Verses & Passages
77 itemsवृन्दावन चाहे दास दास ह्वै किसोरी जू कौ
मैं केवल श्री किशोरीजी (राधा) का दास हूँ, मैं वृंदावन के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहता, और मैं अपने चित्त को वृंदावन और किशोरीजी से दूर कभी नहीं डुलाऊँगा। ...
केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं
श्री लाल बलबीर श्री राधारानी से कहते हैं, "यदि आप मुझे मयूर ही बनाना चाहें तो श्री वृंदावन धाम का ही बनाइए, जिससे मैं कूक कर और नाच कर आपका यश ही आपको...
एरे मन मेरे तो सों विनती करत ह्वौं रे
अरे मेरे मन, तुझसे विनती करता हूँ, काहे को तू ब्रज भूमि को छोड़कर बाहर अपने कदम रखता है। [1] यह ऐसी अद्भुत भूमि है, जिसकी लताओं और वृक्षों से भी "र...
तजो गेह सुख देह के
गृह सुख एवं जगत के फंदों को त्याग कर युगल चरणों से प्रीति कर श्री वृंदावन चंद में वास करना चाहिए
श्रीराधा राधा रटौं
नित्य ही ‘राधा-राधा’ का जप करो और राधा का ही ध्यान करो। श्री लाल बलबीर कहते हैं कि मेरे हृदय में राधा-नाम तथा राधा-नाम की दिव्यता, प्रधानता और भव्यता...
मानुस जनम पायौ बास
यदि किसी ने इस बहुमूल्य मानव देह को प्राप्त किया है, तो उसे श्री वनराज (वृंदावन) में वास करना चाहिए। वह किस प्रकार का चतुर व्यक्ति है, यदि वह सभी संत...
खेलत हँसत वनराज मैं
जहाँ वृंदावन में श्री प्रिया-प्रियतम नित्य विहार करते हैं, वहाँ अनेक प्रकार के खग मंडली खेलते-हँसते हुए इस वनराज की शोभा बढ़ाते हैं। [1] कभी वे नृत...
बनो दाव तेरो बैन मान ले तू मेरौ
अरे मन, मेरी बात मान ले, तेरा बहुत उत्तम बनाव बन चुका है। अब तू केवल रसिकों से ही नेह कर, उसी के परिणाम स्वरूप ही तुझे अनंत सुख मिलेगा। [1] अपने अंग...
श्री वृषभान कुमारी छबि
ऐसा कौन है जो श्री राधा की छवि का पूर्ण वर्णन कर सके? जिनके चरण-नख के एक कोर की छटा ही अनन्त कोटि चन्द्रमाओं के प्रकाश को भी हेय कर देती है।
अमल अमोल है अनूपम हैं रेनु याकी
श्री लाल बलबीर कह रहे हैं कि श्री वृन्दावन की रेणु अमल, अमूल्य तथा अनुपम है, सिद्धि, कामना तथा आनंद प्रदान करने वाली है। [1] श्री वृन्दावन की रेणु क...
श्री राधे नंदलाल की
श्री राधा-नन्दलाल की चरण-धूलि [अर्थात् वृन्दावन निज-महल की रज] को अपने सिर पर धारण करने से समस्त कार्य सिद्ध होते हैं और सभी पापों का नाश हो जाता है।
जमुना अन्हात वृषभान की
जब रूप की अगाधा, श्री वृषभानु कुमारी, साक्षात नित्य बिहारीनी श्री राधा यमुना के तट पर स्नान करने के लिए सुशोभित होती हैं, तब वृंदावन में उनके दिव्य अं...
दीजै मौकों श्रीवृन्दावन बास
हे कुंवर किशोरी, गोरी, करुनानिधि भोरी सरकार, कृपया मुझे वृंदावन का वास दीजिए। [1] ऐसी करुणा कीजिए जिससे युगल वर [राधा कृष्ण] सैन [संकेतों] एवं बैन [...
