श्री भगवत रसिक
जीवन चरित
श्री श्री भगवत रसिक वाणी संग्रह
हमारी संपति दंपति केलि
श्री भगवत रसिक जी कहते हैं कि हमारी सम्पति श्री राधा कृष्ण [दम्पति] की केलि है। यह केलि लीला इतनी रसमयी है कि इसका रस दिन दिन बड़ता है एवं सुख के समुद्...
कुंजन तै उठी प्राप्त
साधक को चाहिए की वह सबेरे(अपेन विश्राम) कुंज से उठकर सबसे पहले श्री यमुना जी में स्नान करे, फिर निधिवन को प्रणाम करता हुआ श्री बांकेबिहारी जी महाराज...
गावै हम सोई करै
श्री भगवत रसिक जी कहते है हम रसिक जन जैसा कुछ गाते है, श्री श्यामाश्याम अनायास वैसा ही करते है और श्री श्यामा श्याम जैसा करते है हम तत्काल उसी की गाकर...
सुरति सुख सोये स्यामाँ स्याम
अब प्रिया लाल [राधा कृष्ण] रस विलास के सुख में डूब कर सो रहे हैं। वे दोनों परस्पर गलबाँहीं दिये हैं, जिससे उनके अंग अंग की छटा और भी मनोरम हो रही है। ...
मेरी अलक लडी अलबेली
श्री भगवतरसिकजी कहते हैं कि मेरी अलबेली (बॉकी शोभामयी) अलक लडी (परम दुलारी) श्रीश्यामा प्यारी प्रियतम के गले में बाँहें डालकर विपरीत रति अर्थात् परत...
काया कुंज निकुंज मन
भगवतरसिकजी कहते हैं कि रसिक की काया ही कुंज-वन है, उसका मन ही निकुंज-महल, उसके नयन ही इस निकुंज-महल के मनोरम झरोखे अथवा द्वार हैं, और उसका हृदय ही वह ...
दुख सुख भुगतै देह, नहिं कछु संक है
भगवत रसिक जी कहते है कि मेरा शरीर सुख भोगता रहे अथवा दुःख, संसार मेरी निंदा करता रहे या स्तुति, मैं धन सम्पन्न हो जाऊँ अथवा कंगाल, परमार्थ या लोक व्यव...
दुःख दिखावत लाडिली
श्री किशोरी जी अपने को हस्त-पल्लवों से ढक लेती हैं। जब लालजी अत्यन्त अधीर होकर उनके सामने ‘हा-हा’ करते हुए मानो उनके हाथ का खिलौना बन जाते हैं—जैसे व...
निज मन में अनुभव भयौ
श्री ललिता सखी के महाप्रसाद स्वरूप इस नित्य-विहार का निज मन में ही अनुभव हुआ है; ऐसी अगोचर वस्तु का स्फुरण हुआ है जो नित्य, अनंत और अनादि है।
कोक कला संगीत लाल कौं
ये किशोरी जी [श्री राधा] लाल जी [श्री कृष्ण] को बड़ी रस भरी रीति से प्रेम शास्त्र का गीत संगीत सिखाया करती हैं। [1] ये सुंदर रूप, किशोर वयस और समग्र ...
मेरे प्रान धन स्वामिनि स्याम राधे
मेरे जीवन के प्राण धन एक मात्र दिव्य युगल श्री राधा कृष्ण हैं। (1) वे दोनों एक ही रस में लीन हैं, दोनों के रूप और आयु भी एक समान है, दोनों ही प्रेम रस...
पौढे ललित लतानि तरै
सुख राशि श्रीप्रिया प्रियतम सुंदर लताओं के नीचे सुमनों की सेज पर लेटे हैं। इस प्रेमी युगल के अधर अधरों से और उरोज उरोजों से सटे हैं, कटि से कटि जुड़ी ...
वन्दत प्रिया पाद जल जात
अपनी प्राणप्रिया श्री राधा के चरणकमलों की वन्दना करते हुए श्री श्यामसुन्दर कामरस के वशीभूत होकर इन चरणकमलों को अपने हृदय कमल पर धारण करते हैं। [1] श्...
कोउ सुकिया, कोउ परकिया, कलपि किये मत बादि
किसी ने स्वकीया आरै परकीया (नायिका) के रूप में श्री प्रिया जी की कल्पना करके एक व्यर्थ का बखेड़ा सा खड़ा कर दिया है।भगवत रसिक जी कहते हैं कि हमारी प्...
जहाँ कृष्ण राधा तहाँ
जहाँ श्रीकृष्ण है वही श्रीराधा भी हैं,और जहाँ श्रीराधा है वही श्रीकृष्ण भी हैं। ये दोनों एक पल के लिए भी अलग नहीं होते। इस बात को ठीक प्रकार से समझने...
