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Sacred Scripture

अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध]

ग्रन्थ के पद एवं श्लोक

9 items
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कुंजन तै उठी प्राप्त

साधक को चाहिए की वह सबेरे(अपेन विश्राम) कुंज से उठकर सबसे पहले श्री यमुना जी में स्नान करे, फिर निधिवन को प्रणाम करता हुआ श्री बांकेबिहारी जी महाराज...

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जात जात मैं सब, सबही जात कुजात

जाति जाति करते सब कुछ चला ही जाता है और अंत में सभी जातियाँ कुजाति सिद्ध होती है। कहिये तो, जाति बंधन से मुक्त अनन्यरसिक की भला कौन सी जाति होती है? (...

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अनहोनी नहिं होइ कछु

यदि कुछ नहीं होना होता तो वह नहीं होता, और यदि कुछ होना होता है तो उसे कोई रोक नहीं सकता। उदाहरण के लिए सीता जी और दशरथ जी को ही देख लो, दोनों परम सम...

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माया कौं सब जग भजै

समस्त संसार वास्तव में माया की ही भक्ति करता है — धन, स्त्री, गृह, आश्रम आदि में आसक्ति ही सबका साधन बन गई है। किंतु मायापति श्रीकृष्ण का अनन्य भजन तो...

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परमेस्वर परतीति नहिं

जिन व्यक्तियों का भगवान् पर विश्वास नहीं है और जिनका भरोसा केवल धन-दौलत पर टिका है — वे चाहे गृहस्थ हों या गृहत्यागी, विरक्त कहलाते हों या संसार से व...

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जात जात मैं सब

संसार के सभी लोग अपनी-अपनी जातियों और कुलों के अभिमान में बहते जा रहे हैं। कोई उत्तम जाति का होने का गर्व करता है, तो कोई किसी और कुल का। परंतु जो अनन...

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हम सिष स्यामा स्याम के

श्रीभगवतरसिकजी भावमयी सखी-भाव से कहते हैं कि हम श्रीश्यामा-श्याम के शिष्य भी हैं और गुरु भी हैं। प्रेम से ओत-प्रोत होकर हमने अपना सर्वस्व (मन, तन, धन,...

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पैसा पापी साधु कौं, परसि लगावै पाप

भगवत रसिक जी कहते हैं कि हे अनन्य रसिक संतो, पैसा पापी होता है, यह छूने भर से ही साधु को पाप लगा देता है। [1] यह पैसा साधु को उसके इष्ट और गुरु से वि...

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भगवत नित्य बिहार नैन

श्री भगवत रसिक जी कहते हैं कि यह 'नित्य-विहार' भगवान शिव के तीसरे नेत्र के समान है, जो समस्त द्वैत और अज्ञान को भस्म कर देता है। इसके प्रकटीकरण के साथ...