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Biography & History

Vaishnava saint of the Braj tradition.

shri lalitamohini dev ju ki vani Collected Verses

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रूप के जाल परयौ मन मेरौ

श्री ललित मोहिनी जी कहती है कि मेरा मन श्री श्यामा कुंज बिहारी के सौंदर्य जाल में ऐसा फंस गया है कि निरंतर उन दोनों की मुस्कानों में उलझा रहता है जो य...

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प्रानप्रिया सखि आजु बनी

एक सखी दूसरी से कहती है - हे सखी ! आज मेरी प्राणप्यारी श्री किशोरी जी बहुत ही सुन्दर सजी हैं। उन्होंने नीलांवर ओढ़ रखा है। रति-काम केली क्रीड़ा (नित्य...

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यह आनंद कह्यौ ना परै री

श्रीललितमोहिनीजी कहती हैं कि हे सखी ! इस नित्य विहार रस का वर्णन नहीं किया जा सकता। रंगमहल की सेज पर ये दोनों प्रिया-प्रियतम अद्भुत खेल, खेल रहे हैं। ...

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जैसे मेरे जिय में तू बसत है

श्री कृष्ण श्री राधा से कहते हैं - हे प्यारी जैसे मेरे ह्रदय में आप बसी हैं, वैसे ही मैं आपके ह्रदय में बसा हूँ कि नहीं ? आपकी छवि तो अहर्निश मेरे नेत...

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प्रियालाल खेलत बसंतर

प्रियाप्रियतम फाग खेल रहे हैं। झाँझ, मृदंग, डफ, वंशी, वीणा और मुहचंग सुन्दर सुरीली तान में बज रहे हैं। [1] दोनों प्रियाप्रियतम मिलकर नृत्य की नई-नई व...

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आवनौ जावनौ कहूं नाहीं

हम श्रीवृन्दावन को त्यागकर अन्यत्र कहीं जाते-आते नहीं क्योंकि यहीं श्रीहरि हमारे मन के समस्त भावों का पोषण करते रहते हैं और हम श्रीहरि के भावों का (पो...

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रंग हिडोरना री झूलत लाडिली पिय के संग

प्यारीजी (श्री राधा) प्रियतम (श्री कृष्ण) के साथ रंग (रस-विलास) के हिंडोले पर झूल रही हैं। सुन्दर रंग के वस्त्र धारण किये हुए वे मंद-मंथर गति से झूमती...

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हौं हूँ आई देखन स्याम

मैं उन श्यामसुन्दर को देखने आई हूँ, जो साँवले सलौने हैं, जिनके नेत्र विशाल हैं और जिन्हें श्री किशोरीजी ने सब प्रकार से पूर्णकाम कर रखा है। [1] ये मो...

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रोम-रोमनि अरुझि विलसत कामिनी

दिव्य प्रेम रूपी कामनाओं से भरे दोनों (प्रिय-प्रियतम) इस प्रकार रस-विलास कर रहे हैं कि एक की रोमराजि दूसरे की रोमावली में उलझी हुई है। अँग-अँग में समा...

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पिय पियरी सेज बनाई आज

प्रियतम ने आज पीली सेज सजाई है। चारों ओर की चमक-दमक भी पीली ही पीली है। अपने अंगों को भी इन्होने पीले वस्त्रों से सजाया है। [1] इनका सम्पूर्ण शरीर (च...

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आजु बधाई वृंदावन सुख-सिंधु हिलोर

आज इस दिव्य वृन्दावन में बधाई है, जहाँ सुख का सागर निरंतर तरंगायित हो रहा है। प्रिया-लाल अपने तन और मन से उल्लासित हो रहे हैं, और कामदेव-रूपी मेघ गंभी...

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मत्त भये तन-मन न सँभार

दिव्य युगल (श्री राधा कृष्ण) नित्यविहार में ऐसे उन्मत्त हो रहे हैं कि उन्हें तन-मन की कोई सुध-बुध ही नहीं रहा है। दोनों ओर अपार आनंद उमड़ रहा है और दो...