जो उपदेसै और कौं, सो नहिं मानै आप
उपदेशक (पंडित, संत, महंत, गुसाईं, परमहंस आदि ) - दूसरों को जो शिक्षा देते हैं, उस पर स्वयं अमल नहीं करते। संसार की होशियारी (मूर्खता) तो देखिये कि यह ...
जाकौं दरसन इत मिलै
जिस मनुष्य को इस संसार में सर्वत्र राधा कृष्ण की झलक दिखाई देती है, केवल उसे ही मरने के बाद दिव्य वृन्दावन में राधा कृष्ण का साक्षात्कार होता है। इस भ...
पाँचे भूलै देह सुध छठे भावना रास की
भक्ति के विभिन्न चरण हैं। पाँचवीं अवस्था में साधक को अपनी देह-स्मृति का पूर्ण विस्मरण हो जाता है और छठी अवस्था में वह दिव्य महारास के अलौकिक रस का आस्...
सुरत सरोवर, समर जल, उठत कटाच्छ तरंग
इस नित्य-विहार के सरोवर में विशुद्ध प्रेममयी केलि का रस भरा है। इसमें कटाक्षों की तरंगें उठ रही हैं और अद्भुत रंग के अठारह कमल खिले हुए हैं। किशोरीजी ...
नवधा भक्ति निमित्त लै, जे सेबत अवतार
जो साधक मुक्ति, बैकुंठ‑प्राप्ति या किसी भी अन्य सिद्धि‑कामना को लक्ष्य बनाकर नवधा भक्ति का आश्रय लेते हैं और भगवान के अवतारों की उपासना करते हैं, वे इ...
जात जात मैं सब, सबही जात कुजात
जाति जाति करते सब कुछ चला ही जाता है और अंत में सभी जातियाँ कुजाति सिद्ध होती है। कहिये तो, जाति बंधन से मुक्त अनन्यरसिक की भला कौन सी जाति होती है? (...
अनहोनी नहिं होइ कछु
यदि कुछ नहीं होना होता तो वह नहीं होता, और यदि कुछ होना होता है तो उसे कोई रोक नहीं सकता। उदाहरण के लिए सीता जी और दशरथ जी को ही देख लो, दोनों परम सम...
भगवत रसिक अनन्य
श्री भगवत रसिक जी कहते हैं कि रसिक भक्त अपने इष्टदेव के प्रति अनन्य होता है, इसी कारण वह अद्भुत रस का आस्वादन करता है। श्यामाश्याम के नित्यबिहार रस मे...
परस्पर दोउ चकोर, दोउ चंदा
भावार्थ - भगवतरसिकजी कहते है कि रसिकबिहारी प्रियतम और रसिक बिहारिणी श्रीप्रियाजी - दोनों एक दूसरे के लिए चकोर है और दोनों ही चन्द्रमा हैं। दोनों ही चा...
ग्राम-सिंह भूंस्यौ बिपिन
एक गाँव के पास एक जंगल था, जहाँ एक दिन एक कुत्ता जंगल में घुस गया और शेर को देखकर भौंकने लगा। उसकी देखा-देखी गाँव के अन्य बेवकूफ कुत्ते भी बिना कारण भ...
सब सुख सदन बदन तुव राधे
भावार्थ - हे श्यामा प्यारी ! तुम्हारा यह मुखारविंद सब सुखों का घर है- कमल और चंद्रमा इसकी बराबरी नहीं कर सकते। वे तो अपने को अपराधी मानकर सदा डरते रह...
छके जुगल छवि वारूनी
प्रिया-प्रियतम की छवि-रूपी वारुणी का आस्वादन कर और प्रेम-रस के सर्प से डसे हुए सहचरियों के नयन ऐसे मतवाले हो गए हैं कि किसी गारुड़-मंत्र (जहर उतारने व...
निहं हिंदू नहिं तुरक हम
भावार्थ - न तो हम हिन्दू हैं, न तुर्क (मुसलमान), न जैनी न अंग्रेज। प्रेम पथ का पथिक होने के बाद हमारी वे सब पहचानें और क्रियाएं मिट गई है, जिनमें सांस...
नैननि देखीं और नहीं
भगवत रसिक जी कहते हैं कि मैं अब (श्रीयुगल की नित्य केलि के अतिरिक्त) न तो अपनी आँखों से कुछ और देखता हूँ, न कानों से कुछ और सुनता हूँ, न नासिका से कुछ...
जावक जुत जुग चरण लली के
श्री किशोरी जी के महाबर से युक्त दोनों चरणारविंद अद्भुत निर्मल एवं अनुपम हैं। [1] ये प्रियतम की हृदय रूपी कमल कलिका को विकसित करने वाले सूर्य हैं। [2...
