरने वाले श्री धाम वृंदावन को हमारा बारंबार प्रणाम है। यह (वृंदावन) नित्य अनादि और अनंत है यहां श्री प्रिया प्रियतम एकरस स्वच...

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सोभा-सिंधु निधिवन और

यह निधिवन किसी विलक्षण शोभा का महा सागर है। यहां निकुंज भवन की मंजुल पौड़ी में ही ऊपर से नीचे तक ऐसी अद्भुत माधुरी छाई हुई है कि उसे देखकर बाँके रसिक ...

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प्रथम महात्म प्रकृति ज्ञान रवि तहाँ प्रकासे

(आनंद के सात परिवेश है। उनमें श्रीप्रिया प्रियतम की केलि चरम परिवेश में है। वही सातवाँ परिवेश रसिकराय श्री स्वामी हरिदास का मंगल भवन है, इस बात को स्प...

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भगवत रसिक रसिक की बातें

लाल जी प्रिया जी से कहते हैं कि ये नेत्र तो तुम्हारे मुखचंद के चकोर बन कर रह गए हैं । रूप रस लपंट ये (नयन चकोर) सदा तुम्हारे अनुराग से भरे रह कर तुम्ह...

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यह दिव्य प्रसाद प्रिया पिय कौ

भावार्थ: श्रीयुगल के प्रसार की महिमा का वर्णन करते हुए श्रीभगवत रसिकजी कहते हैं कि प्रिया प्रियतम का यह प्रसाद दिव्य है। नजर पड़ते ही, मन के आनंद को बढ...

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सम्प्रदाय नवधा भक्ति, वेद सुरसरी नीर

नवधा भक्ति और वेदों से संबंधित सभी संप्रदाय ऐसे हैं जैसे गंगा का जल (युगों युगों से अनेक भक्त जन इस भक्ति रस रूपी गंगा जल से अपना अपना "घट'' भरते आ रह...

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नित मेरौ लालन नित ही लली

(नित्य वृंदावन में प्रिया प्रियतम का नित्य बिहार निरंतर चलता रहता है फिर भी यह पुराना नहीं होता इसी रहस्य को स्पष्ट करते हुए भगवत रसिक जी कहते हैं) ह...

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हैं हम रसिक अनन्य प्रिया पिय

भावार्थ : श्री भगवत रसिक देव जी कह रहे हैं, कि हम अनन्य रसिक (युगल सरकार के अनन्य) कुंजमहल के वासी हैं, जहां हमें प्रिया प्रियतम की नित्य ही नवायमान क...

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हमारी जीवनि जुगलकिशोर

भावार्थ: भगवतरसिक जी कहते हैं कि नित्य नवीन यौवन के जोर से निरंतर प्रेमान्मत्तत रहने वाले जुगल किशोर - श्री कुंजबिहारी एवं श्रीकुंजबिहारिणी की जोड़ी ह...

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भगवत स्यामाँ स्याम कौ

श्री भगवत रसिक जी कहते हैं की वृंदावन का नित्य विहार रस सर्वोपरि रस है और हर साधक इस रस का अधिकारी नहीं है। पूर्व जन्मों के संस्कार और भावों की प्रबलत...

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दुख सुख भुगतै देह, नहिं कछु संक है

दुख सुख भुगतै देह, नहिं कछु संक है। निंदा अस्तुति करौ, राव क्या रंक है।। परमारथ व्यवहार, बनौ कि ना बनौ । अंजन है मम नैन, रसिक भगवत सनौ।। - श्री भगवत र...

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रसभरे राजत रसिकबहारी

(राग गौरी) रसभरे राजत रसिकबहारी | गौर स्याम अभिराम रूप दोऊ नव नेह विहारी  | यह सुख निरखि सखी नित प्रमुदित, प्रान करै बलिहारी | भगवतरसिक पियत या रस को ...

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लात हनी भृगु हृदय में

अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (19) जब भृगुजी ने भगवान् के वक्षस्थल पर लात मारी तो भगवान् ने अपने ऊपर किये हुए पादाघात के अपराध पर रुष्ट न होकर भ...

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पायन परि बिनती करे, से रस मुख्य सिंगार

अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1 (8) लाल जी श्री प्रिया जी के चरणों में पड़ कर उनसे जो दैन्य पूर्वक विनय किया करते हैं वही मुख्य रस श्रृंगार रस है।

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भगवत रसिक सहायक सब दिन

भगवत रसिक जी कहते हैं कि जो रसिकों (प्रियतम एवं सहचरियों) की सदा सहायता करने वाली हैं और उनको निरंतर सर्वोपरि सुख देती हैं वो एक मात्र किशोरीजी श्री र...

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हम गावें सोई करें

श्री भगवत रसिक जी के शब्दों में सखी और लाड़ली लाल के परस्पर प्रेम का वर्णन है। जो सखी के मन में भाव आता है, तुरन्त लाड़ली लाल प्रेमवशीभूत होकर वह लीला...

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हमारी दंपति संपति केलि

अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 12 (5) श्री भगवत रसिक जी कहते हैं कि प्रिया प्रियतम की केलि लीला ही हमारी सम्पति है।

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भगवत रसिक संग जो चाहै, प्रथमहै लोभै त्यागै

अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (05) श्री भगवतरसिकजी कहते हैं कि जो साधक परम रसिक श्रीयुगल की नित्य संगति के अभिलाशी हैं, उन्हें सर्वप्रथम लोभ का ...