जाकौं नेत नेत कहि
जिस अद्वितीय रस को वेद भी "नेति-नेति" कहकर बखान करने में असमर्थ रहे हैं, जिसे स्वयं ब्रह्मा, शंकर आदि ईश्वर भी अपने ध्यान में नहीं ला सकते, जो अत्यंत...
बड़े बड़े मुनी ज्ञानी वास हेत ललचानी मती
बड़े-बड़े मुनि और ज्ञानी भी वृंदावन में वास करने के लिए लालायित रहते हैं। यह वही धाम है, जिसे वेदों ने "नेति-नेति" कहकर गाया है, अर्थात जिसकी महिमा का...
जानें को जतन सों बनौ यहै दाव तेरौ
हे मन, न जाने कौन से तेरे पुराने यत्न से तेरा यह बनाव बन गया है कि तुझे वृंदावन वास मिल गया है। अब इस वृंदावन के रस को छोड़कर कहीं एक पग भी बाहर न ले ...
आयौ कर संतन की संगत
बार बार रसिक संतों की संगति में आया कर, एवं सदा उनके चरण कमलों में शीश को झुकाया कर। [1] प्यारे! श्री यमुना [सूर्य पुत्री] के शीतल जल में जाकर नहाय...
लोक चतुर्दस मुकटमणि
चौदहों लोकों में मुकुट-मणि तथा नित्य ही समस्त प्रकार से अनन्त सुख प्रदान करने वाला श्रीधाम वृन्दावन-चन्द्र, श्री वृषभानु-नन्दिनी श्री राधिका का है।
हृदै सरोवर प्रेमजल
हे प्रिये श्री राधे! मेरा यह हृदय एक सरोवर (तालाब) के समान है जो आपके प्रेम रूपी जल से परिपूर्ण है, और आपके चरण-कमल उस सरोवर में खिले हुए श्रेष्ठ अरवि...
जै जै श्री रासेश्वरी, बिनै सुनौ चित लाय
रास की अधिष्ठात्री श्री रासेश्वरी (श्री राधा) की बारंबार जय हो! हे स्वामिनी! आप चित्त लगाकर मेरी इस लघु विनय को सुनिए। मैं आपकी उस अनुपम छवि का किंचित...
परौ आय द्वार सुनि सुजस अपार चारु
हे श्री राधे, आपका अपार सुंदर यश सुनकर ही मैं आपके द्वार आकर पड़ी हुई हूँ, ऐसा कब होगा कि अब आप मुझे अपनी कृपा की दृष्टि से निहारोगी ? [1] ऐसा कब होग...
करत इन्हीं कौ ध्यान ईस सनकादिक से
सनकादि जैसे ईश्वर-कोटि के भक्त भी जिन श्री चरणों का ध्यान करते हैं, और जिनका यशोगान संतगण नित्य ही झांझ लेकर करते हैं। [1] वे श्री चरण, जिनकी शरण ग्...
कासी औ प्रयाग द्वारावती कौं निहार आये
यदि ब्रज में आने का बनाव बन गया और ब्रज को निहार ही लिया, फिर काशी, प्रयाग और द्वारका आदि को निहारने का क्या प्रयोजन? [1] यदि यमुना में नहाने का अवस...
श्रीराधे नंदलाल की चरण रेणु सिरधार
युगल सरकार श्री राधा-कृष्ण की चरण-रज, अर्थात् वृन्दावन-रज, को यदि कोई प्रेमपूर्वक अपने मस्तक पर धारण करे, तो उसके मन की समस्त अभिलाषाएँ सिद्ध होती हैं...
यह छबि टरत न उर तें टारी
यह छवि मेरे हृदय से नहीं निकल सकती, [जिस छवि में] वृषभानु कुंवरी श्री राधिका अपने प्रियतम श्री श्याम सुंदर संग वृंदावन के नवल कुंजों में विराज रहे हैं...