महल की बात महली ही जाने
"महल की बात महली ही जाने" - श्री भगवत रसिक - भगवत रसिक की वाणी केवल निकुंज महल की सखियाँ ही महल की बात जानती हैं और वहां किसी की सामर्थ्य एवं गति न...
बलि जैहौं श्रीरसिकचारज
भावार्थ - भगवतरसिकजी कहते हैं - रसिकाचार्य स्वामी श्री हरिदासजी! मैं आपकी बलिहारी जाता हूँ जिन्होंने अपने हृदय सिन्धु का मन्थन करके यह नित्य विहार रूप...
जै जै रसिक रवनी रवन। रूप गुन लवन्य प्रभुता प्रेम पूरन भवन
हे रसिक शिरोमणि प्यारी जू , श्री किशोरीजी, आपकी जय हो जय हो! आप रूप, गुण, लावण्य प्रभुता और प्रेम की पूर्णता की धाम हो। आपके अतिरिक्त रसिक भक्त की विप...
आचारज ललिता सखी, रसिक हमारी छाप
भावार्थ - (अपनी रसोपासना का परिचय देते हुए भगवत रसिकजी कहते हैं-) हमारी आचार्य ललिता सखी हैं। रसिक हमारी छाप है। हमारे यहाँ नित्य किशोर (सहज जोडी) की ...
दोऊ कानन लगि कहैं चुंबन देहिं अँकोर
(नित्यविहार-रत श्यामाश्याम की परिचर्या में अवस्थित श्रीभगवतअलि जी कहती हैं कि नित्यविहार की स्थिति में अधीर हुए) प्रिया-प्रियतम मेरे कानों से लग-लगकर ...
मेरी महारानी श्री राधारानी
वृंदावन निकुंज की अधीश्वरी श्री राधारानी ही मेरी एकमात्र स्वामिनी हैं। इन्हीं के बल पर मैंने लोक, वेद और कुल की सभी मर्यादाओं का त्याग कर दिया है। [1]...
आज तो छबीली राधे रसभरी डोलहीं
(प्रिया जी परिहास करने में बड़ी निपुण है। वे आज प्रियतम से नटखटी कर रही हैं।) आज जो शोभामयी श्रीकिशोरी जी (श्री राधा) प्रेम रस में उन्मत्त होकर डोल ...
चेला काहू के नहीं
न तो हम किसी (देह मानी) के चेला है और नकिसी (देह मानी) के गुरु हम तो अपने प्रिया प्रियतम की भावमयी सखी है। [1] हम सदा उनके रंगमहल में निवास करते है और...
मेरे प्रानधन स्वामिनी स्याम राधे
रसिक सखी भगवतअलि जी कहती है कि श्री लालजी एवं उनकी स्वामिनि ही मेरे प्राण धन हैं। कमल के सदृश मुखवाले ये लाडली लाल एक ही रस, एक ही रूप और एक ही समान व...
रसभरे राजत रसिकबहारी
यहाँ श्यामा श्याम ही रसिकबिहारी है। वे रस भरे हैं। वे नव नव नेह भरे खेल खेलते हैं। उनके सुख से सखियाँ प्रमोदित हैं। भगवतरसिक जी इस रस का पान कर तृप्त ...
चेला काहू के नहीं, गुरु काहू के नहीं
श्री भगवत रसिक जी के शब्दों में वह न किसी के चेला हैं, और न गुरु हैं वह केवल निज महल में श्री लाड़ली लाल को दिन रात लाड लड़ाती हैं ।
पायन परि बिनती करे, से रस मुख्य सिंगार
लाल जी श्री प्रिया जी के चरणों में पड़ कर उनसे जो दैन्य पूर्वक विनय किया करते हैं वही मुख्य रस श्रृंगार रस है।
भगवत रसिक सहायक सब दिन
भगवत रसिक जी कहते हैं कि जो रसिकों (प्रियतम एवं सहचरियों) की सदा सहायता करने वाली हैं और उनको निरंतर सर्वोपरि सुख देती हैं वो एक मात्र किशोरीजी श्री ...
अद्भुत रस की खानि, सदा सुखदानि बिहारिनि रानी
भगवत रसिक जी के शब्दों में नित्य सुख देने वाली निकुंजेश्वरी श्रीकिशोरी जी नित्य विहार रस की विलक्षण खान है। (सामान्य खाने, खनिज निकालते निकालते एक दि...
जमुना जल विमलत जुगल किशोर
युगलकिशोर श्रीश्यामा-कुंजविहारी (अपने केलि-विलास-द्वारा) श्रीयमुनाजी के जल को निर्मल बना रहे हैं। पहले इन प्रियालाल ने उबटन करके यमुना-जल में स्नान कि...
