सन्तग्रन्थरागश्लोकस्तोत्रकविता
मुख्यपृष्ठसंतश्री कान्त किशोर
सभी संत

जीवन चरित

ब्रज परंपरा के वैष्णव संत।

श्री श्री कान्त किशोर वाणी संग्रह

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काहू तप-दान-मद, काहू धन-मान-मद

किसी को तप और दान का अभिमान है, किसी को धन, मान और प्रतिष्ठा का गर्व है; किसी को अपने गुण और ज्ञान पर अहंकार है, तो किसी को अपनी बातों पर ही गर्व है। ...

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श्री स्वामी हरिदास के चरन कमल चित लाउ

मैं अपने मन को श्रीस्वामी हरिदास जी के परम पावन चरणकमलों में लगाता हूँ। श्री कान्त रसिक कहते हैं कि प्रिया-प्रियतम की रस माधुरी का अवलोकन एवं अनुभव क...

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न काहू को निन्दनौ ना काहू की संस

मैं न तो किसी की निन्दा करूँ, न ही किसी की चापलूसी करूँ। श्री कान्त रसिक कहते हैं कि मेरे हृदय के परम आभूषण रूपी हार एक मात्र स्वामी श्री हरिदास जू ही...

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रस की नित नव उठत तरंग

श्री धाम वृन्दावन में नित्य ही प्रेमरस की नई-नई तरंगें उठती रहती हैं। वहाँ प्रिया-प्रियतम की जोड़ी हँसती-खिलती लताओं की भाँति झूमती रहती है, जिनके अंग...

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बंदौं श्रीहरिदास के चरन कमल चित लाइ

मैं मन लगाकर स्वामी श्री हरिदास जी के चरण-कमलों का वंदन करता हूँ जिन्होंने अपने हृदय की रस-माधुरी अर्थात् प्रिया प्रियतम के नित्य विहार रस को प्रत्यक्...

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स्वारथ कौ संसार सब परमारथ कौ खोल

सारा संसार अपने स्वार्थ सिद्ध करने में लगा हुआ है, और वास्तविक परमार्थ केवल दिखावा मात्र अथवा खोल (ऊपरी आवरण) रह गया है। लोग प्रेम और रस-रीति की बड़ी-...

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श्रीहरिदास सरन हौं आयौ

जब से मैं अनन्य नृपति स्वामी श्री हरिदास जी की शरण में आया हूँ, तब से संसार के सभी झूठे बंधन छूट गए हैं और मुझे परम उज्ज्वल रस की प्राप्ति हुई है। [1]...

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कान्त द्वैत अद्वैत नहि नहीं अशिष्ट-विशिष्ठ

श्रीयुगल सरकार न तो द्वैत, अद्वैत, द्वैताद्वैत और न ही विशिष्टाद्वैत जैसे दार्शनिक मतों की सीमाओं में आबद्ध हैं। वे वेदों के समस्त तार्किक विवादों से ...