श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी
जीवन चरित
श्री श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी वाणी संग्रह
प्रिया पीतांबर मुरली जीती
श्री प्रिया [राधा] ने होड़ में लाल से पीताम्बर और मुरली को श्याम सुंदर से जीत लिया है। यद्यपि लाल को, हा-हा कर प्रिया चरणारविन्द में लुंठित होकर पड़ते...
जुगल किसोर मेरे कुंजबिहारी प्यारी
बसंत की छवि का वर्णन करते हुए सखी कहती है कि हमारे युगल बिहारी बिहारिनी वन विहार करते हुए नव नव रंगों को प्रकाशित कर रहे हैं। [1] द्रुम लताओं में विक...
नव निकुंज नव भूमि रगमगी
नवनवायमान छटा से सुशोभित निकुंजमहल एवं नव-नव शोभा की वृद्धि करती हुई श्रीवन-भूमि नव-नव प्रेम रंग से अभिभूत है। नव-नव सौन्दर्य-माधुरी से संयुक्त लाडिले...
नव निकुंज मंदिर में प्यारी
नव निकुंज मन्दिर में श्री प्रियाजी (राधा) अपने प्रियतम (कृष्ण) को वीणा वादन की शिक्षा दे रही हैं। [1] कल्याण राग की तान का सुन्दर बन्धान हो रहा है। व...
नव बन नव निकुंज नव बाला
नित नव-नव शोभा से सज्जित वृन्दावन है और नित नये-नये रस-विलास के लिये प्रस्तुत इसकी निकुञ्ज हैं। नित नव किशोर-मुलन प्रेम की उमङ्ग में पगी सुन्दरी श्याम...
बदी पिय आजु प्रिया सों होड़
आज प्रियतम (कृष्ण) प्रिया (राधा) के संग स्वर की गति में होड़ करते हुए अति उत्साह में भरकर नव-निकुंज के मध्य स्थित हैं, जहाँ वे सुरों के सूक्ष्म भेद-व...
हौं तेरे वारनें मंद गति चलि
अपनी प्राणसखी श्रीराधा से प्रेम-लीला की चातुर्यपूर्ण योजना करते हुए सहचरी (विठ्ठल विपुल) श्री राधा से मधुर वाणी में कहती है — हे सखी! मैं तो आप पर बलि...
जमुना तट स्याम घटनि की पाँति
पावस की छटा का वर्णन करती हुई श्रीविपुलबिहारिनदासीजी कह रही हैं कि श्रीयमुनाजी के तट पर स्याम रंग की घटाएँ सुशोभित हो रही हैं। चारों ओर श्री वृंदावन ...
स्यामा चलहु, लड़ैती प्रिया
श्रीविपुलबिहारिनदासीजी निज प्राण-लालसा को प्रकट करती हुई अपनी प्राण-सखी श्री राधा से निवेदन करने लगीं - हे श्यामा प्यारी ! निकुंज-भवन पधार कर केलि-रंग...
डोल झूलें स्यामा स्याम सहेली
हे सखी ! दिव्य दंपति श्री श्यामा श्याम डोल झूल रहे हैं। नव-निकुंज मन्दिर में नवरंगी प्रियतम के संग गर्वोन्मत्त गर्वीली प्रिया विहार कर रही हैं। [1] ...
प्रिया पाऊँ धारिये पिय पहियाँ
सखी श्री प्रियाजी से प्रार्थना करती है कि हे श्री प्रियाजी! आप श्री प्राणप्रियतम के पास पधारो। प्रियतम कुंज महल के द्वार पर बगीची में कदम की छाया में ...
नैंना प्रगट करत पिय प्रेमैं
श्रीविपुलबिहारिनदासीजी श्री राधा से कह रही हैं कि आपके नेत्रों में तो प्रियतम के प्रति प्रेम स्पष्ट झलक रहा है। क्यों झूठमूठ में उत्तर प्रति-उत्तर देक...
सजनी नव निकुञ्ज द्रुम फूले
वसंत ऋतु की अनुपम माधुरी का चित्रण करते हुए एक सखि अन्य से कहती है - हे सखि! इस वसंत में नव-नव विकसित मधुरता से युक्त वृक्ष और लताएँ पूर्णतः खिल उठी ह...
रसिक लाल के अंग संग
नव-नव आनंद की वृद्धि करती हुई नव-दुलहिनी प्रिया-रसिक प्रियतम के संग शय्या-मदिर में पौढ़ी हुई हैं। [1] अंग-प्रत्यंग सुरत-रंग में इस प्रकार गतिमान हो र...
बिलसत प्यारी-लाल कुंज रजनी
परस्पर में विट्ठल विपुल सखी श्री श्यामा-श्याम के नित्य-विहार का चित्रण कर रही हैं— कुंज की इस दिव्य रजनी (रात्रि) में प्रियतमा श्री राधा और प्रियतम श्...
मिलि खेलि मोहन सौं
श्रीविपुलविहारिनदासी जी अपनी प्राण-प्यारी सखी श्री राधा से कह रही हैं— हे प्यारीजू! आप अपने मनचाहे चाव और उमंग के साथ श्रीमोहनलाल (श्री कृष्ण) से मिलक...