श्रीबनराज निकुंज में
श्री वृन्दावन के निकुंजों में पिय-प्यारी को सुख प्रदान करने के लिए ही छहों ऋतुएँ सहचरी रूप धारण करके दिन-रात उनकी सेवा में उपस्थित रहती हैं।
श्रीराधा मोरी एक अरज चित लावौ
हे श्री राधा, आपको सब सर्वज्ञ कहते हैं, सुजान शिरोमणि कहते हैं, करुणासिंधु कहते हैं, कृपया मेरी एक विनती को अपने चित्त में धारण कीजिये। [1] श्री लाल ...
श्रीवृन्दावन चन्द छवि
श्री वृन्दावनचन्द्र की छवि का वर्णन करना असम्भव है; उसकी समता किससे दी जाए? साक्षात् वाणी भी उसके सामने शीश झुका देती है, अर्थात् स्वयं को असमर्थ पाती...
इनहीं कौ ध्यान नित करें सनकादिक से
सनकादिक आदि समस्त ऋषि गण इन्हीं (श्री राधा) का ध्यान करते हैं एवं श्री शेष जी सदा ही इनके यश को गाते रहते हैं। [1] भगवन शिव, एवं नारद आदि ऋषि भी इनके...
जे मन मोहन लाड़ले
जो मोहन-लाड़ले श्रीकृष्ण सुर और मुनियों के समूह के मन को मोह लेने वाले हैं, वे ही श्री वृन्दावन-चन्द्र की छवि को देखकर नित्य मोहित रहते हैं।
मानक महल में बिराजैं राज राजेस्वरी
माणिक्य के दिव्य महल में परम राजराजेश्वरी श्री राधा महारानी विराजमान हैं, जिनकी महिमा के समक्ष चौदहों लोकों की उपमाएँ भी संकुचित होकर लज्जित प्रतीत हो...
किसोरी राधे विनती करों करजोर
हे किशोरीजी (श्री राधे), अब मैं आपसे हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि हे दयानिधि! मुझपर ऐसी कृपा कीजिए जिससे मेरा मन आपके श्री चरणों में ही नित्य लगा रहे।...
सिव विधि उद्धव से करैं ये बलबीरहि आस
भगवान शिव, ब्रह्मा जी और उद्धव जैसे परम ज्ञानी एवं भक्त भी जिस वास की निरंतर अभिलाषा करते हैं, वही आशा श्री लाल बलबीर के हृदय में भी है। वे आर्त भाव स...
परम दयाल दूजी आपसी न दीसै और
हे श्री राधा, आप परम दयालु हैं और आपके जैसा मुझे कोई और दिखाई नहीं देता। हे सिरमौर, मैं आपके चरण कमलों में बारम्बार प्रणाम करता हूँ। [1] हे लाड़ली, आ...
चारों दिसि सोभित सदाँ, जाके संत समाज
जिसके चारों ओर संत-समाज का पावन निवास सदा शोभायमान रहता है, ऐसे श्री गिरिराज महाराज समस्त देवताओं में मुकुट-मणि हैं।
बैठी कुंज माँहि महारानी ब्रजराज जू की
कुंज महल के भीतर ब्रज की महारानी श्री राधिका बैठीं हैं जिनके अंगों की सुगंध से भँवर मतवाले से हो रहे हैं। [1] श्री राधा की दासी उन्मत्त होकर सुख की र...
कीजिय ये दृढ़ चित्त में, तज दारा सुत वित्त
मन में दृढ़ता भरकर, पत्नी, बच्चों एवं धन-संपत्ति के मोह का त्याग कर श्री वृन्दावन धाम में नित्य वास करना चाहिए।
मेरे तौ कुल पुज्ज तू, श्री वृषभान कुमारि
हे किशोरीजी! मेरे कुल की पूज्यदेवी (कुलदेवी) तो आप ही हैं। समस्त जगत के दुखों का हरण करने वाली हे राधिका! अब मैं आपके द्वार आया हूँ।
स्वामिनी जू भामिनी जू हंस कल गामिनी जू
मेरी स्वामिनी श्री राधा जू भामिनि हैं जिनकी गति हंस के समान है, जिनके बदन की कांति कोटि कोटि दामिनी की द्युति के समान है जो प्रियतम श्री कृष्ण के चित्...