हमारे वृन्दावन उर और
हमारे हृदय में श्रीवृन्दावन का स्वरूप विराजमान है अर्थात मानो हमारा हृदय प्रकट वृन्दावन स्वरूप ही है। जहाँ हमारे रसिक शिरोमणि श्रीश्यामा कुंजविहारी स...
मोह-फाँस जग बँधि रह्यौ
भावार्थ - प्राणी इस संसार में न तो किसी के साथ आये हैं और न (इस संसार से) किसी के साथ गये हैं। (सब अकेले पैदा होते हैं और अकेले ही मरते हैं।) यह मिलाप...
लखी जिन लाल की मुसक्यान
भगवत रसिकजी कहते हैं कि रसिक लालजी ने यही मुस्कान रूपी तलवार मुख रूपी म्यान से निकालकर हमारे नेत्रों में (ऐसी) मार दी है कि अब इस मुस्कान को देखते रहन...
जयति रस मूर री
भगवत रसिक जी कहते हैं कि हे राधे आप रस की मूल स्रोत हैं। आपकी देह की दिव्य सुगंध और कंठ का अत्यंत मनोहर स्वर रसिक जनों का प्राणाधार है। आपकी जय हो, आ...
हम गावें सोई करें
श्री भगवत रसिक जी के शब्दों में सखी और लाड़ली लाल के परस्पर प्रेम का वर्णन है। जो सखी के मन में भाव आता है, तुरन्त लाड़ली लाल प्रेमवशीभूत होकर वह लील...
लात हनी भृगु हृदय में
जब भृगुजी ने भगवान् के वक्षस्थल पर लात मारी तो भगवान् ने अपने ऊपर किये हुए पादाघात के अपराध पर रुष्ट न होकर भृगुजी का सम्मान किया। किन्तु जब भगवान् न...
बानी बीजक बस्तु कौ बीजक बस्तु न होइ
रसिकों की वाणियों (नित्यबिहार रूपी सम्पत्ति) वस्तु उसे ही मिलती है, जो उसका अधिकारी है। एक की वस्तु को दूसरा नहीं पा सकता। वाणी सरूपी बीजक हैं और नित्...
लखी जिन लाल की मुसक्यान | तिनहिं बिसरी बेद-बिधि
लखी जिन लाल की मुसक्यान । तिनहिं बिसरी बेद-बिधि, जप,जोग, संजम, ध्यान । । नैम, ब्रत, आचार, पूजा, पाठ, गीता-ज्ञान । रसिक भगवत दृग दई असि, ऐंचि कै मुख...
हा हा करौ परौ पायन अब
तुम तो अपना वही एक उपाय करो—हमारी प्यारी श्री राधा के चरणों में जाओ और करुण क्रन्दन करो! स्वामिनी जी बड़ी उदार हैं, ऐसा करते ही तुम्हें वह अपना सर्वस...
सुनी सुनी सब कोउ कहै देखी कहै ने कोइ
संसार में अधिकांश लोग वेदों, शास्त्रों या अनुभवी महापुरुषों की बातों को बिना स्वयं अनुभव किए ही दोहराते रहते हैं। ऐसे व्यक्तियों की बातें प्रायः मिथ्य...
जप तप तीरथ दान ब्रत
जो मनुष्य श्रीहरि की अनन्य भक्ति का आश्रय ग्रहण नहीं करता और केवल विविध जप, तप, तीर्थाटन, दान, व्रत, योग, यज्ञ एवं कर्मकांडों के जाल में उलझा रहता है,...
खावे नहीं पछिताइ सो
यह संसार भूत के लड्डू के समान है—जो इसे भोगता है, वह पछताता ही है; और जो नहीं भोगता, वह भी इसकी लालसा में पछताता है। दोनों ही स्थितियों में यह दुःखदाय...
इष्ट धर्म मन मत मिलै
श्री भगवत रसिक जी कहते हैं—जिससे हमारे इष्टधर्म, मत-विचार, रहनी और स्वभाव मिलते हैं, उससे मिलने पर हमारा हृदय आनन्द से फूल उठता है।
नित्य किशोर उपासना
एक रसिक भक्त के रूप में उसे पहचाना जा सकता है, जो राधा कृष्ण की नित्य किशोर अवस्था में उपासना करता है, जो युगल नाम का भजन करता है, जिसके लिए वेद रसिक...
वृन्दावन विहरत फिरै
श्री भगवत रसिक जी वृन्दावन रस के उपासक को सलाह देते हुए कहते हैं कि वृन्दावन में युगल उपासना है इसलिए जहाँ जहाँ भी वृन्दावन में विहरण करो, उससे पहले ...
