shri prabodhannd sarasvati
Biography & History
shri prabodhannd sarasvati Collected Verses
अत्युत्कृष्टे सकलविधया श्रीलवृन्दावनेऽस्मिन्
सर्वभाव से अति उत्कृष्ट इस श्रीवृन्दावन में निज दुर्भाग्यवश दृष्ट-दोषों को जो लोग सत्य मान कर वर्णन करते हैं, अहो ! उन मूर्ख लोगों के मुख मैं प्राण सं...
वृन्दावन इह कति वा न
हे श्रीराधे! इस श्रीवृन्दावन में कितनी ही क्यों न चतुर गोपसुंदरी आकर रहे? किंतु मेरे नेत्र केवल तुम्हें ही देखेंगे। चन्द्रिका को छोड़ कर और कहीं चकोर ...
आनंदकन्देऽपि न विंदते
हे सुंदरी राधे! तुम्हारे मृदु मधुर मुस्कानयुक्त मुख को क्षणमात्र न देखने पर यह आनंद कंद श्रीवृन्दावन भी बिंदुमात्र सुख का अनुभव नहीं कर पाता, चंद्र के...
वृन्दारण्योत्तमं नास्ति
श्रीवृन्दावन से अधिक श्रेष्ठ (अधम-उद्धारक) और कोई नहीं है, एवं मेरे समान अधम और कोई नहीं है। ‘श्रीराधा श्रीराधा’ नाम रटने के प्रभाव से यदि इन दोनों का...
नाहन्ता-ममते वृथा कुरु सखे
हे सखे! देह, गृह, स्त्री आदि में वृथा ‘अहं’ ‘मम’ बुद्धि न कर, मोह मात्र ही उत्पन्न करने वाले इन पाशों (जंजीरों) को गुरुवाक्यों द्वारा तोड़। समस्त साम्...
भ्रातर्यर्हि निमीलिताऽसि नयने
हे भ्रातः! जब तुम दोनों नेत्र बन्द करोगे (मृत्यु को प्राप्त होवोगे) तब तुम्हारे स्त्री, पुत्र, भ्राता एवं विश्वासपात्र सुहृदगण कहाँ रहेंगे? तुम्हारे ग...
साधो शक्नोषि नो चेत् सकलमपि
हे साधो! यदि तू इन समस्त स्वप्रकल्पित वस्तुओं का सहसा त्याग नहीं कर सकता, तो श्री वृन्दावन के युगल-किशोर की उपासना करते हुए निरन्तर श्री वृन्दावन का ध...
महाभाग्यैः प्राप्तं वपुरिदमिहाकर्णि महिमा
महाभाग्य से यह (नरतन) देह पाया है, (महाभाग्य से) श्री वृन्दावन की अद्भुत महिमा भी सुनी है, समस्त संसार स्वप्न समान है- यह भी (महाभाग्य से) जान लिया है...
अलक्ष्याः श्रीलक्ष्म्या अपि
भगवती श्रीलक्ष्मी देवी सदा श्री भगवान की वक्ष स्थल-विलासिनी होते हुए भी जिन किन्हीं-किन्हीं मधुरतम रसों का आस्वादन नहीं कर सकती- अहो! जिनकी दासियां भी...
धन्यो लोके मुमुक्षुर्हरिभजनपरो
इस पृथ्वी पर जो मुमुक्षु हैं, वे धन्य हैं। जो हरि भजन परायण हैं, वे धन्य धन्य हैं। उन से उत्कृष्ट वे हैं जो श्री-कृष्ण के चरणकमलों मे परमासक्त हैं। उन...
यत् कारुण्यमगण्यमेव सुसुखं नास्त्येव यस्मात् परं
जिसकी करुणा अनन्त है, जिससे अधिक और सुख कहीं भी नहीं प्राप्त हो सकता, यह श्रीवृन्दावन जिनका असीम विचित्र शक्ति-युक्त क्रीड़ा-उद्यान है, उस श्रीराधा का...
हा हा! वृन्दावनं त्यक्त्वा
हाय! श्रीवृन्दावन त्यागकर जो और कार्यों में मेरा उत्साह होता है तो जानबूझ कर परमामृत को थुत्कार कर विष का ही भोजन करना चाहता हूँ।
वेणुं यत्र क्वणयति मुदा नीपमूलावलम्बी
शीतल श्रीयमुना के तीर पर कदंब वृक्ष के मूल का अवलम्बन लिये हुए सुन्दर पीताम्बरधारी श्यामवर्ण कामप्रकृतिविशिष्ट कोई एक दिव्य किशोर श्रीराधा मुखकमल दर्श...
शोच्यशोच्यातिशोच्योऽहं
महासोचनीय से भी अति महासोचनीय मैं हूँ। महामूर्ख से भी अति महामूर्ख बुद्धि मैं हूँ। क्योंकि जो शीघ्र ही सब कुछ त्याग कर श्रीवृन्दावन का आश्रय नहीं करत...