श्यामा जू की सहचरी
हे श्री ललिता जू, आप श्री श्यामा जू की सहचरी हैं, मैं आपके चरण कमलों की वंदना करता हूँ। श्री राधा की प्रेमपूर्वक चरण सेवा करने के मेरे मन की कामना को ...
चाहे कीर कोकिला कपोत कर सारस हू
हे श्री राधे! यदि आप चाहें तो मुझे तोता, कोकिल, कबूतर, एवं हंस बना दीजिए, अथवा आपके मुख चन्द्र को इकटक निहारने वाली चकोरी बना दीजिए। [1] चाहे लता, द्...
काके द्वारा जाऊँ काकूँ बिनती सुनाऊँ वृथां
मैं किसके द्वार जाऊँ और किससे व्यर्थ में विनती करूँ? आपके द्वार को छोड़कर मैं अन्यत्र क्यों भटकूँ और अपना जन्म क्यों नष्ट करूँ? जगत में उपहास क्यों कर...
वह रस सिंधु अगाध है, मो मति अति लघु मीन
श्री प्रिया प्रियतम के महल का रस अगाध सिंधु के समान है, और मेरी बुद्धि उस समुद्र की एक छोटी मछली के समान है। जो मैंने अनन्य रसिकों के मुख से सुना है, ...
अब तौ बदनाम भई आली ब्रज मण्डल में
हे सखी, अब तो मैं ब्रज मंडल में बदनाम हो चुकी हूँ। गुरुजनों की लज्जा आदि खो चुकी हूँ, अब चाहे वे मुझसे नाराज़ ही क्यों न हों, मुझे कोई परवाह नहीं। [1]...
कोऊ कहै मोहि सदां बल है भवानी जू कौ
कोई कहता है कि मुझे सदा माता भवानी का बल प्राप्त है, जिनके मुख से अनुपम और शुद्ध वाणी प्रकट होती रहती है। [1] कोई कहता है कि मुझे सदा माता काली का ...
रसिक विहारी सुकमारी प्रान प्यारी जू कों
रसिक बिहारी श्यामसुन्दर की प्राणप्यारी श्री राधा वृंदावन की सजीली छवि का दर्शन करवा रही हैं। [1] कैसे वृक्ष और लताएँ, रंग-बिरंगे फूलों और फलों से सजी...
कीरति कें कन्या भई
महारानी कीरति को एक दिव्य कन्या का जन्म हुआ है, जिनके दर्शन के लिए व्रज के समस्त गोप-गोपीजन उमड़े हुए हैं। सभी हर्ष में नाच रहे हैं, कूद रहे हैं, मंगल...
यमुना की कूल पै रही हैं द्रुमबेली झूल
श्री धाम वृंदावन में यमुना किनारे वृक्ष एवं लताएँ झूल रही हैं। फूलों से रस टपक रहा है जिसकी सुंदरता देखते ही बनती है। [1] कोयल, मैना, तोते आदि पक्षी ...
फूले हैं पलास आस पास बन बागन में
चारों ओर पलाश के फूल खिल उठे हैं, जिनकी मनोहर छटा ने वनों और उपवनों को रंगों से भर दिया है। कोयल अपनी मधुर वाणी में कूकने लगी है, मानो प्रेम का संदेश ...
जाके पद नेति नेति बंदत सुरेस सेस
जिनके चरणों की स्तुति इन्द्र और शेष भी “नेति-नेति” कहकर करते हैं, वे परमब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण तुम्हारे चरणों में सिर नवाकर, हाथ जोड़कर खड़े हैं। [1] ...
जय जय श्रीराधारमन जय जय श्रीसुखरास
सुख की राशि, श्री राधारमण लाल जी की जय हो! रसिकों के प्राण, जीवन धन की जय हो! हे राधारमण लाल, कृपा कर मेरे हृदय में भी सदा निवास करें।
जब सों निहारौ रूप
जब से नंदनंदन श्री कृष्ण की मनोहर छवि को निहारा है, तब से मेरे लोक-लाज एवं कुल की मर्यादा स्वतः ही मुझे छूट गया है। [1] अब मेरे हृदय में श्रीकृष्ण ...