जाकों दर्शन इत् मिलै, ताकौं दर्शन उत्त
जिस मनुष्य को इस संसार में सर्वत्र राधा कृष्ण की झलक दिखाई देती है, केवल उसे ही मरने के बाद दिव्य वृन्दावन में राधा कृष्ण का साक्षात्कार होता है। इस ...
नर्क स्वर्ग अपवर्ग आस नहिं त्रास है
न तो मुझे स्वर्ग और मुक्ति की तनिक भी आशा है, न ही नरक का ज़रा सा भी भय है, जहाँ आप रखोगे वहीँ मैं सुख की राशि का अनुभव करता रहूँगा। मुझ पर इतनी कृपा ...
जयति नव नागरी, रूप गुन आगरी
हे नवनागरी किशोरी श्री राधे, आप रूप और गुणों की खान हैं, सब सुखों की निधि हैं, आपकी जय हो।
सुरतरु, नागरी, नेह निधान
हे लाड़ली जी, आप ही केवल रसिकों के लिए कल्पलता हैं, चतुर शिरोमणि हैं, और प्रेम की निधि हैं। हे किशोरीजी, मैं आपकी शरण में हूँ। कृपा कर मेरे ऊपर स्नेह...
जाके बल मैं सब सों तोरी
वृन्दावन निकुंज की अधीश्वरी श्री राधारानी ही मेरी एक मात्र स्वामिनी हैं इन्ही के बल पर मैंने लोक, वेद, और कुल की सभी मर्यादाओं को तोड़कर फेंक दिया ...
पैसा पापी साधु कौं, परसि लगावै पाप
भगवत रसिक जी कहते हैं कि हे अनन्य रसिक संतो, पैसा पापी होता है, यह छूने भर से ही साधु को पाप लगा देता है। [1] यह पैसा साधु को उसके इष्ट और गुरु से वि...
जहाँ कृष्ण राधा तहाँ, जहँ राधा तहँ कृष्ण
जहाँ कृष्ण राधा तहाँ, जहँ राधा तहँ कृष्ण । न्यारे निमिषा न होत दोउ, समुझि करौ यह प्रश्न । । - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक जी की वाणी, निर्विरोध मनरंजन...
रूप-सरोवर लाडिली फूले सहज सरोज
हमारी लाडिलीजी (श्री राधा) साक्षात् रूप-सौंदर्य का अथाह सरोवर हैं, जिसमें उनके विभिन्न अंग — दो हस्तकमल, दो चरण कमल, एक नाभि कमल, दो नयन कमल, एक मुख क...
भगवत रसिक संग जो चाहै, प्रथमहै लोभै त्यागै
श्री भगवतरसिकजी कहते हैं कि जो साधक परम रसिक श्रीयुगल की नित्य संगति के अभिलाशी हैं, उन्हें सर्वप्रथम लोभ का परित्याग कर देना चाहिये, फिर शरीर, घर, पु...
हमारी दंपति संपति केलि
हमारी दंपति संपति केलि। - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 12 (5) श्री भगवत रसिक जी कहते हैं कि प्रिया प्रियतम की केलि लीला ही ...
चस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि
भावार्थ - श्री लाडली जी ने स्वयं हमें यह नित्य बिहार की दृष्टि प्रदान की है। इससे हमारे मन में प्रेम के प्रति पक्का विश्वास उत्पन्न हो गया है और अब तो...
नमो नमो श्री बृंदावनचंद
अद्भुत सौंदर्य की छटा बिखेरने वाले श्री धाम वृंदावन को हमारा बारंबार प्रणाम है। यह (वृंदावन) नित्य अनादि और अनंत है यहां श्री प्रिया प्रियतम एकरस स्वच...
सोभा-सिंधु निधिवन और
यह निधिवन किसी विलक्षण शोभा का महा सागर है। यहां निकुंज भवन की मंजुल पौड़ी में ही ऊपर से नीचे तक ऐसी अद्भुत माधुरी छाई हुई है कि उसे देखकर बाँके रसिक ...
प्रथम महात्म प्रकृति ज्ञान रवि तहाँ प्रकासे
(आनंद के सात परिवेश है। उनमें श्रीप्रिया प्रियतम की केलि चरम परिवेश में है। वही सातवाँ परिवेश रसिकराय श्री स्वामी हरिदास का मंगल भवन है, इस बात को स्प...
भगवत रसिक रसिक की बातें
लाल जी प्रिया जी से कहते हैं कि ये नेत्र तो तुम्हारे मुखचंद के चकोर बन कर रह गए हैं । रूप रस लपंट ये (नयन चकोर) सदा तुम्हारे अनुराग से भरे रह कर तुम्ह...
यह दिव्य प्रसाद प्रिया पिय कौ
भावार्थ: श्रीयुगल के प्रसार की महिमा का वर्णन करते हुए श्रीभगवत रसिकजी कहते हैं कि प्रिया प्रियतम का यह प्रसाद दिव्य है। नजर पड़ते ही, मन के आनंद को बढ...
