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ग्रन्थ के पद एवं श्लोक

17 items
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अब तो जोई मित्र कहावैं

अब तो हमारा केवल वही मित्र है जो हमें श्री वृंदावन के वास को दृढ़ करता है। [1 & 2] अब वह व्यक्ति हमारे शत्रु के समान है जो वृंदावन वास के अतिरिक्त हमक...

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व्रज को स्वाद वैकुण्ठ में नाहीं

ब्रज का रस वैकुंठधाम में भी नहीं है। जब हरि की कथा अत्यंत मीठी लगती है तभी ब्रजरस मिलता है। [1] ब्रजरस के बिना ऐसा क्या है जो रसिकों ने गाया है अर्थात...

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जो सुख लेत सदा व्रजवासी

जिस भगवान को पूरा जगत अविनाशी कहता है वह यहाँ ब्रज के घर घर में खिलौना बना रहता है। श्री नागरीदास जी कहते हैं कि यह ब्रज विश्व से न्यारा है, श्री हरि ...

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घर घर टहल करत है लक्ष्मी

ब्रज में स्वयं लक्ष्मीजी एक घर से दूसरे घर विचरण करती रहती हैं और कभी भी ब्रज से दूर नहीं जातीं। ब्रज-वृन्दावन की महिमा का वर्णन कौन कर सकता है, जहाँ ...

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मोहन कृपा कटाक्ष निहारैंगे

श्री नागरीदास कह रहे हैं कि अब मोहन अवश्य मुझपर अपनी कृपा दृष्टि करेंगे। [1] मेरे समस्त औगुणों को भुला कर अपने कृपालु एवं पतित पावन नाम को ही विचारेंग...

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अब तो यही बात मनमानी

अब यही बात मन को भाती है कि श्यामा श्याम की रजधानी श्री वृंदावन धाम का एक क्षण के लिए भी त्याग नहीं करना। [1] लघु धाम इत्यादि का अवलोकन कर भटकते भटकत...

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बहुरि परे वा दिश को पांव

अब ऐसा कब होगा जब मेरे चरण वृंदावन की ओर चलेंगें। जहां परम मनोहर यमुना का तट है, उसी दिशा में ही मेरा गाँव है। [1] जहां मोहन [श्री कृष्ण] हमारे स्वाम...

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साँचे हितू सु यही दृढ़ावैं

जो अनन्य रसिक जन होते होता है वह प्रिया प्रियतम के नित्य विहार को ही निरखता है एवं दिव्य दंपति की उसी प्रेम लीला को ही नित्य सुनता और सुनाता है। [1] ...

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करिये ब्रज बासिन सौं नेह

ब्रज वासियों से प्रेम बढ़ाइए क्योंकि ब्रजवासी नख से सिख तक (संपूर्ण रूप से) प्रेम के सागर से ओतप्रोत रहते हैं जिनमें कभी भी प्रेम का खंडन नहीं होता। [...

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हम तो बरसाने के बासी

हम श्री बरसाना धाम के वासी हैं कहाँ सुंदर गह्वर वन है, ब्रह्म पर्वत है, साँकरी खोर आदि हैं, जहां की ठौर सुंदर एवं रस बरसाने वाली है। [1] जहां के कुंड...

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ये ब्रजबासी हरि के प्यारे

ये ब्रजवासी श्री हरि के प्यारे हैं। वे हरि में हैं, और हरि उनमें सदा रहते हैं, एक क्षण को भी नहीं बिछड़ते। [1] इंद्र आदि देव और अन्य असुरों के प्रकोप...

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हमारी बाँह गही वृन्दावन

वृंदावन ने मुझे मेरी बाँहों से पकड़ लिया है। मुझे अपनी शीतल छाया प्रदान कर, संसार के दुख-द्वंद्वों के तापों से सदा के लिए छुड़ा लिया है। [1] मेरे में...

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देह धरे को अब फल पायो

अब मैंने इस मानव देह धारण करने का असली फल पाया है। बहुत समय तक इस सांसारिक जाल के उलझनों में फँसा रहा और माया मुझे नाच नचाती रही। [1] भगवान की कृपा न...

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हमारी अब सब बनी भली हैं

हमारी अब सब बात बन गयी है। [1] हमें अब कुंज महल की नित्य ही टहल मिल गयी है जहां नित्य ही नई नई रंगरली मनायी जाती है। [2] हमारे साहिब एक मात्र युगल सरक...

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अब तो कहिबे की न रही

हे श्री राधारानी! अब मेरे पास कहने को कुछ भी नहीं बचा। आपने करुणा करके मुझे अपनी बाहों से पकड़कर, अपने चरण-कमलों की शीतल छाया में आश्रय दिया और श्री ध...

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ब्रज के परम सनेही लोग

ब्रजवासी अत्यंत स्नेही और सरल हृदय लोग हैं। वे प्रेमपूर्वक गाली देते हैं, और हँसते हुए मिलते हैं। उनका हृदय स्नेह से परिपूर्ण हैं। [1] दिव्य दंपति श्...

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हम तो वृन्दावन रस अटके

श्री नागरीदास कह रहे हैं "मैं तो श्री वृन्दावन रस में डूब चुका हूँ। [1] जब तक इस रस का परिचय नहीं हुआ तब तक संसार में बहुत भटकता रहा। [2] इस नीरस जग...