ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
10 itemsराधेति नाम जप भो रसने ममाङ्ग
हे रसने, तू “राधा" इस सरस मधुर नाम का जप करती रह। हे देह! तू श्री राधा की परम पावन चरण रज से लिप्त होकर इस श्री राधावन (श्री वृंदावन) में सदा वास किय...
पलाशार्क करीलाद्या राधे राधे रटन्ति ताम्
वृन्दावन के तृण, गुल्म और लता आदि सभी इनकी (श्रीराधारानी की) उपासना करते हैं। सखे! श्रीवृन्दावन में क्षुद्र चराचर जीव तथा आक, ढाक और करील आदि भी “राधे...
राधे ते चरणौ विहाय शरणं
हे श्रीराधे ! तुम्हारे श्रीचरणोंको छोडकर मुझे कहीं भी शरण नहीं मिली। मेरा तो सुदृढ़ विश्वास है कि इस भूमण्डल में एकमात्र आप ही सेवा करने योग्य हैं। अक...
शस्त्रवद्घातकं शास्त्रं
जिसने श्रीराधा का यशोगान नहीं किया, वह शास्त्र शस्त्र के समान घातक है तथा जिसने श्री राधा के नाम और गुण नहीं गाये, वह मनुष्य गुण सम्पन्न होने पर भी कस...
राधां ध्यायन् राधिकां वन्दमाना
मेरी एकमात्र यही इच्छा है कि मैं (सदा) श्रीराधिका का ही ध्यान, श्रीराधिका की ही वन्दना, श्रीराधिका का ही दर्शन, श्रीराधिका की ही कीर्तन-कथाओं का श्रवण...
रे चित्त मा त्यज वनं वृषभानुजाया
हे चित्त ! तुझसे मेरी एकमात्र यही प्रार्थना है कि तू श्रीवृषभानुनन्दिनी (श्री राधा) के इस श्रीवृन्दावन धाम को कभी न छोड़ना। यदि तुझे ब्राह्मण से लेकर ...
वृन्दारण्यलतागृहेषु वसतां गोविन्दलीलासुधा
जो श्रीवृन्दावनके लता-गृहों में निवास करते हैं, श्रीगोविन्दकी लीलासुधाको पान करके अविरल अश्रु बहाते रहते हैं, (निरन्तर) प्रेम से सुमधुर श्रीराधा-नाम क...
रे चित्त चिन्तय चिरं वृषभानुपुत्रिं
अरे मेरे चित्त! तू सदा श्री वृषभानु नंदिनी श्रीराधा का ही चिन्तन किया कर — उन्हें एक क्षण के लिए भी कभी न भूलना, यही मेरी अभिलाषा है। हे रसने! तू ‘रा...
राधाकीर्ति कीर्त्तयन् पादरेणुं श्रीराधाया
श्रीराधा का यशोगान करते हुए कीर्तन, अपने सम्पूर्ण अंगों द्वारा श्रीराधा की चरण-रेणु का स्पर्श, श्रीराधा के विहार स्थली श्रीवृन्दावन में पर्यटन तथा 'श्...
वृन्दावनं तद्गतवस्तुजातं सर्व नमस्यं
श्रीवृन्दावन और उसकी समस्त वस्तुएँ नमस्कार करने योग्य हैं। उनकी निन्दा कभी नहीं करनी चाहिये। जो निन्दा करते हैं, उन अपराधियोंका संग मुझे स्वप्न में भी...