ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
13 itemsउत्सवास्तु ब्रजे ज्ञेया
ब्रज लीला से संबंधित सभी उत्सव नैमित्तिक हैं। उनकी आवश्यकता श्री राधा के चरणों में प्रेम को दृढ़ करना ही है। निकुंज की शुद्ध रसमयी लीलायों से इनको प्र...
न च कर्माणि कुर्वीत
श्री राधा की अनन्य भक्ति में न तो कोई कर्मकांड, न अन्य किसी देवी देवता की उपासना, न ही एकादशी व्रत इत्यादि किसी प्रकार की विधियों को मानने की आवश्यकता...
विषयाक्त चित्तोऽपि श्वपाकोऽपि महत्तमः
श्रीराधा का नाम निरन्तर गान करने वाला और श्री ललिता जी को गुरु मानने वाला चाण्डाल विषयों में आसक्त होने पर भी सबसे श्रेष्ठ है।
स्यादब्रह्मपरपर्याय: सर्वानुस्यूतरूपिणी
श्री राधा का ही पर्यायवाची [दूसरा नाम] परम ब्रह्म है जो सर्ववस्तुओं एवं प्राणीमात्र में अनुस्यूत है। वे स्वतंत्र हैं तथा सब कुछ उसके [श्री राधा के] आश...
राधां समर्प्यये चान्नं
श्री राधा को सर्मपण करके जो मनुष्य प्रसाद ग्रहण करते हैं, उनके कोटि पाप इस प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे अग्नि रुई के ढेर को भस्म कर देती है।
मुञ्चन्त्यश्रूणि सरव्यस्तु
श्री राधा के अलौकिक सौंदर्य रूपी मतवाले हाथी से कुचले गए, उनके प्रेम में बँधे हुए उनकी अनन्य सखियाँ और स्वयं श्रीकृष्ण सदा नेत्रों से प्रेमाश्रु बहात...
न लोकाच्च भयं किंचित न
श्री राधा के चरणों की भक्ति में ऐसा कमाल है कि न तो लोक का कोई भय रह जाता है, न ही वेद-शास्त्र आदि के बंधनों का कोई भय रहता है। इतना ही नहीं, ऐसे अनन...
किं करिष्यन्ति नो वेदा
श्री राधा के अनन्य भजन में न मुझे वेद–शास्त्र की आज्ञा की आवश्यकता है और न ही किसी अन्य देवता या ईश्वर को प्रसन्न करने अथवा उनसे भयभीत होने की आवश्यकत...
नित्यं भक्तपराधीना तेन राधा बिहारिणी
श्री राधिका महारानी नित्य ही भक्त के आधीन हैं। श्री कृष्ण उनके अनन्य भक्त हैं, उनकी भक्ति के आधीन होकर, स्वामिनीजी समान भाव से, श्री कृष्ण के संग विहा...
निरये स्थिति रेवास्तु
भले ही मुझे नरक का वास मिले, भले ही कभी भी परम पद की प्राप्ति न हो, जहाँ-तहाँ कहीं भी जन्म मिलता रहे—परंतु श्री राधा के चरणों की अनन्य भक्ति अथवा उन श...
श्रीराधा भजनीया च तद्भक्तकानां
श्री राधा का भजन करना और उनके अनन्य भक्तों का संग करना चाहिए। बुद्धिमानों को यह नित्य करना चाहिए, जिससे किशोरीजी के चरणों में भक्ति दृढ़ होती है — यही...
राधाभक्तपदाम्भोज
श्री राधा महारानी के अनन्य भक्तों की चरण-धूलि को अपने मस्तक पर धारण कर लेना चाहिए। फिर यम-नियम आदि अन्य साधनों की क्या आवश्यकता? न तो वैराग्य की आवश्...
यन्नामस्मरणात श्वपाकोपि भवेद्विज
श्री राधा के नाम स्मरण करने से श्वपच भी द्विज बन जाता है। “राधा” नाम के स्मरण मात्र से समस्त जीवों का शीघ्र कल्याण सम्भव है।