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रसिक संत जीवनी

श्री रसिक देव जी की जीवनी - वृंदावन के रसिक संत

जीवन चरित

ब्रज परंपरा के वैष्णव संत।

श्री श्री रसिक देव जी की जीवनी - वृंदावन के रसिक संत वाणी संग्रह

general

महल ते निकसी न बाहर आवैं

वृंदावन रस एवं निज महल श्री राधा की सखियां, निज महल से बाहर नहीं जाती, वह कुंज कुंज में ही श्री राधा कृष्ण के संग खेल मचाती रहती हैं। जहां नन्द के कुम...

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सखी री मन के स्याम सुखदाई

हे सखी, मन में जो श्री नित्यबिहारी बिहारिनी जु निरंतर विहार कर रहे हैं, वे ही श्याम सदाकाल सुखदाई हैं। प्रकट श्याम से हर क्षण कैसे मिल सकते हैं और उनक...

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श्रीबिहारीजू खेलत बसंत

श्रीबिहारी जी वसन्तका खेल-खेल रहे हैं। आनन्द से भरी सब सखियाँ भी वहाँ उपस्थित हैं और हैं श्री किशोरी जी जिनके प्रत्येक अंग में रूप खिला है। [1] इनके ...

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मन सीसी राधा अतर

मेरे मन-रूपी शीशी में श्री राधा-रूपी इत्र नख-शिख तक भरा हुआ है। उसे देखकर साँवरे श्री कृष्ण भँवरे के समान मोहित होकर उससे लिपटे रहते हैं।

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तिहारौ तौ परयौ है मान को सुभाव

प्रिया प्रियतम एक दूसरे को निहार रहे हैं। इतने में श्री राधा मान कर लेती हैं। ऐसा सूक्ष्म मान हुआ है कि कुछ समझ ही नहीं आ रहा, कटाक्ष में ही मान हो गय...

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पुरुष भाव छूटै नहीं, मन में बस रही जोई

सखी भाव एक दिव्य भाव है जिसका प्रादुर्भाव बिना निर्विकार हुए नहीं होता, जहाँ जीव लौकिक कर्मों एवं संबंधों से सर्वप्रथम अनासक्त हो जाता है, जहाँ वह न त...

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दूलह दुलहिन अधिक बनी

नित्य दूल्हा दुलहिन श्री राधा कृष्ण आज सम्पूर्ण श्रृंगार से सज्जित हैं। दोनों कल्पतरु वृक्ष की पूजा करने चले हैं, लेकिन आज यहाँ बात कुछ और है। [1] सख...

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रसिक निमिष नहिं बीछुरैं, ना दुरि बैठें और

हमारे रसिक बिहारी-बिहारिनी एक क्षण के लिए भी परस्पर से अलग नहीं होते और कहीं दूर भी नहीं बैठते। इस दिव्य विहार में मान केवल इतना-सा होता है कि नयनों ...

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खटकौ नहीं उसास को

श्री रसिक देव जी को न जीवन-मरण की चिंता है, न ही सांसारिक संबंधों का आकर्षण। उनके मन में तो गौर-साँवले श्री राधा-कृष्ण ही बसे हैं; चाहे लाख लोग आएँ या...

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रसिक रसीली बात सों

जब श्री राधा विहार-लीला में मान धारण करती हैं, तब रसिकवर श्री लाल जी उनकी ओर मुख कर, मधुर एवं रसीली बातों से उन्हें मनाने का प्रयास करते हैं और नयनों ...

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श्री हरिदास उपासना

स्वामी श्री हरिदास जी की अखंड नित्य-विहारमयी उपासना अत्यंत दुर्लभ है— लाखों में कोई एक ही उसे समझ और धारण कर पाता है। इस दिव्य रस-परंपरा को प्राप्त क...

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हिंडोरे झूलत तन सुकुमार

सुकुमार शिरोमणि नित्यविहारी श्री युगल आनदोल्लास के हिंडोले पर झूल रहे हैं। श्री प्रियाजी पुलकित हो होकर अपने प्राणाधार प्रियतम के हृदय से लग रही हैं। ...

