सन्तग्रन्थरागश्लोकस्तोत्रकविता
मुख्यपृष्ठग्रन्थश्री हित स्फुट वाणी
सभी ग्रन्थ
Sacred Scripture

श्री हित स्फुट वाणी

ग्रन्थ के पद एवं श्लोक

25 items
general

चकई! प्रान जु घट रहैं

निज रसिकों के सिद्धांत एवं वृन्दावन रस के नित्य विहार में श्री राधा को स्वकीया और परकीया दोनों से पृथक माना जाता है। यहाँ एक क्षण का वियोग प्रियतम एवं...

general

भानु दसम्म, जनम्म निसापति

भूमिकाः इस सवैये में सम्पूर्ण शुभ माने जाने वाले ग्रहों का उल्लेख करके भक्ति शून्य व्यक्ति के लिए उनकी व्यर्थता प्रतिपादित की गई है। व्याख्याः दसव...

general

सारस सर बिछुरंत कौ जो पल

भूमिकाः - (सारस के आक्षेप को सुनकर चकई अपने मन में विचार करती है कि) सारस का शरीर यदि सरोवर के अन्तर को एक क्षण के लिए भी सहन कर ले और उसकी पत्नी लक्ष...

general

वृषभानु नंदिनी राजति हैं

श्रीवृषभानुनन्दिनी सुशोभित हो रही हैं। सुरत के रंग-रस से भरी हुई ये भामिनी सम्पूर्ण स्त्रियों को अपनी शोभा से पराजित करके उल्लसित हो रही हैं। [1] इध...

general

आज तू ग्वाल गोपाल सों खेलि री

सखी भावापन्न श्री हित हरिवंश श्रीराधा से कहते हैं “आज तुम गोपकुमार मदन गोपाल के साथ क्रीड़ा करो।” [1] हे भामिनी, अपना अत्यन्त मान छोड़कर शीघ्र वन में च...

general

तेरौई ध्यान राधिका प्यारी गोवर्द्धनधर लालहिं

यह मान का पद है। श्री हित सजनी श्री राधिका को सम्बोधित करते हुए कहती हैं: हे राधिका प्यारी, गोवर्धनलाल को सदा तुम्हारा ही ध्यान रहता है। (श्रीश्यामसु...

general

मैं जु मोहन सुन्यौ

मैंने मदनगोपाल के मोहक वेणुनाद को सुना है। [1] इस अद्भुत नाद को सुनकर आकाश में स्थित मुनियानों (विमानों) में बैठी हुई देवताओं की स्त्रियाँ थकित हो गई...

general

आनँद आजु नंद के द्वार

आज नंद के द्वार पर आनन्द छाया हुआ है। वहाँ अनन्य दासों के भजन-रस की निष्पत्ति के लिए मनोहर ग्वाल पुत्र प्रकट हुये हैं। [1] नन्दगाँव की सब गायों के शर...

general

लाल की रूप माधुरी नैननि निरखि नेकु सखी

हे सखी, तू अपने नेत्रों से लाल की रूप माधुरी को तनिक देख तो सही। सुकुमारता की राशि श्रीश्यामसुन्दर की मुसकान कामदेव के मन को हरण करने वाली है। उनके नख...

general

आरती मदन गोपाल की कीजियै

आरती मदन - गोपाल की कीजियै। देव रिषि व्यास शुक दास सब कहत निज, क्यौं न बिनु कष्ट रस सिंधु कौं पीजियै। [1] अगर करि धूप कुंकुम मलय रंजित, नव वर्तिका घृत...

general

तू रति रंगभरी देखियत है श्री राधे

हे श्रीराधे, आज तुम प्रेम-रंग भरी दिखलाई दे रही हो, मालूम होता है कि तुमने अपने मोहन प्रियतम के साथ रात्रि में एकान्त रमण किया है। [1] तुम्हारी गति अ...

general

हरि रसना राधा-राधा रट

भूमिका- इस पद में श्री श्यामसुंदर के उत्कट विरह का वर्णन है। सूरदास जी, नन्ददास जी आदि रसिक महानुभावों ने सर्वत्र श्री राम एवं गोपी जनों के विरह के वर...

