ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
8 itemsदेखिके चरण चालि लाजत मराल गज
श्री राधा-कृष्ण के चरणों की गति को देखकर राजहंस और गज भी लज्जित हो रहे हैं। उनके चरण नख के प्रकाश के समक्ष चंद्रमा भी फीका पड़ जाता है। [1] उनके लाल...
लड़ैती मैं सब भाँति तिहारो
हे राधे! मैं हर प्रकार से केवल आपकी ही हूँ। जैसे मछली जल के बिना जीवित नहीं रह सकती, वैसे ही मेरे मन के लिए आपकी छविनिधि ही जीवनदायिनी है। [1] मेरे च...
बंशीअलि हरिदास जी, हित हरिबंश समेत
मैं श्री वंशी अलि जी समेत स्वामी श्री हरिदासजी और श्री हित हरिवंशजी के चरणों में विनम्रतापूर्वक प्रणाम कर, उनके चरणों की पावन रज को अपने मस्तक पर धारण...
गति गरवीली देखि के मानत मन में लाज
श्री राधारानी की अति मनोहर, अति गर्वीली चाल को देखकर गजराज (हाथियों का राजा) भी अपने भीतर लज्जित हो उठता है। इतना विनीत हो जाता है कि वह झुककर श्री रा...
मम विनय करुणा धाम श्यामा श्याम
हे करुणा के धाम श्री श्यामा-श्याम! मेरी यह विनती सुनिए — मुझे नित्य श्रीवृंदावन का वास एवं अनन्य रसिकों का संग प्रदान कीजिए। [1] श्री संकेत अली जी ...
चलु मन श्री वृन्दावन ओर
हे मन! उस परम दिव्य वृन्दावनधाम की ओर चलो जो अद्वितीय है, और समस्त दिव्य कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। वहाँ युगल किशोर श्रीराधा-कृष्ण सदा नित्य विहार...
काहू की मानत न प्रिय लालन चित्त उदास
जब किशोरीजी मान करके बैठीं और किसी के भी मनाने पर नहीं मानीं, तब श्री कृष्ण का मन उदास हो गया। यह सोचते हुए कि — अब मान कैसे समाप्त होगा, अंत में श्री...
चलु मन श्री वृन्दावन ओर
हे मन! व्यर्थ भटकने का क्या लाभ? चलो — ब्रजभूमि की ओर, जो संपूर्ण शांति और आनंद का धाम है। वृंदावन, मथुरा, महावन, बरसाना और नंदगाँव — ये सब परमपावन स्...