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रसिक रीति अद्भुत कथी

श्री श्यामा कुंजबिहारी की दिव्य केली-रस में डूबे हुए रसिकों द्वारा अपनाई गई यह रस-रीति अत्यंत ही अद्भुत है। श्री रसिक देव जी कहते हैं कि श्री नरहरिदास...

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रसिक बिहारी सौं बनी

मेरी रसिक बिहारी से ऐसी बनी हुई है कि वे पल भर को भी मेरा साथ नहीं छोड़ते, जिसे देखकर मुझे आश्चर्य होता है कि ये वन में रास रचाने कब जाते होंगे।

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मंद हँसनि मुख कमल की

अपने मुख-कमल पर मंद-मंद मुस्कान एवं तिरछी चितवन से मेरी ओर निहार कर, श्री राधा ने मुझे अपने वश कर, मेरे प्राणों का हरण कर लिया।

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बनि दुकूल बैठे परजंक

दोनों प्रिया-प्रियतम (श्री राधा-कृष्ण) रेशमी वस्त्रों से सुशोभित होकर साथ बैठे हैं। कमल-से नेत्रों से एक-दूजे को निहारते हैं और प्यारीजू (श्री राधा) अ...

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होरी खेलनि स्याम हुलसि छबीली आई

श्री श्यामसुंदर के संग होली खेलने के लिए उल्लास से भरी हुई छबीली श्याम प्यारी (श्री राधा) आयी हैं। अपने नेत्रों में अबीर एवं गुलाल रूपी प्रेम रंग भरकर...

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प्यारी जू तैं मोहि मोल लियो

श्रीलालजी (कृष्ण) अपनी प्रियाजी (श्री राधा) से कहते हैं—हे प्यारी जू! आपने तो मुझे बिना मोल के अपना बना लिया है (मैं आपका बिना मोल का दास हो गया हूँ)।...

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निशि दिन रहे प्रेम में रागे

राधारानी की सखी हमेशा दिव्य प्रेम में उन्मत्त रहती है। उसका मन वृंदावन में श्री राधारानी के निज महल में युगल रस से बाहर नहीं जाता है।

general

स्याम हौं तुम्हरे गरैं परयौ

हे श्री बांके बिहारी जी महाराज मैं आपके गले अर्थात् आपकी शरण में ही आ गया हूँ, मैं तो समस्त साधन और साध्य को त्याग कर, केवल आपकी ही शरण में आया हूँ,और...

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एक अखंडित एकरस निरवधि रति जो होइ

जो अखंड, एकरस और अनंत होता है, जहाँ मिलन में भी व्याकुलता कम नहीं होती, अपितु निरंतर बढ़ती रहती है उसी को प्रेम कहा जाता है।

general

स्याम हौं तुम्हरे गरैं परयौ

हे श्री बांके बिहारी जी महाराज मैं आपके गरे ही पढ़ गया हूँ, मैं तो केवल आपकी ही शरण में आया हूँ, ओर मेरे जीवन के पल आपसे ही बीते हैं, अब आपके मन में जै...

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वृंदावन तजि तीरथ जांही

वृंदावन तजि तीरथ जांही, ते अज्ञान कछु समझत नाहिं। - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जू की वाणी जो वृंदावन को त्याग कर किसी और धाम जाता है, इससे बढ़कर...

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भजन पुंज अनत बसि करै, ब्रजवासी की सम नहीं जुरै

"भजन पुंज अनत बसि करै, ब्रजवासी की सम नहीं जुरै।" - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी यदि किसी और जगह पर पुंज भजन भी किया जाये, तब भी वह ब्...

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निशि दिन रहे प्रेम में रागे

राधारानी की सखी हमेशा दिव्य प्रेम में उन्मत्त रहती है। उसका मन वृंदावन में श्री राधारानी के निज महल में युगल रस से बाहर नहीं जाता है।