general

द्वादश चन्द्र, कृतस्थल मंगल

व्याख्याः - श्रीहित हरिवंश महाप्रभु कहते हैं कि जन्मकुंडली में चाहे बारहवें चन्द्रमा, चौथे मंगल, विरुद्ध बुद्ध, वृहस्पति वक्री, दशवें शुक्र, केतु और श...

general

चलौ वृषभानु गोप के द्वार

वृषभानु गोप के द्वार पर चलो जहाँ सुकुमार आनन्द निधि स्वरूपा श्रीश्यामा ने मोहन के हित के लिए जन्म लिया है [1] जहाँ मुदित ब्रज युवतियाँ मिलकर उच्च औ...

general

रहौ कोऊ काहू मनहि दिये

प्रस्तुत पद में श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने श्री राधारानी के प्रति निष्ठा को शपथ खा कर व्यक्त किया है एवं श्री वृन्दावन धाम की उनकी एकमात्र निष्ठा को ...

general

रसना कटौ जो अन रटौ

"रसना कटौ जो अन रटौ" - श्री हित हरिवंश महाप्रभु मेरी जिह्वा कट जाए यदि में श्री राधा नाम के अलावा कुछ और रटन करूँ।

general

मानुष कौ तन पाइ भजौ ब्रजनाथ कौं

व्याख्याः - मनुष्य का शरीर पाकर ब्रजनाथ का भजन करो। [1] अरे मूढ़, तू कलछी के समान मनुष्य शरीर पाकर भी संसार की अग्नि में अपने हाथ को जला रहा है। [2] श...

general

निकसि कुंज ठाडे भये

श्री हित हरिवंश महाप्रभु कहते हैं कि प्रिया-प्रीतम निकुञ्ज से बाहर निकलकर खड़े हुए हैं, और दोनों ने परस्पर एक-दूसरे के कंधों पर अपनी भुजाएँ रखी हुई हैं...

general

तनहिं राखि सत्संग में

अपने तन को सत्संग में रखो और मन को प्रेम-रस में डुबाओ। यदि वास्तविक सुख चाहते हो, तो श्रीकृष्ण रूपी कल्पतरु का सेवन करो।

general

मेरे प्राणनाथ श्रीश्यामा, सपथ करौं तिन छियें

मेरे प्राणनाथ श्रीश्यामा, सपथ करौं तिन छियें । " - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री स्फुट वाणी मैं शपथ खा कर कहता हूँ कि मेरी प्राणनाथ, स्वामिनी श्री...

shloka

रसना कटौ जो अन रटौ

श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी के शब्दों में: "मेरी जिह्वा कट जाए यदि मैं श्री राधा रानी के अलावा कुछ और रटूँ। मेरे नयन फूट जाएँ यदि मैं राधारानी के रूप ...

shloka

रहौ कोऊ काहू मनहि दिये

प्रस्तुत पद में श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने श्री राधारानी के प्रति निष्ठा को शपथ खा कर व्यक्त किया है एवं श्री वृन्दावन धाम की उनकी एकमात्र निष्ठा को ...

general

तू बालक नहिं

तू बालक नहीं है और चतुरता से भरा हुआ है तो श्रीकृष्ण को भली प्रकार क्यों नही भजता? [1] तू गाय के सुमधुर दूध को छोड़कर चावल के फीके पानी में अपने मन को...

general

ना जानो छिन अंत कवन बुधि घटहि प्रकासित

व्याख्या:- यह नहीं जाना जा सकता कि किस क्षण के समाप्त होते होते कौन सी बुद्धि मन में प्रकाशित हो जायेगी। [1] क्योंकि जो मुनिगण साधन करते-करते अचेतन जै...

shloka

सबसौं हित निहकाम, मन वृन्दावन विश्राम, राधावल्लभलाल कौ, हृदय ध्यान, मुख नाम

श्री हित हरिवंश जी कहते हैं कि आत्मा का सच्चा लाभ यह है कि, "आत्मा के साथ निस्वार्थ सेवा करते हुए हमेशा बृज वृंदावन में रहो, श्री राधावल्लभ लाल की छवि...