ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
22 itemsराधा माधव भैंट भई
प्रस्तुत पद में श्री सूरदास जी, राधा माधव की मिलन लीला का वर्णन करते कहते हैं कि, "श्री राधा और श्री कृष्ण जब मिलते हैं (राधा कृष्ण बन जाते हैं और कृ...
राधा परम निर्मल नारि
हे श्री राधा, आप परम निर्मल नारी हैं, यह मैं ह्रदय में बिना किसी दुविधा के, मन तथा कर्म से कहती हूँ। [1] केवल आप ही श्री श्यामसुंदर के मन की अवस्था क...
प्यारी, प्रीतम आरति करतु
श्री राधा की एक अंतरंग सखी श्री राधा से कहती है, हे राधे, प्रीतम श्री कृष्ण तुमसे मिलने के लिए अत्यंत व्याकुल हैं। वे तुमसे मिलने के लिए मेरे चरणों मे...
स्यामा तू अति स्यामहि भावै
हे श्यामा प्यारी (राधा)! तू कृष्ण को अत्यधिक प्यारी है। बैठते, उठते, चलते, गाय चराते तुम्हारी ही लीला गाते हैं। [1] (तुम्हारे) पीले रंग को (शरीर को) ...
जो सुख होत गोपालहिं गायैं
श्री कृष्ण का प्रेमपूर्वक कीर्तन करने से जो सुख (रस) प्राप्त होता है, वह जप, तपस्या और करोड़ों तीर्थों में स्नान करने से भी नहीं प्राप्त होता। [1] जि...
राधे हरि तेरौ नाम विचारै
हे राधा, कृष्ण तेरे नाम का ही विचार करते रहते है। तुम्हारे गुणो की माला गूंथकर वाणी रूपी हाथ से घुमाते रहते हैं। [1] आँख मूँदकर तुम्हारा ही रूप ध्यान...
रे मन मूरख जनम गँवायौ
यह संसार सेमल के फूल के समान है जो पहले तो बहुत सुहाना लगता है, फिर उसमें फल आते हैं किंतु वह फल तो पकने पर तड़क जाता है। उसमें न गुदा होता है न रस के...
सब तजि भजिऐ नंद कुमार
सब सांसारिक प्रपंचों को त्याग कर श्री हरि का भजन करो। किसी अन्य का भजन करने से काम नहीं चलेगा, और न ही यह भव जंजाल मिटेगा। [1] जिस जिस योनि में भी जी...
जौ हम भले बुरे तौ तेरे
चाहे हम अच्छे हों या बुरे, हैं तो हम आपके ही।हे प्रभु! हमारी लाज और प्रसिद्धि आपके ही हाथों में है; कृपया मेरी प्रार्थना सुनें! [1] सब को त्याग कर ही...
सुने री मैंने निरबल के बल राम
मैंने सुना है कि निर्बल के बल भगवान हैं। प्राचीन संत भी साक्षी हैं कि जो अपने आपको भगवान के भरोसे छोड़ देते हैं, उनके सभी बिगड़े काम प्रभु स्वयं संवार द...
जो सुख ब्रज में एक घरी
ब्रज में जो आनन्द प्रत्येक घड़ी हो रहा है, वह आनन्द तीनों लोकों में नहीं है। यह गोप-नगरी धन्य है। [1] आठों सिद्धियाँ और नवों निधियाँ द्वार पर यहाँ हा...
बृंदाबन खेलत हरि होरी
वृंदावन में भगवान हरि (श्रीकृष्ण) होली खेल रहे हैं। वहाँ ताल, मृदंग, झाँझ और डफ बज रहे हैं, और नंदलाल (कृष्ण) व वृषभानुकिशोरी (राधा मिलकर उत्सव मना रह...
दोऊ राजत स्यामा स्याम
श्री राधिका और श्यामसुंदर दोनों सुशोभित हैं। ब्रजवनिताओं का सम्पूर्ण समूह भी उनके साथ ही सुशोभित है। आकाश से देवांगनाएँ भी उत्सुक होकर उनके दर्शन कर र...
मैं ब्रजवासिन की बलिहारी
श्री सूरदास जी कहते हैं कि मैं ब्रज वासियों की बलिहारी जाता हूँ जिनके संग श्री गोवर्धन धारी कृष्ण नित्य ही क्रीड़ा करते हैं। [1] किसी बृजवासी के संग व...
मैं कैसें रस रासहिं गाऊँ
मैं किस प्रकार रास रस का वर्णन करूँ ? श्यामसुन्दर की प्यारी श्रीराधिका जू की कृपा से ही केवल मैं ब्रज का वास प्राप्त कर सकता हूँ! [1] मैं किसी अन्य द...
माधौ मोहिँ करौ वृंदावन रेनु
ब्रह्मा जी विनयपूर्वक स्तुति करते हुए कहते हैं—“हे माधव! मुझे श्री वृन्दावन की पावन रज बना दीजिए। यह वही दिव्य रज है, जिस पर आप अपने चरणों से विचरण कर...
ऐसैं बसिऐ ब्रज की बीथिनि
ब्रह्मा कहते हैं— ब्रज की गलियों में बसने की रीति ऐसी ही होनी चाहिए जहाँ हम ब्रजवासियों और ग्वालों के जूठे पत्तलों से अन्न के दानों (सीथ) को चुन-चुनकर...
चरन कमल बन्दौ हरि राई
मैं श्री हरि के कमल-चरण को प्रणाम करता हूँ जिनकी कृपा से एक लंगड़ा व्यक्ति एक पहाड़ पर चढ़ सकता है और एक अँधा व्यक्ति सब कुछ स्पष्ट रूप से देख सकता है...
मेरो मन अनत कहां सुख पावै
श्री सूरदास जी कहते हैं, मेरे हृदय को और कहाँ सुख मिलेगा? (अर्थात् श्री राधा कृष्ण के अतिरिक्त कहीं ओर सुख नहीं मिल सकता।) [1] एक पक्षी जो जहाज पर र...
ब्रज में रहौं आन नहिं जावौं, कृपा तिहारी पाऊँ
हे प्रभु! मैं केवल ब्रज में ही रहूँ और कहीं अन्यत्र न जाऊँ, बस आपकी यही कृपा चाहता हूँ। मैं तो जन्म-जन्मों का याचक (भिखारी) हूँ और मेरा नाम 'सूरदास' ह...
धनि यह वृन्दावन की रेनु
वृन्दावन की रज धन्य है। [1] जहाँ श्री कृष्ण गऊ चराते हैं और वंशी बजाते हैं। [2] जो व्यक्ति मन को मोहित करने वाले कृष्ण का ध्यान धरता है वह अत्यन्त सुख...
धन्य धन्य वृषभानु दुलारी
श्री वृषभानु जी की बेटी (श्री राधा) धन्य हैं। उनके माता-पिता भी धन्य हैं, और यह बृज भी धन्य हैं जहाँ प्यारी किशोरी जी का निवास है। [1] वह दिन धन्य है,...