shrimahakavi bihari lala
Biography & History
shrimahakavi bihari lala Collected Verses
सघन कुंज छाया सुखद
जहाँ की कुंजें घनी हैं, छाया सुख देने वाली है और पवन शीतल व सुगंधित है—उस वृन्दावन में यमुना के तट पर जाते ही आज भी मन उसी प्रकार श्री राधा-कृष्ण के प...
नाचि अचानक हीं उठे
बिना वर्षा-ऋतु के ही ब्रज के वन में मोर अचानक नाच उठे। जान पड़ता है कि इस दिशा को नन्द के लाड़ले (घनश्याम) ने आनन्दित किया है।
तजि तीरथ हरि-राधिका
अन्य समस्त तीर्थों का त्याग कर केवल श्री राधा-कृष्ण की दिव्य अंग-कान्ति से ही अनन्य अनुराग करो। जिस ब्रज के निकुञ्ज-मार्गों में प्रिया-प्रीतम नित्य क्...
या अनुरागी चित्त की
या अनुरागी चित्त की, गति नहिं जाने कोय। ज्यौं ज्यौं बूढ़ै श्याम रंग, त्यौं त्यौं उज्ज्वल होय॥ - श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई जिस हृदय में श्य...
नित प्रति एकत ही रहत
दोनों सदा एक साथ ही रहते हैं। (क्यों न हों?) दोनों की अवस्था, रूप-रंग और मन भी तो एक-से हैं। इस युगलमूर्ति (राधा-कृष्ण) का दर्शन करने के लिए तो आँखों...
कोऊ कोरिक संग्रहौ
कोई हजारों, लाखों या करोड़ों की सम्पत्ति संग्रह करे; किन्तु मेरी सम्पत्ति तो सदा वही ‘विपत्तियों का नाश करने वाले’ यदुनाथ [श्रीकृष्ण] हैं।
अपनैं-अपनैं मत लगे
अपने-अपने मत के लिए व्यर्थ ही लोग हल्ला मचा रहे हैं। अंततः सभी को उस एक भगवान श्रीकृष्ण की ही उपासना करनी है, चाहे वे उन्हें किसी भी नाम से पुकारें।
निज करनी सकुचें हिं
हे गोपाल, मैं तो अपनी ही करनी से लजा गया हूँ, फिर तुम अपनी इस चाल से मुझे क्यों लजवा रहे हो कि मुझ-जैसे अत्यन्त विमुख के तुम सम्मुख रहते हो-(मैं तुम्ह...
मोर-चन्द्रिका स्याम-सिर
अरी मोर-चंद्रिका! श्री कृष्ण के सिर पर चढ़कर क्यों इतरा रही है? सुना है, श्री राधा मान करके बैठी हैं। अतैव शीघ्र ही तुझे उनके पाँवों पर लोटते हुए देखू...
किती न गोकुल कुल-बधू
गोकुल में न जाने कितनी कुलवधुएँ हैं, और ऐसी कोई नहीं जिसे किसी ने शिक्षा न दी हो; परन्तु कुलवधू होकर और उपदेश सुनकर भी ऐसी कोई न बची, जो श्रीकृष्ण की ...
गिरि तैं ऊँचे रसिक
पर्वत से भी ऊँचे रसिकों के मन जहाँ हजारों बार डूब चुके हैं, वही प्रेम का समुद्र संसारी और पशुवत बुद्धि वाले लोगों के लिए सदा उथला ही रहता है—इतना उथल...