shrigovarddhan bhatta
Biography & History
shrigovarddhan bhatta Collected Verses
श्रीकुण्डे संततं यो निवसति
श्रीराधाकुंड में जो पुरुष निरन्तर वास करता हैं, देवता- पितृ तथा मुनिवरों का समूह उसका कुछ भी कर सकने में समर्थ नहीं होते हैं। ब्रजराजनन्दन श्रीकृष्ण भ...
श्रीवृन्दाविपिनेश्वरीं स्वमनसि
जिसके कुंज में बैठकर श्रीव्रजराजनंदन श्रीकृष्ण अपने मन में वृन्दावनेश्वरी श्रीराधारानी का स्मरण कर रोमांचित होकर “राधा”- इन दो अक्षरों का जाप करते हैं...
वृन्दारण्येशभक्तिः कमलभवशिवेन्द्रा
वृन्दावनेश्वर श्री कृष्ण की भक्ति का मार्ग लक्ष्मी, ब्रह्मा, शिव, इंद्र आदि देव वृन्द ढूंढते हैं लेकिन प्राप्त नहीं कर पाते। परन्तु राधाकुण्ड में वा...
राधा दास्य रसाभिलाषसहितं
हे मानवगण ! यदि श्री राधा दास्य रस में अभिषिक्त होने के लिये मन में इच्छा है तो श्रीवृषभानु नन्दिनी की सरसी में क्यों नहीं वास करते हो। यदि राधाकुंड म...
यन्नामश्रवणान्तरे निपतितं
जिसका नाम कानों के भीतर प्रवेश करते ही बड़े-से-बड़े पतित के भी चित्त के समस्त मलों का नाश कर देता है तथा प्रेम के साथ शरण लेनेवाले जीवों को संसार से उद्...
श्रीकुण्डाश्रयवन्तमन्तरल
जो अत्यन्त आदर से हृदय में प्रेमोल्लास के साथ श्री राधाकुंड का आश्रय करता है वह परम भाग्यवान् है। ब्रह्मादी लोकपाल देवतागण भी निज अभिमान को छोड़ कर उ...
किं धर्मेण ममास्ति
मेरे धर्म साधन में क्या रखा है। नित्यकृत्य भी अति तुच्छ है। योगादि साधना तथा सद्गुणों से मेरा क्या होगा? ब्रह्म सुख को भी मेरा हृदय नहीं चाहता है। अधि...
किं कृष्णस्यैव रूपं त्रिभुवनमनसो
अहो! श्रीराधाकुण्ड का कैसा अद्भुत स्वरूप है! क्या यह त्रिभुवन-मनोहर श्रीकृष्ण का ही रूप है जो कुण्ड के रूप में विराजमान है? या फिर यह यूथेश्वरी श्रीरा...
श्रीवृन्दाविपिनेश्वरी हृदिगतं प्रेमैव
यह मेरा दृढ़ विश्वास है कि मानो वृन्दावनेश्वरि, श्री राधा महारानी के हृदय में स्थित प्रेम ही इस कुंड (श्री राधाकुंड) के रूप में बाह्य रूप से प्रकट हुआ...