प्यारी जू तिहारे पद पंकज की बलिहारी
हे श्री राधाजू! मैं आपके चरण कमलों पर बार बार बलिहारी जाती हूँ। श्रीकृष्ण सदा आपके चरणों के ही चिंतन में रमे रहते हैं, उनके हृदय से आपके श्री चरण एक क...
मेरे श्रीराधारमन अति सरूप सुकमार
मेरे श्री राधारमण अत्यंत सुंदर और सुकुमार अवस्था वाले हैं। उनके सौंदर्य की छवि ऐसी अनुपम है कि उस पर मैं कोटि-कोटि कामदेव और रति को भी बार-बार न्यौछाव...
आये फाग खेलन गोपाल बरसाने में
श्री गोपाल बरसाने में फाग (होली) खेलने के लिए पधारे हैं। चारों ओर लोग फागुन के गीत गा रहे हैं, हाथ से ताल दे रहे हैं, और सबका हृदय आनंद से झूम रहा है।...
श्रीराधा राधा रटौं , राधा ही कौ ध्यान
नित्य ही श्री राधा राधा ही रटो और राधा ही का ध्यान करो। श्री लाल बलबीर कहते हैं कि मेरे हृदय में राधा नाम और राधा नाम की दिव्यता, प्रधानता और भव्यता न...
वृन्दावनवारी प्यारी अरज हमारी ये ही
हे वृंदावन वारी प्यारी, हे दया की निधान श्री राधे, हमारी इतनी सी विनती आप सुनिए। [1] हे प्रतिपाल, हमें संसार के मिथ्या जग जाल से मुक्त कर अपनी कुंज ...
छबीली रंगीली रस आगरी किसोरी गोरी
हे छबीली, रंगीली और रस की आगरी, श्री राधे, मेरी मति (बुद्धि) को ऐसा बना दीजिये कि यह आपकी इच्छा में ही इच्छा रखे। [1] हे नागरी, उजागरी और रूप की आग...
श्रीवन निकुंजन में प्रीतम के संग प्यारी
हे प्यारी जू [श्री राधा]! कब आप मुझ दीन पर कृपा करके श्री वृंदावन के निकुंजों में, प्रियतम के संग अपना दर्शन दिखलाओगी। [1] कब मैं सुंदर फूलों की माला...
चंपक बरन मृगलोचनी सलोनी राधे
हे चंपक वरनी, मृगलोचनी, और सलोनी श्री राधे, मुझे केवल और केवल आपकी ही आशा है, मेरी इष्ट तो केवल आप ही हैं। [1] मेरे भय को मिटा दीजिए, मेरी कुमति का ...
चाहत हैं जाकी रज संभु
जिस वृंदावन धाम की रज को साक्षात शिव जी, चतुरानन इत्यादि भी चाहते हैं एवं बड़े ही उत्साह से वृंदावन का गुणगान कर वृंदावन वास की कामना रखते हैं। [1] ...
छाँड़ जग जालन के
जगत के जंजाल को छोड़कर श्री राधारानी के चरण कमलों की शरण ग्रहण करो, जहाँ कोई भी भय नहीं रहता। [1] यह जान लो कि पति, पत्नी, माता, पिता, कुटुंबीजन और अ...
मोहन की प्यारी वृषभान की दुलारी साधु
मनमोहन श्री कृष्ण की प्यारी, वृषभानु की दुलारी, श्री राधा, साधु-संतों की रक्षा करने वाली हैं और भव-बाधा को मिटाने वाली हैं। [1] श्री राधा प्रेम रूपी ...
आवैं दौर दौर दारा द्वार महारानी जू के
श्री राधा महारानी जू के द्वार राजा एवं धनी जन भाग भाग कर आते हैं। विमला सी स्त्रियाँ जिनके रूप को निहार कर अपने प्राणों को उनपर न्यौछवार करती हैं। [1]...