राधाकेलिमृगस्य कस्यचिदहो श्यामस्य यूनौ नव
अभीरी गोपीगण जिसकी करुणापूर्ण दृष्टि की प्रार्थना करती हैं, उसी श्रीराधाकेलिमृग किसी एक श्यामाङ्ग नवीन युवक को कामोन्मत्तता विधान करने वाली एवं समस्त ...
अस्तु में नरककोटि
मुझे कोटि नरक भोगने पडे, मनोरथों की प्राप्ति न हो, अथवा ईश्वर मुझ पर दया न करें, किन्तु श्रीराधा चरण कमलों में मेरी लालसा कभी कम न हो।
अलं कस्यापि संगत्या तवालं शास्त्रकर्मभि
तुम्हें किसी का संग करने की आवश्यकता नहीं एवं शास्त्रोक्त कर्मों का भी कोई प्रयोजन नहीं, क्योंकि जिन्होंने अपने को श्रीवृन्दावन के तृण समान समझ कर कृत...
भ्रातस्ते किमु निश्चयेन
अरे भाई ! तू क्या अपने मृत्यु काल को निश्चय रूप से जानता है- कि कब होगा ? बलवान मृत्यु की गति को रोकने का क्या तू कोई महामन्त्र जानता है? मृत्यु तुम्ह...
श्रीमद्ध वृन्दाटवी कुंजपुंजे नित्यविहारिणौ
श्रीवृन्दावन के निकुंजों में नित्य-विहार करने वाले गौरश्यामात्मक महाश्चर्यमय श्रीयुगलकिशोर ही मेरे जीवन हैं।
धनपुत्रकत्रादिममता मम तापदा
धनपुत्रकत्रादिममता मम तापदा। इति व्यक्त्वाखिलं वृन्दावनमेव च मे वरम्॥ - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (5.46) धन, पुत्र कलत्रादि के प्रति ...
शरीरं श्रीवृन्दावनभुवि सदा स्थापय
शरीर को सदा श्रीवृन्दावन भूमि में स्थिर रख, मनको श्रीवृन्दावन रसिकयुगल श्रीराधा-कृष्ण के निकट भजन में लगा, उनकी लीला गान में निरन्तर वाणी का प्रयोग कर...
वृन्दाटवी नहि कवीश्वरकाव्यकोटि
श्रेष्ठ कवि गण कोटि कोटि काव्य रचना के द्वारा भी श्रीवृन्दावन के गुण रत्न समूह की एकमात्र छटा का भी वर्णन नहीं कर सकते। हे मित्र ! निखिल इन्द्रियों की...
इह न सुखं न सुखमरे क्वापि वृथा न पत मोहजालेऽस्मिन्
इस संसार में सुख नहीं है। अरे ! कहीं भी सुख नहीं है ! वृथा इस मोह जाल में मत फंस। अनुदिन नित्य परमानन्दमय श्रीवृन्दावन का सम्यक् प्रकार से आश्रय ग्रहण...
न वेदाज्ञाभङ्गे कुरु भयमयेनापि वचनं
हे सखे ! वेदों की आज्ञा को भङ्ग करने में भय मत कर। मातापितादि गुरुजनों के वचनों को मत मान, लोकव्यवहार वा लोकापेक्षा में प्रवेश न कर, दीन चित्त कुटुंबि...
न कुरु न कुरु मिथ्या देहगेहाद्यपेक्षां
मिथ्या देह गेहादि की कभी अपेक्षा न कर, समस्त पुरुषार्थों को नाश करने वाली मृत्यु को सिर पर खड़ा जान, हे बंधो ! आज ही श्रीवृन्दावन के लिए वज्र से भी कठ...
किं नो भूपैः किं नु देवादिभिर्वा
एकान्तभाव से श्रीवृन्दावनाश्रयी हमारा राजाओं से क्या प्रयोजन ? देवताओं से क्या गरज? और स्वाप्न ऐश्वर्य तुल्य ऐश्वर्य के द्वारा उत्फुल्लित मुक्तगणों से...
राधानागरकेलिसागरनिमग्नालीदृशां यत् सुखं
श्रीराधानागर के केलिसमुद्र में निमग्न सखियों के नेत्रों को जो सुख होता है, श्रीभगवान् के सकल सुखोत्सव भी उस सुख के लवलेश तुल्य नहीं हैं। अनुपम सौभाग्य...
वरमिह वृन्दारण्ये सुवराकी मदनमोहनद्वारि
इस श्रीवृन्दावन में श्री राधा मदमोहन के दरवाजे पर तुच्छ कुक्करी (कुतिया) होकर भले ही रहूँगा, तथापि और जगह लक्ष्मी की प्यारी सखी अथवा स्वयं लक्ष्मी बनक...
त्यक्त्वा वृन्दावनमिदमहो चेद्बहिर्यासि
यदि इस वृन्दावन को त्याग कर तू अन्यत्र जाये, तो सचमुच तू कल्पवक्षों के श्रेष्ठ वन को छोड़ कर सिहोर के जंगल में जाता है। यदि वृन्दावन के रस की कथा को छ...
