सन्तग्रन्थरागश्लोकस्तोत्रकविता
मुख्यपृष्ठसंतश्री हित दामोदर दास
सभी संत

जीवन चरित

ब्रज परंपरा के वैष्णव संत।

श्री श्री हित दामोदर दास वाणी संग्रह

general

भज मन रास रसिक किशोर

हे मन, तू रास रस के रसिक जुगल किशोर श्री श्यामाश्याम का भजन कर। गौर वर्ण की श्री राधा एवं श्याम वर्ण के श्री कृष्ण समस्त गुणों के निधि हैं, चंचल चित्त...

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वृन्दावन कौ बसिवौ नीकौ

श्री वृंदावन धाम का वास सर्वोत्कृष्ट है। यहाँ प्रिया प्रियतम की ही पग पग पर लीला स्थली विद्यमान है, अत: जहां जहां भी यह मन जाता है वहाँ वहाँ उसके जीवन...

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श्री वृंदावन छाँड़ि कै जो भटक्यौ दिसि देस

श्री वृंदावन धाम का त्याग कर यदि मैं किसी अन्य देश की ओर भटकूँ तो मेरी यह बात सत्य हो जाए कि मुझे सर्प डस ले।

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जो कोऊ वृन्दाविपिन बसै

वृंदावन वास की ऐसी अद्भुत महिमा है कि यदि किसी को वृंदावन वास मिल जाये और उसके पहाड़ के समान भी पाप हों, तो भी सहजता से यहाँ डोलने से नष्ट हो जाते हैं...

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नमो-नमो जमुना महारानी

श्री वृंदावन राजधानी में विद्यमान श्री यमुना देवी को नमस्कार है जिनके तट के निकट श्री श्यामा श्याम सदा नित्य विहार में निमग्न रहते हैं। [1] श्री यमुन...

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कोऊ कामी क्रोधी कहौ, कोउ लोभी कहौ नाऊँ

कोई चाहे मुझे कामी कहे, क्रोधी कहे अथवा लोभी नाम से पुकारे, परंतु मैं श्री वृंदावन का त्याग कर किसी भी अन्य जगह नहीं जाऊँगा।

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सिर काटौ पावक जरौ

भले ही मेरा सिर काट दिया जाए, आग में झोंक दिया जाए, पानी में डुबो दिया जाए, या जहर पीने के लिए मजबूर किया जाए, फिर भी मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि मैं श्...

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वृंदावन सुखरासि है, आनंद ठाऊँ ही ठाऊँ

श्री वृंदावन धाम सुख की राशि है, जहां ठौर ठौर में आनंद ही आनंद है। मेरी यही अभिलाषा है कि ऐसे श्री वृंदावन धाम में विराजित श्री राधा वल्लभ लाल को त्या...

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कुँज कुँज निरखत फिरौ

मैं श्री वृन्दावन में विचरण करते हुए विभिन्न कुंजों को निहारा करूँगा एवं यमुना जल में स्नान करूँगा। श्री वृन्दावन को छोड़कर मैं कभी भी कहीं और नहीं जाऊ...

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अन्न धन भंडार भर दे

चाहे मुझे अन्यत्र स्थान में अन्न, धन आदि के भंडार अथवा सोने के महल ही क्यों न दिए जायें, परंतु मैं श्री वृंदावन को त्याग कर कभी कहीं नहीं जाऊंगा।

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जो बोलौ तो साच कहौं नातर बोलौ नाहि

यदि बोलूँगा तो केवल सत्य ही बोलूँगा, नहीं तो मौन रहूँगा, और किसी की भी कभी निंदा नहीं करूँगा। इस दृढ़ संकल्प के साथ, मैं सदैव वृंदावन में वास करने का ...

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नेह तजौ घर की घरन

हे मन! घर-परिवार के मोह को छोड़ दे, और सेवकों का साथ भी त्याग दे। मेरी यही प्रतिज्ञा है कि मैं श्रीधाम वृंदावन को छोड़कर अन्यत्र नहीं वास करूँगा।

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मारौ मोहि तारौ कोउ, सब दुतकारहु गाऊं

भले ही कोई मुझे मारे अथवा पार लगाये, सब को दुतकार के मैं सदा वृंदावन के गुणों को गाऊँगा। मेरी यही प्रतिज्ञा है कि मैं श्रीधाम वृंदावन को त्याग कर कहीं...

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लाज तजौ मसकत करो यौ निर्वाह कराउं

मैं समस्त प्रकार की लज्जा का त्याग कर, चाहे कितनी ही कठिनाइयाँ क्यों न सहनी पड़ें, श्रमपूर्वक अपने जीवन का निर्वाह कर लूँगा, परंतु मैं वृंदावन को छोड़...

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बेसर कौन की अति नीकी

बेसर (बुलाक) कौन की अधिक सुंदर है ? इस बात पर प्रिया-प्रियतम में होड़ लग गई और हृदय की चौंप बढ़ गई। [1] श्री ललिताजी के आगे न्याय डाला गया कि किसी बे...

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कोउ कामी क्रोधी कहौ कोउ लोभी कहो नाऊं

चाहे कोई मुझे कामी कहे, क्रोधी कहे, अथवा लोभी कहे, परंतु मैं वृंदावन को छोड़कर कहीं और नहीं जाऊँगा, चाहे कोई मेरी कितनी ही निंदा करे।

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रैन रढौं पानी पियौ पातर सीथ चुगाउं

चाहे मुझे रातभर धरती पर ही सोना पड़े, केवल जल पीना पड़े और रूखा-सूखा अन्न ही भोजन में मिले, फिर भी मैं वृन्दावन को कभी नहीं छोड़ूँगा।

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वासी की आसा करौ वासी हाथ विकाऊं

मेरी आशा वृन्दावन-वासियों पर ही है, मैं अपने को उन्हीं के हाथ समर्पित करता हूँ। अब मैं श्री धाम वृन्दावन को त्याग कर कहीं नहीं जाऊँगा।

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देत सदा यमुना सुख राशि कों

श्री यमुना सदा असीम आनंद का दान देने वाली हैं, जिनका नाम (“यमुना”) इतना सहज है कि उसमें तनिक भी श्रम नहीं होता। यमुना हरि के धाम की प्राप्ति कराने वाल...

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यह तन यह वन जमुन तट मिल्यौ वन्यौ है दाउ

यह मानव देह, तथा वृन्दावन में यमुना तट का वास मिलना अत्यंत दुर्लभ सौभाग्य है। अतः सांसारिक आशाओं को त्यागकर, युगल किशोर का निरंतर भजन करना चाहिए।

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जो कोऊ वृन्दाविपिन बसै

जो कोई भी श्रीधाम वृन्दावन में वास करता है — चाहे उसके पाप पर्वत के समान भारी क्यों न हों, वृन्दावन के प्रभाव से वे सहज ही नष्ट हो जाते हैं। [1] जो भ...

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अंवर कंवर जौ जुरै रुखौउ उत्तम भोग

चाहे पहनने को वस्त्र और ओढ़ने को कंबल, और खाने को उत्तम अथवा रूखा भोग मिले या न मिले, तथा सुख-दुःख जैसे भी संयोग हों, कैसी भी परिस्थिति हो, वृन्दावन म...