नित मेरौ लालन नित ही लली
(नित्य वृंदावन में प्रिया प्रियतम का नित्य बिहार निरंतर चलता रहता है फिर भी यह पुराना नहीं होता इसी रहस्य को स्पष्ट करते हुए भगवत रसिक जी कहते हैं) ह...
जै जै रसिक रवनी रवन
भावार्थ: हे रसिक शिरोमणि श्रीकिशोरी - किशोरजी, आपकी जय हो, जय हो ! आप रूप, गुण, लावण्य प्रभुता और प्रेम की पूर्णता की धाम हैं। आपके अतिरिक्त रसिक भक्त...
सम्प्रदाय नवधा भक्ति, वेद सुरसरी नीर
नवधा भक्ति और वेदों से संबंधित सभी संप्रदाय ऐसे हैं जैसे गंगा का जल (युगों युगों से अनेक भक्त जन इस भक्ति रस रूपी गंगा जल से अपना अपना "घट'' भरते आ रह...
हम सिष स्यामा स्याम के, गुरु हम स्यामा स्याम
भावार्थ: श्री भगवत रसिक जी भावमयी सखी भाव से कहते हैं कि हम श्यामा श्याम के शिष्य भी हैं और गुरु भी हैं (वे जैसी आज्ञा देते है, हम वैसा करते हैं और ...
तुब मुख नैन कमल अली मेरे
भावार्थ - (इस पद में भगवतरसिक जी ने प्रियतमा के प्रति प्रियतम के हृदय की आसक्ति को अभिव्यक्ति दी है। प्रियतम प्रियाजी से कह रहे हैं -) हे प्यारी, मेरे...
मंगल मूरति लाडिली, मंगल मूरति लाल
इस रसोपासना में सबकुछ मंगलमय है,यह बताते हुए भगवत रसिक जी कहते हैं कि इस नित्यबिहार की किशोरीजी मंगल की मूर्ती है, लालजी भी मंगल की मूर्ती है और नित्य...
कुंज बिहारिनि लाडिली
श्री भगवत रसिक कहते हैं कि रसिकों की यह गौर-श्यामल वर्ण वाली जुगल जोड़ी अर्थात् श्री राधा–कृष्ण सदैव मेरे हृदय में विराजमान रहते हैं।
जोगी ज्ञानी कर्मठी
अनन्य रसिकों का मार्ग योगियों, ज्ञानियों, कर्मठों और तपस्वियों के मार्ग से अत्यन्त भिन्न और दूर होता है। अनन्य रसिकों के नयनों में तो नित्य ही भरपूर र...
हैं हम रसिक अनन्य प्रिया पिय
भावार्थ : श्री भगवत रसिक देव जी कह रहे हैं, कि हम अनन्य रसिक (युगल सरकार के अनन्य) कुंजमहल के वासी हैं, जहां हमें प्रिया प्रियतम की नित्य ही नवायमान क...
नवरस नित्य बिहार में नागर जानत नित्त
नित्य विहार के नव रस को तो एक मात्र श्री लाल जी ही जानते हैं, तभी तो वह अनन्य बनकर अपने मन, बुद्धि एवं चित्त से एक मात्र नित्य विहार का ही सेवन करते ह...
नित ही प्रति देखि-देखि गुन गाऊँ
श्री भागवत रसिक जी कहते हैं कि नित्य ही वह प्रिया लाल का नित्य विहार देख देख गुणगान करते हैं। युगल सरकार श्री राधा कृष्ण जो अत्यंत उदार, सुकुमार एवं अ...
भगवत स्यामाँ स्याम कौ
श्री भगवत रसिक जी कहते हैं की वृंदावन का नित्य विहार रस सर्वोपरि रस है और हर साधक इस रस का अधिकारी नहीं है। पूर्व जन्मों के संस्कार और भावों की प्रबलत...
हमारी जीवनि जुगलकिशोर
भावार्थ: भगवतरसिक जी कहते हैं कि नित्य नवीन यौवन के जोर से निरंतर प्रेमान्मत्तत रहने वाले जुगल किशोर - श्री कुंजबिहारी एवं श्रीकुंजबिहारिणी की जोड़ी ह...
रसिकबर रसिक रसीलौ रसिया
रसिक वर प्रियतम बड़े ही रसीले रसिया हैं। [1] इन्होंने प्रियतमा के नेत्रों में अंजन पूर कर उनके मन को अनुराग से ऐसा रँगा कि उनके खंजन-जैसे (विशाल और चं...