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जात जात मैं सब

जाति-जाति करते सब चला ही जाता है, और अंत में सभी जातियाँ कुजाति सिद्ध होती हैं। कहिये ‘रसिक अनन्य’ भक्त—जो श्री राधा रानी का अनन्य भक्त है और वृन्दावन...

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यह सुख निरखि सखी नित प्रमुदित

हे सखी, "नित्य विहार" के अमृत रस को देखो और अपने प्राण-जीवन को इस रस पर न्यौछावर कर दो। श्री भगवत रसिक कहते हैं कि "नित्य विहार" का रस प्राप्त कर अन्य...

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चेला काहू के नहीं, गुरु काहू के नहीं

श्री भगवत रसिक जी के शब्दों में वह न किसी के चेला हैं, और न गुरु हैं वह केवल निज महल में  श्री लाड़ली लाल को दिन रात लाड लड़ाती हैं |

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मोह

मोह-फाँस जग बँधि रह्यौ, बिष्ठुरे करत बिलाप || बिछुरे करत बिलाप, मानि सुत, पितु, पति, माता | ससुर, जमाई, जुबति, सुहृद, गुरु, सिष, धन, भ्राता निज अनुभव ...

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बलि जैहौं श्रीरसिकचारज

(राग काफी) बलि जैहौं श्रीरसिकचारज। नित्य बिहार उद्धार कियौ जिन, मथि निज हृदय सिन्धु बारज॥ भ्रम, तम, स्रम सब हरे हमारे, कर गहि सकल संभारे कारज। भगवत रस...

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प्रथम सुनें भागवत

(छप्पय) प्रथम सुने भागवत, भक्त मुख भगवत वाणी । [1] द्वितीय अराधे भक्ति, व्यास नव भांति बखानी ॥ [2] तृतीय करे गुरु समुझी, दक्ष सर्वज्ञ रसीलो । [3] चौथे...

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लखी जिन लाल की मुसक्यान | तिनहिं बिसरी बेद

लखी जिन लाल की मुसक्यान  | तिनहिं बिसरी बेद-बिधि, जप,जोग, संजम, ध्यान  | | नैम, ब्रत, आचार, पूजा, पाठ, गीता-ज्ञान | रसिक भगवत दृग दई असि, ऐंचि कै मुख ...

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कोउ सुकिया, कोउ परकिया

किसी ने स्वकीया आरै परकीया (नायिका) के रूप में श्री प्रिया जी की कल्पना करके एक व्यर्थ का बखेड़ा सा खड़ा कर दिया है।भगवत रसिक जी कहते हैं कि हमारी प्र...

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जै जै रसिक रवनी रवन। रूप गुन लवन्य प्रभुता प्रेम पूरन भवन

अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (35) हे रसिक शिरोमणि प्यारी जू , श्री किशोरीजी, आपकी जय हो जय हो! आप रूप, गुण, लावण्य प्रभुता और प्रेम की पूर्णता ...

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नैननि देखीं और नहीं

नैननि देखीं और नहीं, श्रवण सुने नहीं और | घ्राण न सूघोँ और कछु, रसना कहौं न और || रसना कहौं न और, त्वचा परसौं नहीं औरे | कुंज बिहारी केलि झेलि, इन्द्र...

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श्री भगवत उर धारी, भक्ति करि मन को दाबै

निर्विरोध मनरंजन (11) जो व्यक्ति श्री हरी को हृदय स्थल में विराजमान करके उनकी सच्ची भक्ति करता है और मन को वश में करके गुरु की आज्ञा के अनुसार चलता है...

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हम सिष स्यामा स्याम के

श्री भगवत रसिक जी भावमयी सखी भाव से कहते हैं कि हम श्यामा-श्याम के शिष्य भी हैं और गुरु भी हैं। प्रेम से ओत-प्रोत होकर हमने अपना सर्वस्व (मन, तन, धन, ...

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जावक जुत जुग चरण लली के

श्री किशोरी जी के महाबर से युक्त दोनों चरणारविंद अद्भुत निर्मल एवं अनुपम हैं। [1] ये प्रियतम की हृदय रूपी कमल कलिका को विकसित करने वाले सूर्य हैं । [2...

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हमारे वृन्दावन उर और

हमारे वृन्दावन उर ओर | माया काल तहाँ नहिं ब्यापै, जहाँ रसिक सिरमौर || टूटि जात सत असत बासना, मन की दौरा दौर | भगवत रसिक बतायौ श्रीगुरु, अमल अलौकिक ठौर...

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लखी जिन लाल की मुसक्यान

भगवत रसिकजी कहते हैं कि रसिक लालजी ने यही मुस्कान रूपी तलवार मुख रूपी म्यान से निकालकर हमारे नेत्रों में (ऐसी) मार दी है कि अब इस मुस्कान को देखते रहन...

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महल की बात महली ही जाने

- श्री भगवत रसिक - भगवत रसिक की वाणी केवल निकुंज महल की सखियाँ ही महल की बात जानती हैं और वहां किसी की  सामर्थ्य  एवं गति नहीं हैं |

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हा हा करौ परौ पायन अब

तुम तो अपना वही एक उपाय करो—हमारी प्यारी श्री राधा के चरणों में जाओ और करुण क्रन्दन करो! स्वामिनी जी बड़ी उदार हैं, ऐसा करते ही तुम्हें वह अपना सर्वस्...

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वेदनि खोबै बैद सो

सच्चा वैद्य वही है जो रोग को जड़ से मिटा दे, वास्तविक गुरु वही है जो गोविन्द से मिला दे, सच्चा भोजन वही है जो भूख मिटा दे। भगवत रसिक जी कहते हैं कि ऐसा...