श्री हित कृष्ण चंद्र
जीवन चरित
श्री श्री हित कृष्ण चंद्र वाणी संग्रह
अनाथं पतितं मूढं
हे श्रीवृन्दावनेश्वरि [श्री राधा] ! इस अनाथ, पतित और मूढ़ की ओर एक बार भी तो अपनी स्नेहमयी कृपावलोकन से देख दीजिये; क्योंकि इसने केवल आपके ही चरणाश्रि...
त्वत्सेवा रीतिराश्चर्य लोकवेद-विलक्षणा
हे श्रीवृन्दावनाधीश्वरि [श्री राधे] ! आपके चरण-कमलों की सेवा रीति आश्चर्य्यमयी एवं लोक-वेद-विलक्षण है। वह केवल आपकी कृपा और सद्गुरु के संग से ही कभी प...
अस्तु वामास्तु वा राधे कोटि जन्मान्तरेऽपि मे
हे राधे ! आपके चरण-सरोरुह-दास्य की आवश्यकीय आशा ही मेरी एक मात्र आशा है, वह चाहे कोटि-कोटि जन्मों में पूरी हो या न भी हो।
हा राधे स्वामिनि कदा किशोरी दिव्य रूपिणी
हा राधे ! हा स्वामिनि !! मैं कब दिव्य स्वरूपमयी, एक मात्र प्रेम-रस-मग्न किशोरी होकर आपकी किंकरी (दासी ) हो सकूँगी ?
सर्वथा सार सारैक नखचन्द्र
मैं आपके चरण-कमलों की सेवाशा का त्याग कैसे कर सकती हूँ ? जबकि हे राधे! आपके चरण-नख-चन्द्र की सुधा का लव - लेशमात्र ही सम्पूर्ण सारों का एकमात्र सार है...
यद्यप्यानन्द साम्राज्यं
[ हे स्वामिनि राधे ! ] यद्यपि श्याम-सुन्दर श्रीकृष्ण समस्त लीलावतारों के शिरोभूषण और श्रानन्द-साम्राज्य की पराकाष्ठा हैं फिर भी वे सर्वेश्वर आपके आपक...
यस्याः पदरसानन्दा कोटयं शेनापि नो समाः
जिनके पद-रस के कोट्यांश आनन्द के तुल्य अन्य सब मिलकर भी नहीं हैं। वह सर्व-प्रेमानन्द-रसं-स्वरूपा [श्रीराधा] ही मेरी स्वामिनी हैं।
वैष्णवानन्दकोटिर्वा ब्रह्मानन्दादि कोटयः
हे राधे ! कोटि-कोटि वैष्णवानन्द और कोटि-कोटि ब्रह्मानन्दादि भी मेरे द्वारा आपकी पदनखच्छटा के एक कण पर ही न्यौछावर कर दिये गये या मैं उन्हें न्यौछावर क...
त्वमेव स्वपदाम्भोज रस-चर्त्मनि
हे स्वामिनि [राधे]! केवल आपके ही चरण-कमलों के रस में मेरी मति रमण करती रहती है, तब आपकी करुणा-दृष्टि से अभिसिञ्चित होने की मेरी आशा को आप पूर्ण न करें...
लोकवेद पथं त्यक्त्वा तवैव चरणाम्बुजम्
हे स्वामिनि [राधे] ! लौकिक एवं वैदिक मार्गों का परित्याग करके मैं केवल आपके श्रीचरण-कमलों की शरण आई हूँ !
सर्वज्ञोपि परेशोपि मुग्ध मुग्धोति
जो सर्वज्ञ और परेश (परम-प्रभु) होकर भी मुग्ध दशा में दीनवत् जिनकी चाटुकारी करते हैं, वही [कृष्ण-प्रिया श्रीराधिका] मेरी एक मात्र गति हैं।
सर्वे धर्माममाधर्माः
हे राधे! जहां कहीं भी, यदि आपके श्री चरण कमलों की माधुरी वहाँ प्राप्त नहीं होती तो मेरे लिए वे सब धर्म अधर्म है, साधु असाधु हैं एवं साधुता असाधुता ही ...