दुख सुख भुगतै देह, नहिं कछु संक है
दुख सुख भुगतै देह, नहिं कछु संक है। निंदा अस्तुति करौ, राव क्या रंक है।। परमारथ व्यवहार, बनौ कि ना बनौ । अंजन है मम नैन, रसिक भगवत सनौ।। - श्री भगवत र...
जहाँ कृष्ण राधा तहाँ, जहँ राधा तहँ कृष्ण
जहाँ श्री कृष्ण हैं वहीँ श्री राधा हैं, और जहाँ श्री राधा हैं वहीँ श्री कृष्ण हैं, यह दोनों एक पल के लिए भी अलग नहीं होते, इस बात को ठीक से जान कर ही ...
रसभरे राजत रसिकबहारी
(राग गौरी) रसभरे राजत रसिकबहारी | गौर स्याम अभिराम रूप दोऊ नव नेह विहारी | यह सुख निरखि सखी नित प्रमुदित, प्रान करै बलिहारी | भगवतरसिक पियत या रस को ...
बानी बीजक बस्तु कौ बीजक बस्तु न होइ
रसिकों की वाणियों (नित्यबिहार रूपी सम्पत्ति) वस्तु उसे ही मिलती है, जो उसका अधिकारी है। एक की वस्तु को दूसरा नहीं पा सकता। वाणी सरूपी बीजक हैं और नित्...
लात हनी भृगु हृदय में
अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (19) जब भृगुजी ने भगवान् के वक्षस्थल पर लात मारी तो भगवान् ने अपने ऊपर किये हुए पादाघात के अपराध पर रुष्ट न होकर भ...
पायन परि बिनती करे, से रस मुख्य सिंगार
अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1 (8) लाल जी श्री प्रिया जी के चरणों में पड़ कर उनसे जो दैन्य पूर्वक विनय किया करते हैं वही मुख्य रस श्रृंगार रस है।
भगवत रसिक सहायक सब दिन
भगवत रसिक जी कहते हैं कि जो रसिकों (प्रियतम एवं सहचरियों) की सदा सहायता करने वाली हैं और उनको निरंतर सर्वोपरि सुख देती हैं वो एक मात्र किशोरीजी श्री र...
हम गावें सोई करें
श्री भगवत रसिक जी के शब्दों में सखी और लाड़ली लाल के परस्पर प्रेम का वर्णन है। जो सखी के मन में भाव आता है, तुरन्त लाड़ली लाल प्रेमवशीभूत होकर वह लीला...
हमारी दंपति संपति केलि
अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 12 (5) श्री भगवत रसिक जी कहते हैं कि प्रिया प्रियतम की केलि लीला ही हमारी सम्पति है।
भगवत रसिक संग जो चाहै, प्रथमहै लोभै त्यागै
अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (05) श्री भगवतरसिकजी कहते हैं कि जो साधक परम रसिक श्रीयुगल की नित्य संगति के अभिलाशी हैं, उन्हें सर्वप्रथम लोभ का ...
जात जात मैं सब
जाति-जाति करते सब चला ही जाता है, और अंत में सभी जातियाँ कुजाति सिद्ध होती हैं। कहिये ‘रसिक अनन्य’ भक्त—जो श्री राधा रानी का अनन्य भक्त है और वृन्दावन...
परस्पर दोउ चकोर, दोउ चंदा
परस्पर दोउ चकोर, दोउ चंदा | दोउ चातक, दोउ स्वाति,दोउ घन, दोउ दामिनी अमंदा || दोउ अरबिंद, दोउ अलि लंपट, दोउ लोहा दोउ चुबंक | दोउ आसक, महबूब दोउ मिलि, ज...
यह सुख निरखि सखी नित प्रमुदित
हे सखी, "नित्य विहार" के अमृत रस को देखो और अपने प्राण-जीवन को इस रस पर न्यौछावर कर दो। श्री भगवत रसिक कहते हैं कि "नित्य विहार" का रस प्राप्त कर अन्य...
चेला काहू के नहीं, गुरु काहू के नहीं
श्री भगवत रसिक जी के शब्दों में वह न किसी के चेला हैं, और न गुरु हैं वह केवल निज महल में श्री लाड़ली लाल को दिन रात लाड लड़ाती हैं |
नित ही प्रति देखि
श्री भागवत रसिक जी कहते हैं कि नित्य ही वह प्रिया लाल का नित्य विहार देख देख गुणगान करते हैं। युगल सरकार श्री राधा कृष्ण जो अत्यंत उदार, सुकुमार एवं अ...
मोह
मोह-फाँस जग बँधि रह्यौ, बिष्ठुरे करत बिलाप || बिछुरे करत बिलाप, मानि सुत, पितु, पति, माता | ससुर, जमाई, जुबति, सुहृद, गुरु, सिष, धन, भ्राता निज अनुभव ...
