Verses & Passages
7 itemsअनुराग सौं भरी अस रूप गुन खरी अति
जहां अनुरागपूर्वक रूप और गुण हर क्षण खड़े (विद्यमान) रहते हैं, ऐसी वृंदावन की माधुरी को कौन जान सकता है? [1] जिस वृंदावन की रज में रतिपति अर्थात् काम...
नमो वनवृन्द अरविंद रससिंध कौ
श्री वृन्दावन को प्रणाम है, जो रस-सागर का पूर्ण खिला हुआ कमल है, जहाँ से आनंद की अमृत-धारा निरंतर प्रवाहित होती रहती है। वहाँ नीलमणि श्रीकृष्ण का झिलम...
अंग पर चीथरा हाथ में षीपरा
अंगों पर फटे-पुराने वस्त्र, हाथों में खीपरा लिए, मैं एकमात्र आशा लेकर ब्रज के वन-वन में भ्रमण करूँ। [1] जो भी सहजता से (बिना प्रयास के) फल, फूल और पत...
प्रेम अनुराग सों चित्त उन्मत्त हवै
प्रेम अनुराग से उन्मत्त चित्त होकर, मैं वृंदावन के ही सघन कुंजों में श्री राधिका के रस रँग में भींज कर घूमता रहूँ। [1] केवल श्री राधा नाम का उच्चारण ...
भरै द्रग वारि उच्चार वन प्रेम सौं
हे श्री राधारानी! श्रीवृन्दावन में निवास करते हुए वह मंगलमय क्षण कब आएगा, जब मेरे नेत्र आपके प्रेम में अविरल अश्रुधारा बहाएँगे और मेरा मुख प्रेमपूर्वक...
रूप गुन गंस के हंस अरु मोर
वृन्दावन के रूप और गुणों के वशीभूत होकर हंस, मोर और कोयल सदैव प्रेम के रंग में सराबोर रहते हैं। [1] कोयल, मैना, तोते और अनेक रंगों के पक्षी दिन-रात स...
भजन रस सार कौ सार रस विपिन कौ
भजन का सार तत्व रस है और रस का सार तत्व वृंदावन है। बिना इस वृंदावन राज (वनों के राजा) के स्पर्श के किसको अगाध रस की प्राप्ति हो सकती है ? [1] यह वृं...