सन्तग्रन्थरागश्लोकस्तोत्रकविता
मुख्यपृष्ठसंतश्री सुंदर
सभी संत

जीवन चरित

ब्रज परंपरा के वैष्णव संत।

श्री श्री सुंदर वाणी संग्रह

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जाको प्रेम भयो मनमोहन सों

जिसको श्यामसुंदर से सच्चा प्रेम हो गया, उसके हृदय से स्वतः ही समस्त घर-बार एवं रिश्तेदारों की आसक्ति छूट जाती है। ऐसे जन निशिदिन भाव-विभोर अवस्था में ...

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सर्प डसे सु नहीं कछु तालुक

यदि साँप डस ले या बिच्छू डंक मार दे, तो भी समझो कि अभी भला ही हुआ है। यदि सिंह खा जाए या हाथी मार दे, तो भी कोई हानि नहीं है। [1] यदि आग में जलकर, पा...

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प्रीति की रीति कछू नहिं राखत

प्रेम का मार्ग सब बंधनों को तोड़ देता है—न जाति, न पंथ, न कुल की परछाई तक रह पाती है। [1] जहाँ नियम, रीति, और लोकाचार सब मिट जाते हैं; वहाँ केवल प्र...

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आठों याम यम नेम

भले ही आप आठों याम यम-नियम का पालन करते हों, आपके हृदय में प्रेम हो, और आठों याम योग, यज्ञ, तथा बहुत दान करते हों। [1] भले ही आप आठों याम जप-तप करते ...

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ग्रह तज्यौ अरु नेह तज्यौ पुनि

यद्यपि उसने अपने घर का त्याग कर, पारिवारिक जनों के स्नेह का नाता भी तोड़ लिया है और अपने शरीर को भी भस्म से भली-भाँति संवार लिया है। [1] वह वर्षा, सर...

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तात मिलै पुनि मात मिलै

किसी को सज्जन कुल, माता-पिता का स्नेह, भाई का साथ और रूपवती संगिनी का प्रेम मिलता है। [1] किसी को राज्य, हाथी, घोड़े, समस्त विलासिताएँ और मनवांछित भो...

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जो मन नारि की ओर निहारत

जिस मन की दृष्टि बार-बार स्त्री की ओर जाती है, वह धीरे-धीरे उसी रूप में ढलने लगता है। [1] जो मन क्रोध करता है, वह स्वयं भी क्रोध का ही स्वरूप बन जाता...

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प्रीतम मेरा एक तू ‘सुंदर’ और न कोइ

हे मेरे परम प्रिय प्रभु! आप ही एकमात्र मेरे प्रियतम हैं। आप किस कारण मुझसे छिपे हुए हैं? अब स्वयं को प्रकट कर मुझे दर्शन क्यों नहीं देते!

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कोउक अंग बिभूति लगावत

कोई शरीर पर भस्म लगाता है, कोई पूर्णत: नग्न होकर दिगंबर बन जाता है। [1] कोई सफेद वस्त्र धारण करता है, कोई वृक्षों की छाल से रंगे विविध वस्त्र पहनता ह...

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जलको सनेही मीन बिछुरत तजै प्रान

जैसे मछली पानी के बिना मर जाती है और सांप अपनी मणि से अलग होने पर जीवित नहीं रह सकता। [1] एक सीप और दूसरे चातक को स्वाति नक्षत्र से गिरने वाली वर्षा-...

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कोउक निन्दक कोउक बन्दत

कोई उनकी निंदा करता है, कोई श्रद्धा से वंदन करता है, तो कोई भिक्षा अर्पित करता है। [1] कोई उन्हें चंदन का लेप लगाता है, तो कोई उसी क्षण उनके मुख में...

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देव हू भये तै कहा

यदि कोई देवता बन जाए, या स्वर्ग के राजा इंद्र का पद प्राप्त कर ले, तो इसमें क्या विशेष है? क्योंकि यह तो मायिक एवं क्षणिक है। विधि के विधान के अनुसार,...

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होइ अनन्य भजै भगवंत हि

जब कोई साधक सारे सांसारिक और पारमार्थिक आश्रयों का पूर्णतः त्याग कर, अनन्य भाव से केवल भगवान का भजन करता है, तब वह सच्ची भक्ति का अधिकारी बनता है। [1]...

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न लाज तीन लोककी, न वेदको कह्यौ करै

रसिकों द्वारा वर्णित दिव्य प्रेम के मार्ग में साधक की आवश्यक मनोवृत्ति का वर्णन करते हुए श्री सुंदर जी कहते हैं: रसिक भक्त को न तो तीनों लोकों की लाज...