ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
15 itemsनैनन सों नैना मिले, मुख सौं मुख लपटाय
वृन्दावन युगल-रस का परम-पावन स्थान है जहाँ युगल (श्री राधा कृष्ण) प्रेम के वशीभूत होकर नयन से नयन मिलाते, मुख से मुख लगाते और भुजाओं में परस्पर लिपटकर...
गुणनि अगाधा राधिका, श्री राधा रस धाम
श्री राधिका जी अनंत गुणों की अगाध सागर हैं और साक्षात् रस का धाम हैं। संसार के समस्त सुखों की सिद्धि और पूर्णता केवल उनके नाम के 'आधे' भाग (अर्थात् के...
श्री वृंदावन स्वामिनी करि सुदृष्टि इहि ओर
हे वृंदावन की महारानी, श्री राधा! कृपा करके मेरी ओर सुदृष्टि डालिए और अपने कृपा-कटाक्ष की कोर से अनुराग-रस की वर्षा कर दीजिए।
अहो लड़ैती विन कहे जानि लेऊ जिय बात
हे लड़ैती [श्री राधा]! बिना कहे ही मेरे हृदय की बात जान लीजिए—आपके चरणों के संग बिन मुझे कुछ भी सुहाता नहीं।
कान कथा मन ध्यान
कानों का विश्राम श्री श्यामाश्याम की कथा में है, मन का ध्यान में, रसना का उनके नाम में एवं आँखों का विश्राम उनकी रूप माधुरी है।
अहो लड़ैती लाड़ली, अलखि लड़ी सुकुमारु
हे लड़ैती लाड़ली श्री राधे! हे अति सुकुमार अलख लड़ी, मनोहारनी किशोरी जू! कृपा कर मुझे अपने सुंदर मुख की थोड़ी सी झलक दिखलाइये।
दसन खँडित वीरी रुचिर दैहैं निकट बुलाय
मेरी यही अभिलाषा है कि कुंवरी श्री राधा अपने सुकोमल हाथों से उनके द्वारा चर्वित पान मुझे अपने निकट बुलाकर प्रदान करेंगी एवं अपने कंठ के हार को मेरे कं...
जो वन वन डोलत रहों
यदि कोई जीव श्री श्यामाश्याम से मिलने की आशा बाँधकर वृन्दावन के कुंज वनों में डोलेगा, तो अनजाने में ही कहीं न कहीं उसकी उनसे अचानक भेंट अवश्य होगी।
वा मुख देखन को कहौं
ऐसा कौन-सा उपाय करूँ कि मुझे श्री श्यामा-श्याम के मुख-कमल के दर्शन प्राप्त हो सकें? मैं क्या करूँ, किससे कहूँ? अब तो यह पीड़ा अत्यंत असहनीय हो गई है।
जो मोसों मोसी करौ नाहीं कछु मोहि ठौर
यदि आप मेरे साथ वैसा ही व्यवहार करें जैसा मेरे कर्मों के अनुसार होना चाहिए, तो हे प्रभु, मैं इतना बड़ा पापी हूँ कि मेरा उद्धार कभी संभव नहीं होगा। आपक...
कहा करूँ कासों कहूँ को बूझे कित जाउँ
क्या करूँ, किससे कहूँ, कौन समझेगा, किसके पास जाऊँ? श्री प्रिया-प्रियतम के दर्शन की तीव्र लालसा लिए, श्री धाम वृंदावन के वनों में उनका नाम लेलेकर व्याक...
वामुख की आशा लगी
अब मुझे केवल उन (प्रिया-प्रियतम) के मुख-दर्शन की ही उत्कंठा लगी है। योग, साधना और अन्य सभी उपायों की आशा मैंने पूर्णतः त्याग दी है। अब यदि शीघ्र ही उन...
कठिन मनोरथ मन उठे, को पुरनि करे आनि
मेरे मन में प्रेम भरे दुर्लभ मनोरथ उत्पन्न हो रहे हैं, उन्हें कैसे पूरा करूँ? कोई उपाय नहीं सुझता, केवल श्री लाड़लीजी ही अब कृपा करेंगी मुझे दीन-दुखिय...
और कहाँ ते सुमरिये
श्री प्रिया-प्रियतम के इस रास-विलास की लीला इतनी अगाध है कि वे मेरी सामर्थ्य से परे है। उनका पूर्ण स्मरण तो दूर, यहाँ तो ऐसी दशा हो जाती है कि ‘राधा’ ...
वृन्दावन विहरहिं सदा गहे परस्पर बाँह
दिव्य दंपति श्री राधा-कृष्ण एक-दूसरे का आलिंगन कर सदा वृंदावन में नित्य विहार करते हैं। मेरे हृदय में उनसे मिलने की तीव्र उत्कंठा जाग उठी है।