त्वयाकण्ठं पीतं यदि परमपीयूषमपि
यदि तुमन पेट भरकर अमृत भी पान कर लिया, तो उससे क्या? यदि उर्वशी के स्तनयुगल का तुमने आलिंगन कर लिया, तो क्या? और यदि ब्रह्मानन्द-अमृत का भी भली प्रकार...
भो भो धन्य शिरोमर्णे! भगवतः
हे धन्य शिरोमणि! यदि भगवत् चरण-कमलों के एकांतिक प्रेम के अति दुर्लभ परम रहस्य को सम्यक रूप से प्राप्त करने की तुझे इच्छा है, तो तू आद्य आस्वाद्य-रसात्...
यत्राभङ्गस्मरविलसितैः क्रीडतो दम्पती
जहां निरंतर कामविलास में क्रीड़ा परायण होकर प्रतिक्षण महाश्चर्यमय लाव्यण्य सौन्दर्य राशि का विस्तार करते हुए वही गौरश्यामाङ्ग युगलकिशोर गाढ़ आनन्द पूर...
वृन्दावनैकशरणस्त्यक्तश्रुतिलोकवर्त्मसंचरणः
अहो एक मैं श्रीवृन्दावन की ही शरण ग्रहण करके वेदमार्ग एवं लौकिक समस्त आचरण त्याग कर, कब भावपूर्वक श्रीहरि के चरणों की मानसी सेवा करके मैं व्याकुल होऊं...
निर्विद्य कृत्वाद्यखिलात् कदाहंच्छित्वा
समस्त कर्तव्यों से निर्वेद प्राप्त कर एवं जगत् की सकल अपेक्षाओं से रहित होकर मैं कब निःसङ्ग भाव से श्रीवृन्दावन में प्रवेश कर श्रीवृन्दावनेश्वरी एवं श...
राधादास्य लसद् वपुरनिशं
श्रीराधा दास्य-उपयोगी उज्ज्वल शरीर को पाकर नित्य श्रीराधा पादपद्म से सेवापरायण होकर श्रीराधा रसिक श्री श्यामसुन्दर को संतोषित करते हुए नित्य श्रीवृन्द...
महारङ्कत्वे वा परमविभवे
महा दारिद्र्य में अथवा परम विभुत्व में, महान सुख में अथवा विषम दुःख में, बहुत यश में अथवा अपयश में, मणि में अथवा मिट्टी के ढ़ेले में, परम बन्धु में अथव...
अनन्तैश्चिज्ज्योत्स्ना-रसजलधिपूरस्तत इतो
अननत चित् ज्योत्स्नामय रससमुद्र का प्रवाह इधर-उधर फैलकर गोलोक से अखिल (विश्व को) संप्लावित कर रहा है। यह श्रीवृन्दावन सबके ऊपर विराजमान होकर अति विमल ...
रुददपि पितृमातृ-बन्धुपुत्रादिकमपहाय
रोते हुए पिता, माता, बन्धु तथा पुत्रादिकों को भी त्याग कर, (तुम्हारे वृन्दावन जाने में यदि वे स्नेहवश रोते हैं) पूजनीय व्यक्तियों के वाक्यों को सुन ही...
पापात्मा पुण्यवान् वा प्रसरदपयशाः
पापी या पुण्यात्मा, प्रसिद्ध अपकीर्त्ति या कीर्त्तिमान, महादरिद्र या महासम्राट, विषम जड़मति या सर्वविद्या-विशारद- तुम जो कुछ भी क्यों नहीं हो, हे सखे!...
निर्विद्य कृत्वाद्यखिलात् कदाहंच्छित्वा
समस्त कर्तव्यों से निर्वेद प्राप्त कर एवं जगत् की सकल अपेक्षाओं से रहित होकर मैं कब निःसङ्ग भाव से श्रीवृन्दावन में प्रवेश कर श्रीवृन्दावनेश्वरी एवं श...
अस्तु में नरककोटि
मुझे कोटि नरक भोगने पडे, मनोरथों की प्राप्ति न हो, अथवा ईश्वर मुझ पर दया न करें, किन्तु श्रीराधा चरण कमलों में मेरी लालसा कभी कम न हो।
भो भो धन्य शिरोमर्णे! भगवतः
हे धन्य शिरोमणि! यदि भगवत् चरण-कमलों के एकांतिक प्रेम के अति दुर्लभ परम रहस्य को सम्यक रूप से प्राप्त करने की तुझे इच्छा है, तो तू आद्य आस्वाद्य-रसात्...
यत्राभङ्गस्मरविलसितैः क्रीडतो दम्पती
जहां निरंतर कामविलास में क्रीड़ा परायण होकर प्रतिक्षण महाश्चर्यमय लाव्यण्य सौन्दर्य राशि का विस्तार करते हुए वही गौरश्यामाङ्ग युगलकिशोर गाढ़ आनन्द पूर...
वृन्दावनैकशरणस्त्यक्तश्रुतिलोकवर्त्मसंचरणः
अहो एक मैं श्रीवृन्दावन की ही शरण ग्रहण करके वेदमार्ग एवं लौकिक समस्त आचरण त्याग कर, कब भावपूर्वक श्रीहरि के चरणों की मानसी सेवा करके मैं व्याकुल होऊं...