सन्तग्रन्थरागश्लोकस्तोत्रकविता
मुख्यपृष्ठसंतश्री ललित मोहिनी देव जू की वाणी
सभी संत

जीवन चरित

ब्रज परंपरा के वैष्णव संत।

श्री श्री ललित मोहिनी देव जू की वाणी वाणी संग्रह

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हमारे यहाँ के साधु प्रसाद न चाहें

हमारे यहाँ के, श्रीस्वामी हरिदास जी के अनुयायी सन्त, श्री प्रिया प्रियतम के अतिरिक्त किसी अन्य देवी-देवता का प्रसाद ग्रहण करना पसन्द नहीं करते और न कभ...

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श्री वृंदावन में परि रहै

जो जन श्रीवृन्दावन में पड़ा रहकर श्रीबाँकेबिहारीजी के दर्शन करता रहता है, वह तो सम्राटों का भी सम्राट् है । उसकी बराबरी भला कौन कर सकता है!

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नैंन बिहारी रूप निरखि

इन नेत्रों से निरंतर श्री बिहारी जी के रूप का दर्शन करता रहूँ, रसना (जिह्वा) से केवल उन्हीं के नाम का रसास्वादन करूँ और कानों से आठों पहर दिन-रात उन्ह...

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साधु साधु सब एक हैं

समस्त संत एक ही हैं और समस्त वृन्दावन के ठाकुर भी एक ही हैं। उसी का ही विवेक जागृत होता है, जो संतों से हित करता है।

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जिकरि फ़िकरि सब छाँड़ि कै

सब प्रकार की (लौकिक-अलौकिक ) चर्चाओं और चिताओं का परित्याग करके श्रीवृन्दावन में अखण्ड वास करते हुए श्रीप्रिया-प्रियतम की नित्य रसमयी केली-लीलाओं का य...

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सब ही संत हैं रस भरे

समस्त रसिक संत रस से परिपूर्ण हैं; वे सभी रस की खान हैं। श्री राधा-कृष्ण रसिकों के संग वृन्दावन के रंगमहल में विहार कर रहे हैं।

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दिन अथयौ संध्या भई

दिन से संध्या हो गई, मोर भी बोलने लगे; परंतु श्री बिहारी-बिहारिनि रंगमहल में नैनों से नैना मिलाए हुए हैं।

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राजा परजा बादशाह

राजा, प्रजा एवं बादशाह—सब आते-जाते रहते हैं; परंतु एकमात्र कुंज-बिहारिणी श्री राधारानी ही समस्त अभिलाषाओं का सदा पोषण करती हैं।

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बैठत उठत चलत

समस्त द्वन्द्वों (निंदा-स्तुति आदि) और चिंताओं से परे रहकर उठते-बैठते, चलते-फिरते सदा श्री बांके बिहारी महाराज की चर्चा करते हुए श्रीवृन्दावन में पड़े...

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कहा त्रिलोकी जस किये

यदि त्रिलोक प्राप्त कर लिया, तो भी क्या हुआ? यदि त्रिलोक दान कर दिया, तो क्या हुआ? यदि त्रिलोक को वश में भी कर लिया, तो क्या हुआ? यदि भक्ति न की, तो क...

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Hamare Yahan Ke Sadhu Prasad Na Chahe

Hamare Yahan Ke Sadhu Prasada Na Chahen. Na Vastra Ko Adanga Lagaven. [1]Magana Bhaye Guna Gaven. Priyacharana China-China Saharavain. [2]Basi Vrindav...