न त्वं वैकुंठ लोकेपि
हे श्री राधे! न आप वैकुण्ठ लोक में हैं और न आपके रस दाता प्रियतम श्री कृष्ण ही। यदि आप कहीं हैं, तो केवल श्री वृंदावन में। अतएव मैंने भी उसी श्री वृंद...
भूत्वाति सुकुमाराङ्गी किशोरी गोप कन्यका
हे श्री राधा! मैं कब सुकुमाराङ्गी किशोरी गोप कन्या होकर आपके मृदुल पद-कमलों का लालन- सम्वाहन करूँगी ?
कोटि कोटि जगद्भासि नखचन्द्र मणिच्छटे
अपने चरणों की नख चन्द्र मणि की छटा से कोटि कोटि भ्रमांडों को भी प्रकाशित करने वाली स्वामिनी! हे आश्चर्यमय रूप लावण्यमयी! मुझे एक बार तो दर्शन दीजिए ?
श्रीराधे त्वपदाम्भोज पराग
हे श्रीराधे! आपके चरण-कमल-पराग से पूर्णतया अनुरंजित रसमय श्रीवृन्दावन के प्रति मुझे अचला प्रीति प्रदान कीजिए।
विदग्ध सुन्दरी-बृन्द वर
चतुर सुन्दरी-बृन्द की श्रेष्ठ चूड़ामणि रूपा श्रीराधे स्वामिनि ! हे महारस-निधे ! मैं कब आपके चरणों का आराधन (सेवन) करूँगी ?
वैकुण्ठादि पदं काम्यमपि
हे वृन्दावन में विलास करने वाली श्री राधे! जहाँ जहाँ पर भी मैं आपका दर्शन नहीं करती, उन वैकुंठ आदि परम धाम (एवं उनकी कामना) भी मेरे लिए अत्यंत तुच्छ ह...
मुदित लाल प्यारी चरण चित्र करे
आनंद में मग्न होकर प्रियतम श्री कृष्ण, प्यारीजू श्री राधा के चरणों का चित्रांकन कर रहे हैं।नील कमल के समान सुंदर हाथों से, वे स्वर्ण कमल सदृश श्री राध...
किं करोमि क्क गच्छामि
हे राधे ! मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? और किसके चरणों में लुण्ठित होऊँ ? तुम्हीं कहो तुम्हारा वह दास्य-रसोत्सव मुझे किस प्रकार प्राप्त होगा ?
प्रेमामृत रसानन्द मकरन्दौघ
हे स्वामिनि! हे प्रेमामृत के आनंदरस का मधुर रस बरसाने वाली श्री राधे! आप कब मुझे अपने चरणकमलों का दास्य प्रदान करेंगी?
सर्व मर्य्यादयातीत सर्वेशाधिक
हे वृन्दावनेश्वरी श्रीराधे ! आपका वैभव सर्वेश [श्रीकृष्ण] से भी अधिक है। आप समस्त मर्यादाओं से परे हैं [ अर्थात् लोक-वेद-मर्याएँ आपको छू तक नहीं पात...
हा राधे प्राण कोटिभ्योऽप्यति
हा राधिके ! मुझे आपके श्रीचरण-कमल अपने कोटि कोटि प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। आपकी चरण-सेवा के बिना मेरा क्षण भर का भी जीवन कठिन है। [मैं उसे कैसे धा...
यतन्तु कृतिनो यज्ञः तपः
हे राधे [ स्वामिनि ! ]! भले ही कोई सुकृती यज्ञ, तप, स्वाध्याय (वेद-पाठ) और नियम-संयमों का यजन-साधन करे, किंतु मैं तो केवल आपके श्रीचरण-कमलों की रेणु [...
राधे त्वद्दास्य पदवी सर्व
हे राधे! यद्यपि आपकी दास्य-पदवी समस्त भक्तों के लिये भी अत्यन्त दुर्गम है, तथापि मैं निर्लज्ज की भाँति केवल उसी दुर्लभ पद को प्राप्त करने की आशा हृदय ...