बलि जैहौं श्रीरसिकचारज
(राग काफी) बलि जैहौं श्रीरसिकचारज। नित्य बिहार उद्धार कियौ जिन, मथि निज हृदय सिन्धु बारज॥ भ्रम, तम, स्रम सब हरे हमारे, कर गहि सकल संभारे कारज। भगवत रस...
प्रथम सुनें भागवत
(छप्पय) प्रथम सुने भागवत, भक्त मुख भगवत वाणी । [1] द्वितीय अराधे भक्ति, व्यास नव भांति बखानी ॥ [2] तृतीय करे गुरु समुझी, दक्ष सर्वज्ञ रसीलो । [3] चौथे...
लखी जिन लाल की मुसक्यान | तिनहिं बिसरी बेद
लखी जिन लाल की मुसक्यान | तिनहिं बिसरी बेद-बिधि, जप,जोग, संजम, ध्यान | | नैम, ब्रत, आचार, पूजा, पाठ, गीता-ज्ञान | रसिक भगवत दृग दई असि, ऐंचि कै मुख ...
कोउ सुकिया, कोउ परकिया
किसी ने स्वकीया आरै परकीया (नायिका) के रूप में श्री प्रिया जी की कल्पना करके एक व्यर्थ का बखेड़ा सा खड़ा कर दिया है।भगवत रसिक जी कहते हैं कि हमारी प्र...
जै जै रसिक रवनी रवन। रूप गुन लवन्य प्रभुता प्रेम पूरन भवन
अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (35) हे रसिक शिरोमणि प्यारी जू , श्री किशोरीजी, आपकी जय हो जय हो! आप रूप, गुण, लावण्य प्रभुता और प्रेम की पूर्णता ...
नैननि देखीं और नहीं
नैननि देखीं और नहीं, श्रवण सुने नहीं और | घ्राण न सूघोँ और कछु, रसना कहौं न और || रसना कहौं न और, त्वचा परसौं नहीं औरे | कुंज बिहारी केलि झेलि, इन्द्र...
जयति रस मूर री
भगवत रसिक जी कहते हैं कि हे राधे आप रस की मूल स्रोत हैं। आपकी देह की दिव्य सुगंध और कंठ का अत्यंत मनोहर स्वर रसिक जनों का प्राणाधार है। आपकी जय हो, आप...
श्री भगवत उर धारी, भक्ति करि मन को दाबै
निर्विरोध मनरंजन (11) जो व्यक्ति श्री हरी को हृदय स्थल में विराजमान करके उनकी सच्ची भक्ति करता है और मन को वश में करके गुरु की आज्ञा के अनुसार चलता है...
हम सिष स्यामा स्याम के
श्री भगवत रसिक जी भावमयी सखी भाव से कहते हैं कि हम श्यामा-श्याम के शिष्य भी हैं और गुरु भी हैं। प्रेम से ओत-प्रोत होकर हमने अपना सर्वस्व (मन, तन, धन, ...
जावक जुत जुग चरण लली के
श्री किशोरी जी के महाबर से युक्त दोनों चरणारविंद अद्भुत निर्मल एवं अनुपम हैं। [1] ये प्रियतम की हृदय रूपी कमल कलिका को विकसित करने वाले सूर्य हैं । [2...
हमारे वृन्दावन उर और
हमारे वृन्दावन उर ओर | माया काल तहाँ नहिं ब्यापै, जहाँ रसिक सिरमौर || टूटि जात सत असत बासना, मन की दौरा दौर | भगवत रसिक बतायौ श्रीगुरु, अमल अलौकिक ठौर...
लखी जिन लाल की मुसक्यान
भगवत रसिकजी कहते हैं कि रसिक लालजी ने यही मुस्कान रूपी तलवार मुख रूपी म्यान से निकालकर हमारे नेत्रों में (ऐसी) मार दी है कि अब इस मुस्कान को देखते रहन...
महल की बात महली ही जाने
- श्री भगवत रसिक - भगवत रसिक की वाणी केवल निकुंज महल की सखियाँ ही महल की बात जानती हैं और वहां किसी की सामर्थ्य एवं गति नहीं हैं |
हा हा करौ परौ पायन अब
तुम तो अपना वही एक उपाय करो—हमारी प्यारी श्री राधा के चरणों में जाओ और करुण क्रन्दन करो! स्वामिनी जी बड़ी उदार हैं, ऐसा करते ही तुम्हें वह अपना सर्वस्...
वेदनि खोबै बैद सो
सच्चा वैद्य वही है जो रोग को जड़ से मिटा दे, वास्तविक गुरु वही है जो गोविन्द से मिला दे, सच्चा भोजन वही है जो भूख मिटा दे। भगवत रसिक जी कहते हैं कि ऐसा...