सन्तग्रन्थरागश्लोकस्तोत्रकविता
मुख्यपृष्ठसंतश्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी
सभी संत

जीवन चरित

ब्रज परंपरा के वैष्णव संत।

श्री श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी वाणी संग्रह

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जाके हित में लाडिली, ताकौं विघन न कोई

जिसके पक्ष में स्वयं लाडिली जी (श्री राधा) हो जाती हैं, उसके मार्ग में फिर कोई बाधा या विघ्न शेष नहीं रहता। चाहे संपूर्ण संसार ही उसका शत्रु क्यों न ब...

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हाथ हमारे सब कछू, दियौ बिहारिनी बाल

श्री कुंजबिहारिनी जू (श्री राधा) ने हमें सब कुछ प्रदान किया है। वे सदा हमारे अंग-संग रहती हैं और नित्य-विहार की सर्वोच्च केली का प्रेम-रस निरंतर प्रदा...

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जा मारग मेरौ गुरु चलयौ, ता मारग हौं जाऊँ

जिस मार्ग पर मेरे सद्गुरु चले हैं, मैं भी उसी मार्ग का अनुसरण करूँगा। उनके बताए हुए स्वामी हरिदास जी के रस-उपासना-मार्ग के अतिरिक्त संसार में जितने भी...

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राग द्वेष हमरे नहीं

ललित रस के जो सुजान रसिक होते हैं उनके राग द्वेष एवं देहाभिमान लेशमात्र भी नहीं होता क्योंकि वे तो सदाकाल अपने सरस भाव द्वारा श्री प्रिया जू (श्री राध...

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जो कछू कियौ सो लाड़िली

जो कुछ करती हैं वह लाड़ली (श्री राधा) ही करती हैं एवं उनकी इच्छा से ही सब कुछ होता है। लाड़ली की कृपा से ही आगे भी सब कुछ होगा, अत: लाड़ली जी के शरणाग...

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सदा बसै वृन्दाबिपिन तजे न कबहूँ खेत

जो बड़भागी महतजन ऐसे अनन्य भाव से श्रीवृन्दावन में वास करते हैं कि वे एक क्षण को भी वृंदावन को त्याग कर नहीं जाते, वे ही महतजन साक्षात श्रीप्रियाजू (...

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रसिक सिरोमनी लाड़िली सो हमरे अंग संग

रसिक शिरोमणि कुंज बिहारिनी, श्री लाड़ली जू (श्री राधा) सदा हमारे अंग-संग रहती हैं, इसी कारण हम कुंज महल में विराजते हुए, उनकी अखंड केलि को सदा निहारते...

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आये तैं हर्षे नहीं, गये करें नहिं सोग

कोई व्यक्ति या वस्तु आए, हमें कोई हर्ष नहीं; कोई व्यक्ति या वस्तु छिन जाए, हमें कोई शोक नहीं क्योंकि हम तो गौर-श्यामल वर्ण वाले श्यामा कुंज बिहारी के ...

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उत्तम करे सो लाड़िली

श्रीराधा जो कुछ करती हैं, वह सदा परम उत्तम और कल्याणकारी होता है; जबकि हम सीमित बुद्धि वाले जीव केवल मध्यम या स्वार्थयुक्त कर्म ही कर पाते हैं। जो साध...

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आचारी सौं ठाकुर डरैं

जो केवल नियम-आचार, विधि-निषेध एवं बाहरी रीति-रिवाज में फँसे होते हैं, उनसे ठाकुरजी (श्रीकृष्ण) दूर ही रहते हैं — उनके पास नहीं आते। परंतु सच्चे प्रेमी...

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कोई कहै बैकुंठ, कोई कहै ब्रह्म है

कोई भगवान का निज स्वरूप वैकुंठनाथ को बताता है, कोई ब्रह्म को बताता है। कोई अयोध्यानाथ श्री राम को बताता है तो कोई स्वयं भगवान श्री कृष्ण को बताता है। ...

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तन मन वचननि लाड़िली मेरी जीवन प्रान

मेरे तन, मन और वाणी में पूर्ण रूप से लाड़ली जी (श्री राधा) ही समाई हुई हैं, जो मेरे जीवन की प्राण स्वरूपा हैं। नित्य विहार की सुंदर केली-लीलाओं में सद...

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मात तात जाके नहीं वृषभानु सुता नहिं नाम

स्वामी श्री हरिदास जी की अखंड नित्य विहार उपासना में श्री राधा एवं श्री कृष्ण को जन्मादि लीलाओं से पृथक सदा नित्य किशोर माना जाता है। श्री राधा का “वृ...

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ललितप्रिये हरिदासि जू नित्य केलि सुख दानि

श्री ललिता सखी के अवतार, स्वामी श्री हरिदास जी महाराज, प्रिया-प्रियतम की नित्य-केली-रस के प्रदाता अनन्य रसिकाचार्य हैं। उनकी कृपा से साक्षात्‌ रस की ख...

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नित्त सरद नित्त तीज है

जहाँ नित्य ही शरद ऋतु है, नित्य ही तीज का उत्सव है और नित्य ही बसन्त तथा होली का आनंद है। जहाँ प्रतिक्षण युगल की नित्य नई-नई केलि-लीलाएँ होती रहती हैं...

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सुल्लभ तें अति सुलभ है

सुलभ से भी अति सुलभ और दुर्लभ से भी अति दुर्लभ—ऐसी हैं मेरी कुंज विहारिणी, श्री लाड़िलीजी (श्री राधा), जो मेरे जीवन का आधार हैं।

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कुंवरी लडैती लाडिली

हमारी कुँवरि प्राण-प्यारी श्री राधा महारानी अति सुकुमारी ऐसी लाड़िली हैं, जो महाप्रेम के सुख-सार स्वरूप अंग-संग केलि-रस को ही सदा सर्वदा प्रदान करती र...

shloka

एक राधा ब्रज में बसै

एक राधा ब्रज में ब्रजेश्वरी स्वरूप से विराजमान हैं, एक राधा रास-लीला में रासेश्वरी स्वरूप से विलास करती हैं, और तीसरी राधा नित्य निकुंज-विहारिणी स्वरू...