स्यामा सुकुमारी प्राणप्यारी श्रीविहारीजी की
श्रीराधा परम सुकुमारी हैं, श्रीविहारी (कृष्ण) की प्राणों से भी अधिक प्यारी हैं। वे परम सुंदर, सब की शिरोमणि स्वामिनी हैं। [1] वे वृन्दावन में नित्य व...
मुनिन के वृंदन के वृंद
समस्त मुनिगण आपके चरणों की वंदना करते हैं। आप आनंद कंद, ब्रजराज श्री कृष्ण की चिरसंगिनी हैं। [1] आप तीनों लोकों का शोक दूर करने वाली हैं, आप प्रसन्नच...
जोग जग्य जप तप तीरथ गवन व्रत
न मैंने योग-साधना की, न यज्ञ किए, न जप, न तपस्या, और न ही तीर्थों की यात्रा की। यहाँ तक कि मैंने भगवान श्री हरि की कथाएँ भी नहीं सुनीं। [1] मैं मोह...
श्री वृषभानु सुता पद पंकज
वृषभानु नन्दिनी श्री राधा जू के चरण-कमल ही सदा मेरे प्राण-धन हैं। [1] मेरे मन में नित्य केवल श्रीराधा के नाम का ही ध्यान रहता है, जिससे संसार के सभी ...
भूमिलोक सुरलोक सब
श्री राधा की रूप-अंग माधुरी के सामने भू-लोक, सुर-लोक और पाताल-लोक का समस्त सौन्दर्य तुच्छ प्रतीत होता है।
दियौ किसोरी लाड़िली
हे किशोरी श्री राधा! मुझे अपने दिव्य धाम श्रीवृन्दावन में निवास प्रदान कीजिए और मुझे अपना दास मानकर कृपापूर्वक स्वीकार कीजिए।
अति मलीन मति हीन
हे श्यामा! मैं अति मलीन और मति-हीन हूँ, परंतु जैसा भी हूँ, आपकी ही शरण में आया हूँ। आप परम प्रवीण हैं, कृपा करके मुझे अपने निकुंज में बसाइए।
दीन दुख हरनी तू वेदन में वरनी तू
जो दीन दुखियों का दुख हरण करने वाली हैं, वेदों द्वारा वर्णित हैं, आनंद को प्रदान करने वाली हैं, एवं यमराज की फाँसी को काटने वाली हैं। [1] जो अपने दास...
श्री राधा राधा रटौ, त्याग जगत की आस
हे मन, इस भौतिक संसार की सभी इच्छाओं को त्यागते हुए श्री राधा राधा का निरंतर जप करो। ब्रज की गलियों में विचरण करो और वृंदावन धाम में निवास करो। [1] ...
श्री वृषभानु कुमारि
हे कीर्ति-कुमारी श्री राधा! आप परम कृपालु और उदार हैं; कृपा करके अपनी इस दासी पर दृष्टि कीजिए और मुझे अपने निज-महल की टहल प्रदान कीजिए।
सारद नारद सेस
सरस्वती, भक्त नारद, भगवान अनन्त शेष, इन्द्र, भगवान शिव और प्रजापति आदि भी सदैव वृषभानु-नन्दिनी श्री राधा के चरण-कमलों की वन्दना करते रहते हैं।
बाबा बनखंडी महादेव जग जाहर हैं
वृंदावन में जहाँ सुप्रसिद्ध श्री बनखंडी महादेव जी का निवास है, व्यास जी के घेरे के अंतर्गत, वहाँ दिन-रात अनूप छवि छायी रहती है। [1] यहाँ लाड़ली लाल ...
कोमल कमल हू सों गहरे गुलाबन सों
श्री राधारानी के चरण कमल से भी अधिक सुकोमल हैं, गहरे गुलाब के फूल की आभा से भी अधिक रक्तिम हैं। नकी लालिमा आम्र-पत्रों की कोमल आभा को भी फीका कर देती...